मेरा मुख कंकड़ सदृश्य है,
हर बार जो कुचला गया है ।
कभी अहं में,
कभी स्वार्थ में,
कभी सुख की तलाश में,
चेचक वाले चेहरे-सा,
दानेदार हो गया है ।
मेरे व्यवहार का प्रतिबिम्ब है जो,
चप्पलों और जूतों की मार से,
देखो कैसा चमक गया है ?
मेरा मुख कंकड़ सदृश है,
हर बार जो कुचला गया है ।
मेरे खुद के पैरों तले पड़कर,
गालों में पदचिन्ह उपट गया है,
मेरा मुख कंकड़ सदृश है,
हर बार जो कुचला गया है।
ज्यादा कुछ नहीं, बस भूलभुलैया वाले बगीचे का नक्शा है। कुछ मुरझाए हुए फूल है जिनकी गंध अभी बाकि है । अधसड़े फल है जिनको किनारे से बचा के खाया जा सकता है और भँवरे-तितलियों की गैर मौजूदगी के कारण माली झींगुरों की सभ्यता को सहेजने के लिए .........
बुधवार, 26 नवंबर 2014
क्षणिकाएँ
शुक्रवार, 21 नवंबर 2014
रोऊँगा अब नहीं एकांत में जाकर
मैं क्यूँ कुछ कठिन कहूँ,
या छुपाऊँ पीड़ा छाती की ।
सामाजिक हूँ ।
पीड़ा को स्वीकार कर,
जिसे समाज ने नहीं दिया ।
मैं ने सबके लिए स्वयं को,
सर्व सदा उपलब्ध किया ।
तो क्यूँ छुपकर व्यक्त करू ,
वेदना सहू अपनी और सबकी,
पर अब नहीं एकांत में जाकर,
रोऊँगा समाज में,
और सुनना होगा सभी को मुझे ,
चाहे ऊब ही हो जाये ,
आकस्मिक मुझको पाकर।
जानकर नहीं, यू ही किसी को रुलाकर ।
मैं ने सब को अपना दर्द सुनाने को ,
सर दर्द लिया ,
पाला पोशा बढ़ा किया ।
अब इसका पान करूँगा,
सिर्फ मैं,
पर रोऊंगा अब नहीं एकांत में जाकर ।
बुधवार, 19 नवंबर 2014
ये फूल जूठा है ।
ये फूल जूठा है ।
इसकी सुन्दरता और सुगंध झूठी है ।
पता नहीं, ये किसका है ?
इस पर किस-किस ने अधिकार किया ।
क्या तुमने सोचा,
क्यूँ सोचा तक नहीं ?
बस उठा लिया,
निस्तेज सुमन को पाकर भी,
क्या पा लिया ?
मिट जाने तक रंग, रूप और सुगंध,
ये बँटता जाता है।
पर कभी अपना हिस्सा मत माँगना,
जो मन से भी मांग लिया,
अधिकार किया,
कुछ ने सच में बलवश छीना ।
क्या पाया ?
ज्यादा बहुत ज्यादा,
अपना सब कुछ खो दिया ।
ये फूल झूठा है ।
जो जान गया,
क्या पाया ?
क्या बचा लिया ?
