शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2014

माँ ! मैं कहे देती हूँ

माँ कहती है ,
तिथि त्यौहार है बेटी ,
घर मेहमान आयेंगे ,
तनिक तैयार तो हो जा ।

माँ ! जो भी आयेंगे ,
क्या मुझसे ही मिलने वाले आएँगे,
यदि मुझे देखने वाले भी आयेंगे ।
तो भी मुझे नहीं सजना ,

क्यूँ बेटी , इतना बस माँ कहती ,
और है चुप हो जाती ।

माँ ! मैं जानती हूँ ।
और तुम से कुछ छुपाना भी नहीं चाहती।
माँ ! देखने वाले तो आएँगे,
मगर मुझे आज से पहले तक हर दिन हर क्षण ,
देखने वाली आँखे न आएँगी ।
मेरे संजने में सौन्दर्य न होगा ।
दर्पण का सामीप्य भी व्यर्थ होगा ।
माँ ! मैं कहे देती हूँ ।
मेरा सजना - सँवरना किसी काम का न होगा ।
जब तक वो मेरी आँखों से आके न देखेगा ।
माँ ! तुम कितना मुझे सुन्दर कहती हो ।
मगर आज मेरे केशों की सुगंध और
तन की सुगढ़ता भी ,
देखने वालो को तो खिंच लाएगी ।
मगर मेरी इस बेकाम की आंगिक सुन्दरता ,
को अपने निश्चल नयनो में ,
सदा से खेलने वाले को न बुला पाएँगी ।

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