किसी को किसी का सहारा मिला ,
मैं अकेला था ।
पीछे से खम्बे था , जा भिड़ा ।
पहले तो बाधा लगा ।
मगर अगले ही क्षण कन्धा, टिक गया ।
अब उसी के सहारे खड़ा हूँ।
तो कल्पनाएँ कही ज्यादा ,
वास्तविक प्रतीत होती है ।
न तो ये विकल्प और न सदा का साथी खोजा है ।
खम्बे को जब बेजान देखा है ।
मैंने उसमे भगवान देखा है ।
सारे एक सामान थे ।
भीड़ में एक निश्चित पहचान खोजा है ।
ज्यादा कुछ नहीं, बस भूलभुलैया वाले बगीचे का नक्शा है। कुछ मुरझाए हुए फूल है जिनकी गंध अभी बाकि है । अधसड़े फल है जिनको किनारे से बचा के खाया जा सकता है और भँवरे-तितलियों की गैर मौजूदगी के कारण माली झींगुरों की सभ्यता को सहेजने के लिए .........
बुधवार, 1 अक्टूबर 2014
क्षणिकाएँ
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