इतिहासकार और दूरदर्शिता
" वे बड़े इतिहासकार और दूर दृष्टा तो थे ही, कुशल प्रशासक भी थे। नेशनल बुक ट्रस्ट के अध्यक्ष पद पर रहते हुए उन्होंने इतिहास और समाजविज्ञान की अनेक दुर्लभ और महत्वपूर्ण पुस्तकों का अनुवाद और प्रकाशन कराया। खासकर प्रवासी इतिहासकारों की पुस्तको को भारतीय भाषाओ में लाना उनका महत्वपूर्ण योगदान है ।"
अनुमान लगाइए ! लगाइए ! उपरोक्त बातें किसके सम्बन्ध में कही गई होगी ? मगर हमेशा की तरह इस बार भी इतने से में बात खत्म होने वाली नहीं है; ये तो महज शुरुआती मानसिक कसरत है और कही जाने वाली बात की प्रमाणिकता की तलाश भी ।
(1)
जयों का त्यों अपना लेने में क्या मजा है? जैसे चावल और गेहूँ को क्रमशः भात और रोटी में बदले बगैर खाने की आदत जब हमने खो दी है तो शेष विषयों में भी उसी आदत को क्यों न पा ले ? कही गई बात को निरपेक्ष मानने पर भी उसके एक से अधिक अर्थ और अभिप्राय तो निकाले ही जा सकते है; उदाहरणार्थ चिकित्सा पर्यटन की अवधारणा हमेशा से विद्यमान थी और किसी भी आयाम से अविश्वसनीय भी नहीं । मात्र जरुरत सही दृष्टिकोण और पहचान की थी। चीजों को देखने के कई तरीके होते हैं इसीलिए रुढ़िवादी हुए बगैर हर तरह से किये गए विश्लेषण को अपना सकने जितना लचीलापन हमारे स्वाभाव में होना चाहिए। जिस रंग का चश्मा पहनेगें दुनिया उसी रंग में रंग जाएगी । हमे न तो नितांत सैधांतिक और न ही नितांत व्यवहारिक होने की जरूरत है । महान विचारकों ने दोनी के ही सम्बन्ध में पर्याप्त कहा है । सैधांतिक शिक्षा के लिए कहा गया है की " There is nothing more practical than a good theory ."
(2)
इतिहास बीता हुआ जरुर हो सकता है मगर समय में परिवर्तन के गुण के कारण पुनः घटित होने वाला प्रतीत तो होता ही है। कमरे का चौकोर आकार छुपे हुए रूप में ही सही अपने अंदर सभी धारणीय वस्तुओं में अपने चौकोरपन का प्रक्षेपण कर देता है; कमरे के अंदर की टेबल और पलंग , पन्ने और किताब चौकोर है। इतिहास में भविष्य की कल्पना होती है, आगामी समस्याओं का हल और कारण-परिणाम: परिणामों के कारण होते है। कुल मिलाकर सीखने के लिए बहुत कुछ, बदलने के लिए कुछ भी नहीं मगर भविष्य को बदल देने की प्रेरणा होती है ।
(3)
जार्ज बर्नार्ड शॉ के शब्दों में " मै इतिहास को अंत: प्रज्ञा से जानता हूँ फिर लिखता हूँ और उसके बाद इतिहास को पढ़ता हूँ और पाता हूँ मैंने सही लिखा था । इस बात की अगली कड़ी ये हो सकती है कि " मैं भविष्य को अंत: प्रज्ञा से जानता हूँ, फिर कहता हूँ और सब देखते है जो मैंने कहा था बिलकुल वही हुआ।" उदाहरणार्थ: प्रथम विश्व युद्ध के परिणामों का सतर्क विश्लेषण द्वितीय विश्व युद्ध की सम्भावना को दर्शता था; तत्कालीन विद्वानों ने तो यहाँ तक कहा कि ये 20 वर्षों का युद्ध विराम मात्र है । मगर दूसरे कथन में अंत: प्रज्ञा इतिहास जनित है जबकि पहले कथन की अंत: प्रज्ञा का ठीक-ठाक आधार सामान्य समझ हो सकती है ।
(4)
सर्वप्रथम वर्णित कथन विपिन चन्द्र के सम्बन्ध में है। विपिन चन्द्र का मानना था की इतिहास प्रगतिशील विचारों का प्रसार का सशक्त माध्यम हो सकता है। उन्होंने आधुनिक भारत का इतिहास औपनिवेशिक और मार्क्सवादी विचारों की इन दोनों धाराओ से अलग राह बनाई । ऐसे निश्चल, जुझारू और उदारमना इतिहासकार को खो देना निश्चय ही एक बड़ी बौधिक क्षति है।
शनिवार, 15 नवंबर 2014
क्षणिकाएँ
दृष्टिपात इधर भी कर दॊ,
मैं यू ही कुम्हला क्यूँ जाऊँ ?
