मैं चाय या काफी नहीं पीता हूँ, ये सामान्य नशा है । इसके अतिरिक्त जीवन की व्यस्तता में निद्राकाल सीमित हो गया, गाने सुनना बस यू ही अच्छा नहीं लगता, और कुछ सोच भी नहीं पा रहा जिसे मैं नशा कह सकूँ की मैं भी आपने शारीरिक, मानसिक असंतुष्टि के क्षणों को कायर की तरह किसी सामान्य से नशे में बिता सकूँ। हाँ ठीक से सोच लिया , बिलकुल नशा मुक्त हूँ । मगर एक नयी चीज़ सीख़ ली है । मै पहला ऐसा व्यक्ति तो हो नहीं सकता क्योंकि ये भी नशे का कारण और नशा है । मैं ने भी चुनौती स्वीकार कर ली है ।
संसार में इच्छाएँ करने का निषेध है , इच्छाएँ कभी तृप्त नहीं होती और असीम भी है और सबसे जरुरी दुःख का कारण भी । मै इच्छओं के पूर्ण न होने के लिए इच्छाएँ करता हूँ और अधूरी कामनाओं के साथ रोता भी हूँ , मगर मैने झूठ कहा था की मैं कोई सामान्य नशा नहीं करता । हाँ , मरणासन्न अवस्था तक , जीवित होकर भी मरने का अनुभव हो जाये उस स्तर तक स्वतः निर्मित दुःख पीता हूँ। कम मात्रा में मगर सबसे असरदार दुःख प्रेम संबंधों के भावों से बनता है परन्तु प्राणघातक दुःख तो माता पिता को पहुँचे दुःख के भावों से बनता है ।
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