मंगलवार, 19 अगस्त 2025

नशे की हालत में

सरकार और नशा

सरकारें न नौकरी देती हैं,
न नशा करने देती हैं।
तो फिर चाहती क्या हैं?

न जीने देती हैं,
न मरने देती हैं,
न भूलने देती हैं दुख।

अगर पूछें खुद से—
कौन करता है नशा? क्यों करता है नशा?
तो जवाब मिलेगा—
वही जिनके पास नौकरी है,
और वही जिनके पास नहीं है।

सरकार कहती है—
नौकरी दो या न दो,
नशा तो करेगा ही इंसान।
तो क्यों दें नौकरी?
क्यों दें नशा?

कहीं नशे में
ट्रैफिक इंस्पेक्टर न बन जाए,
कहीं मास्टर न बन जाए,
कहीं जागरूक नागरिक न बन जाए।

सरकार जानती है,
एक नशेड़ी भी
कुछ बनने का सपना देखता है।

गुरुवार, 8 मई 2025

बँधनों की दुनिया


था उसका सारा यह जहाँ,
खुला गगन, धरती महान।
फिर भी उसने घर बसाया,
चार दीवारों में मन को बाँधा।

पेड़ थे, छाँव थी, ज़मीन खाली,
पर उसने लगाई क़ीमत गाली।
जो था सबका, उसे अपना बनाया,
काग़ज़ों में नाम लिखवाया।

नदी थी, झरने थे गाते,
प्रकृति के संग दिन थे बीतते।
पर उसने नल में पानी बाँधा,
स्नानघर में जीवन को साधा।

आजादी थी, उड़ सकता था,
सपनों में दिन बिता सकता था।
पर उसने नौकरी को चुना,
समय को तनख्वाह में बाँटा।

था जीवन जीने को अपना,
पर बंध गया रिश्तों का सपना।
विवाह किया, साथ निभाया,
पर खुद को कहीं खो बैठा।

दिन में सोने की आज़ादी थी,
रात में जागने की तैयारी थी।
पर बिजली बनाई रात को दिन,
और खो दिया नींद का सुकून छिन।

आग जलाई रोटी पकाने को,
बस गया एक जगह जीने को।
पर खेती, घर और परिवार के संग,
खोई स्वतंत्रता, खो गया रंग।

सुविधा के पीछे भागते-भागते,
शांति छूटी, जंग लगते-लगते।
अब भी खुला है प्रकृति का द्वार,
पर क्या लौट पाना है अब सरल और स्वीकार?

जब भी जीवन लगे बंधन में,
जब भी घुटन हो इन बर्तनों में,
एक सवाल उठता है मन में—
क्या सच में खुले हैं रास्ते वन में?

बुधवार, 23 अप्रैल 2025

कारण और परिणाम


हरी घास पर पसरा सन्नाटा,
बहती नदी का पारदर्शी गान।
शांति और आनंद का आभास —
पर तभी जब लौटने को
एक घर हो।

हम घूमते हैं,
छुट्टियाँ मनाते हैं,
क्योंकि नौकरी है,
जिससे हम भागते हैं,
पर वही तो कारण है —
छुट्टी तो बस परिणाम।

हमें पर्वत अच्छे लगते हैं,
बर्फ की चादर पर चलना — रोमांच।
पर रहते कहाँ हैं हम?
मैदानी जीवन की सरलता में।
पर्वत दिखते हैं सुन्दर,
पर जीना वहाँ कठोर है।
मैदान जीने के लिए हैं,
पर्वत—सपनों के लिए।

हम जन्मे नहीं बस
खाली बैठने के लिए,
कुछ तो कारण है,
कुछ तो उद्देश्य।

क्या वो उद्देश्य
किसी क्षेत्र में उत्कृष्टता है?
नाम कमाना? धन अर्जित करना?
या फिर मानवता का हित?
प्रकृति का रक्षण?
पृथ्वी की पुकार सुनना?