रूप अपना निहार के मैं ,
खुद ही कब तक शरमाऊँ ।
तुमने देखा और सबने देखा
भेद कैसे बताऊँ ?
आखियाँ फेरैगो जिधर भी ,
उधर उधर ही मंडराऊ ।
गुरुवार, 6 नवंबर 2014
दो आयामी दृष्टि - दोष
कुंजी विषय : वैश्विक स्तर की दो खबरें, भारत में कमजोर साइबर लॉ, आँखों की अभिवक्ति क्षमता और अभिवक्ति के सामान्य विषय, कवि बिहारी की पंक्तियाँ, नयनाभिराम के उपेक्षित स्त्रोत।
कुंजी विषयों से क्या लगता है क्या बात होगी ? वही कोई उलटी सीधी सी, मगर झन्नाटेदार। विगत दिनों नवीन तकनीकों पर आधारित दो खबरों को पढ़ने का अवसर मिला जिसमें से पहली खबर में बताया गया था की जल्दी ही इन्सान मष्तिस्क में विचारो को उत्पन्न करके एवं अभिलक्षित व्यक्ति तक तरंगो के माध्यम से संप्रेषित कर वार्तालाप कर सकेगा ,यानि की अब गूँगा भी गुड़ का स्वाद बता सकेगा । दूसरी खबर साइबर क्राइम से जुड़ी हुई थी जिसमें विकसित देशों में इंटरनेट की सहायता से हत्या की जाने सकने की सम्भावना पर चिंता व्यक्त की गई थी और इस सम्बन्ध में साइबर लॉ की कमी को भी उल्लेखित किया गया था ।
भारत में भी साइबर लॉ समकालीन अपराधो पर लगाम लगा सकने में असमर्थ रहा है । साइबर लॉ की कमजोरी और नयनाभिराम के उपेक्षित स्त्रोतों का युवाओं के बीच ख्याति घोर चिंता का विषय है । और आज की दिन तक सरकार का रवैया जस का तस बना हुआ है ।
इन्टरनेट पर आसानी से प्राप्य किन्हीं अर्थों में अश्लील दृश्य द्रव्यों ने न केवल आज के युवा के मन को गन्दा किया है अपितु उसकी आत्मा के अधोपतन का कारण भी रहा है । आँखे आत्मा का द्वार है, इन कदाचित नयनाभिराम के उपेक्षित स्त्रोतों ने आँखों की अभिव्यक्ति क्षमता को गलत तरीके से बढ़ा दिया है और अभिव्यक्ति के सामान्य विषयों को स्थिर रखते हुए उनके परिणामो को स्वयं के लिए एवं उससे ज्यादा दूसरो के जीवन के लिए खतरनाक बना दिया है ।
आँखों में गज़ब की बात होती है कवि ने कहा है नायक और नायिका लोगो से भरे भवन मे, एक दुसरे से दूर बैठे होने पर भी आँखों से बात कर रहे है ; "भरे भौनु मे करत है नयन सु हि बात "। आंखे वायर लेस कनेक्शन के जैसे है । पलकों का उठना-गिरना , आँखों की काली मोती का श्वेत सरोवर में मटकना सारे के सारे मनोभावों को सफलता पूर्वक व्यक्त कर सकने में सक्षम है। इसलिए ऐसा नहीं करना है ।
एक अंतिम बात एक सर्वलोकप्रिय पुस्तक का कथन है जिस चीज़ के बारे में ज्यादा सोचेंगे उसी तरह की चीजों से ही आप घिर जायेंगे ।
इतना सब तो उस बात को समझने के लिए लिखा गया है जो अब कहने वाला हूँ की यदि मात्र आँखों से घूर कर किसी छोटे से बच्चे को रुलाया जा सकता है तो इसकी पूरी संभावना बनती है कि किसी को आत्महत्या के लिए भी मजबूर किया जा सकता है । और तर्क भी दिए जायेंगे - की मैं तो ताजमहल को देख रहा था , उसके सामने कौन खड़ा था इससे मुझे क्या, मैं भला किसी और को क्यूँ देखूँगा ? भरोसा नहीं हो रहा न , मुझे भी नहीं हुआ था जब मैंने पूर्व वर्णित दोनो ही खबरों को पढ़ा था ।
