छत नीची हो ,
दीवारे संकरी हो ।
बड़ा इतना की काया मात्र ठहर जाये ।
बारिस में , गर्मी में और सर्दी में ,
मेरे अंग पानी से गिले हो ,
पसीने से भीगे हो ,
और हड्डियों में कम्पन हो ।
मगर ये सब सबसे छुप जाये ,
मौसम से भिडंत एकाकी ही हो ।
न दया का सहारा हो ।
न प्रोत्साहन के शब्द हो ।
सरीर मात्र के नाप का ,
छोटे छत वाला घरोंदा हो ।
और उसके चारो ऒर ,
गजानन के सूंड की ,
हनुमान के पूछ की परछाई हो
हे प्रभु !
आपके आंगन में मेरा भी एक कोना हो।
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