बुधवार, 5 नवंबर 2014
थी राख बची और रक्त बहा ।
थी राख बची और रक्त बहा ।
करूँ लाख जतन ,
पर कह न सकूँ , मैं वो कथा ।
जिसमें था अतीत में तीत घुला ।
जिसमें थी राख बची और रक्त बहा ।
मैं तो भूल चुका था ,
जब देखा तुमको याद किया ।
देवी ! पर तुम न वो क्षण याद करो ।
मुझको अब तो माफ़ करों।
तब जली, मेरे कारण
अब कारण मैं होऊँ, मैं नहीं चाहता ।
इतने पर भी यही चाहता ।
समझो ! हो अंत कथा का ,
वैसा ही ,
जैसा कभी हुआ था ।
जिसमें थी राख बची और रक्त बहा ।
देवी विस्मय में , उत्तर की आस में पूछा ?
कहो न तुम दीर्घ कथा , बता दो बस इतना ।
हे आर्यपुत्र ! तुमने आज भी मुझको कैसे पहचाना ?
ये प्रेम ही है न , नहीं ये छल ,
क्यों स्वप्न तुम्हें ही आया ?
हे देवी ! यह अविरल कृपा युगल किशोर की
क्या होता है ?
जो बलिदान का फल पहले मैं चख पाया ।
आखिर याद करों ,
पहले तुमने ज्वाला को अपनाया।
फिर था मेरा शीश कटा ।
और तब ज्वाला ने था तुमको अपनाया।
उतने पर भी जो मुझमे प्राण बचे थे।
उनकी आड़ में ,
तुम्हारी काया को प्रकाशित होते देखा था।
आज भी जब वही स्वर्ण रूप आँखों में आया,
तो पहचान लिया ।
और कथा को याद किया ।
जिसमें थी राख बची और रक्त बहा ।
रविवार, 2 नवंबर 2014
"समस्या मैं नहीं, मेरे जैसा होना है।"
आज कल अजीब सा संयोग अनुभव कर पा रहा हूँ की मेरे आस - पास जो भी लोग अनायास ही उपस्थित होते है उनमें और मुझमे कुछ समानता होती है । मैं जानता हूँ , एक स्तर तक यह सामान्य सी बात है परन्तु भला मैं क्यों सीधी बात कहने लगा । ऐसी बात लायेंगे की आप की भृकुटी तन जाये और थोडा नहीं ठीक- ठाक मात्रा में आपका नजरिया बदल जाये। मैं बात कर रहा हूँ उन परिस्थितियों की जब आप अनजाने में अपने काल्पनिक करीबियों से सांसारिक करीबी बढ़ने के लिए अतार्किक और मनोंकूल समानताएँ गढ़ने लगते हैं । और तब कहना पड़ता है कि " समस्या मैं नहीं, मेरे जैसा होना है । "
बात इतनी भी सीधी नहीं है , लेकिन कोई बात नहीं ; मिलकर बना देंगे । यही तो दिक्कत है जो लोग मिलने- मिलाने की बात करने लगते है और इसी बात में जब दो लोग मिल जाते है तो बाते उठती है कि मुझमें और तुममे बहुत समानता है परन्तु इस समानता जनित समस्या का आधार दोनों के स्वाभाव में अहंकार का परिपाक होना भी है और तब मुझे दुबारा कहना पड़ता है " समस्या मैं नहीं , मेरे जैसा होना है " । अब आप ही देख लीजिये अवधारणाओं को " मैं " और "मेरे " में समेटने से क्या झलकता है ? निश्चय ही घोर अहम् और स्वार्थ ।
ये असहजता से शुरू हुए संबंधो की एक मात्र विशेषता नहीं अपितु संपूर्ण संस्कृति की उन पंक्तियों के लिए चुनौती है जिनमे रब ने जोड़ी बनाने का ठेका लिया हुआ है और संबंधो के तोड़ने का अधिकार मानव ने और इतने पर भी समानताएँ खोजी जाती है; शुरुआत से सामंजस्य नहीं । और तब चौथी बार कहना पड़ता है " समस्या मैं नहीं , मेरे जैसा होना है "
शनिवार, 1 नवंबर 2014
यह " मैं " का अहम् से प्रश्न है ।
" वर्तमान के सुखों के आलोक में भूतकाल के दुखों को भूल सकना अत्यंत कठिन है । "
इस एक पंक्ति को डोरी मानकर अपने विचारवान मन उपवन से रंग-रंग के विचार सुमन से माला गुथने का प्रयास ही आगामी वाक्यों में व्यक्त किया गया है और इसकी पूरी सम्भावना है कि मेरी मानसिक फुलवारी के पुष्पों से जड़ित माला , पुष्पों का रंग एवं गंध और संपूर्ण उपवन की संरचना आपको संदिग्ध लग सकती है । परन्तु हाँ , सारी बात की एक बात , मैंने जानबूझ कर माला को गुथने के लिए पुष्पों को चुनते हुए आर्थिक परिस्थितियो को अन्य सभी चुनाव के आयामों में सर्व महत्वपूर्ण माना है । इस बिलकुल पिछली पंक्ति के बाद अब कुछ लोग ही सारी बात पड़ना चाहेंगे मगर उनके विचलन का कारण यदि उनके मंतव्य की भिन्नता है तो ये और कुछ नहीं बिलकुल ऐसी ही बात है जैसे कोई कहता है कि मेरे हृदय में क्रोध और लालच नहीं है । इसका सीधा अर्थ इतना सा है कि वह क्रोध और लालच को नहीं पहचानता अन्यथा शेष सभी एक से है।
सुख और दुःख में अत्यंत घनिष्ठ सम्बन्ध है । परन्तु इस बार बात थोड़ी नई है , क्योंकि ऐसे सारे संबंधो से सभी पूर्व परिचित है । याद करिए आपने भूतकाल को और उस समय की असहनीय, वजनी , अनिवार्य सी आर्थिक तंगी को जिसमेँ पैसो को सबसे जरुरी जरूरतों की पूर्ती के लिए आपको बचाना पड़ा हो । क्या यह अभाव के क्षणों में जोड़ी गई सम्पति से अर्जित सुखों को सुख की संज्ञा देना उचित होगा ? अब एक बार फिर पहली पंक्ति को ध्यान करिए और आप पाएंगे की ये जीवन का कोई नया दर्शन या मानसिक परिष्करण नहीं अपितु यह साधारण से कथन के प्रारूप में " मैं " का अपने पुष्ट अहंकार से किया गया प्रश्न है । जिसका उत्तर खोजने जब आप बैठेंगे तो आप के पैरों तले की जमीन के खिसक जाने में ही आपके भविष्य कालिक आनंद की सम्भावना छुपी हुई है । यह कठिन है , जैसा की इस रचना के शुरू से ही था कि आप अपने सारे वर्तमान के सुखों के स्त्रोतों का चयन इस आधार पर नहीं कर पाएंगे , जिनमे आपके व्यक्तिगत किये जाने वाले निर्णयों के परिणामस्वरुप आपको कम और आपके माता - पिता को अधिक आनंद मिले और न ही इस आधार पर जिसमे भूतकाल के वेदना से अर्जित दृष्टी और यातना जनित दृष्टा का अपमान और अवहेलना का भाव केंद्र में हो ।