अपने लिए जीना — एक विकल्प।
दूसरों के लिए जीना — दूसरा।
दोनों में असर है,
अगर असरदार हुए,
तो ये दुनिया याद रखेगी।

पर लोग सोचते हैं उल्टा,
कहते हैं — "प्रसिद्ध बनो",
मैं कहता हूँ —
"श्रेष्ठ बनो, प्रसिद्धि स्वयं आएगी।"
प्रसिद्धि कारण नहीं,
वो तो एक परिणाम है।

बुधवार, 9 अप्रैल 2025


तरु-शाखा पर बैठ विहगिनी बुनती थी निज स्वप्न-निकेतन,
कण-कण में बसती आशा, श्रम से सजा वह मृदु आलयन।
पर्ण-पुष्प से गूँथ बनाई, जीवन की वह मधुर छवि,
मानव-सा वह चातक भी, निज कुटुम्ब हेतु अनुरक्त सदा रवि।

नभ में विहारिणी, फिर भी बंधी अपने आलय से,
स्वच्छंद थी वह, पर थी सुधि निज नीड़ के प्रालय से।
सोचा — "यह कुटी ही मेरी शांति-शरण बन जायेगी,
जहाँ सहेज रख सकूँ कांति, जहाँ प्रीति मुस्कायेगी।"

परन्तु हाय! विधि का विधान कैसा,
निज श्रम पर व्याधि का आघात कैसा।
दुष्ट ने किया विध्वंस घोंसले का,
अंडों पर पड़ा अनर्थ का झोंका।

विहगिनी थी विकल, अश्रु-प्रवाह में लीन,
सारा सृजन हो गया, पलक झपकते ही क्षीण।
गूँज उठी पीड़ा उसकी इस निरभ्र अम्बर में,
जैसे चेतावनी हो सबको इस अस्थिर संसार में।

नर की कन्या भी कुछ वैसी ही गति पाती,
जब रीति-रिवाज, कुल-धर्म को तज जाती।
जो दिखता है सरल, वह सदा सहज नहीं होता,
जो दिखता है नूतन, उसमें स्थायित्व नहीं होता।

स्वातंत्र्य उत्तम है, पर संयम उसका मूल है,
परंपरा से जुड़ा जीवन ही निष्कलुष फूल है।
जहाँ धर्म, मर्यादा और नीति का हो संग,
वहीं सुरक्षित रहता है नारी का मंगल-अभंग।

अतएव हे सुबुद्ध मानव! यह सीख सदा धारण करना,
सुधि रखो – घोंसला वही सजाना, जो न सिर्फ सुंदर, अपितु हो अडिग, अचल, स्थिर —
धर्म-संरक्षित, प्रेम-संवलित, कुल-परंपरा में गुँथा।

शुक्रवार, 27 मार्च 2020

संगीत, रेडियो और शफल फंक्शन

संगीत, रेडियो और शफल फंक्शन। रैनडम या बिना सोचे समझे जैसा कि इसे सरल शब्दों में समझ सकते हैं। खाली समय में या काम की व्यस्तता के बीच पसंदीदा गानों को सुनना आम है । संगीत लोगों के व्यवहार को तेजी से प्रभावित करता है । इतनी तेजी से की आप उम्मीद भी नहीं कर सकते हैं। 

सिर्फ सुगम संगीत लोगों को उनकी जेब से उनकी गाढ़ी कमाई निकालने के लिए मजबूर कर देता है। यह एक व्यवस्थित खोज का विषय रहा है कि मल्टी ब्रांड रिटेल स्टोर्स में गाने बजाकर कस्टमर्स के खरीददारी के अनुभव को कैसे बेहतर किया जा सकता है? 

एक धीमा-धीमा बजता हुआ गाना आपको सूकुन देता है और तनाव दूर करता है। जब आप हल्का और अच्छा महसूस करने लगते हैं तो आपको समान खरीदने कि इच्छा होती है।

लेकिन विषय ये नहीं है। यह तो संगीत के हमारे मन पर पड़ने वाले प्रभाव को दिखाती है। लेकिन विषय है जीवन में संगीत और खुद बनाई हुयी प्ले लिस्ट और रेडियो कि रैनडम प्ले लिस्ट में से किस प्ले लिस्ट को सुनना ज्यादा पसंद करते हैं। और यह जरूरत है इसी कारण संगीत को सुनने में रैनडम गानों का बजना हो सके इसके लिए म्यूजिक प्लेयर में शफल फंक्शन दिया जाता हैं। 

इससे जुड़ा एक मसला है। स्पाटीफ़ाई (spotify) जो कि एक म्यूजिक स्ट्रीमिंग एप्प है। इसका उपयोग करने वाले लोगों कि शिकायत थी कि स्पाटीफ़ाई गानों को शफल करने में बयास्ड है। यह ठीक से सांग्स को शफल नही करता हैं। यह बात इतनी बढ़ गयी कि स्पाटीफ़ाई के सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स को एप्प के शफल फंक्शन के एल्गॉरिथ्म को बदलना पड़ गया। 

इससे तो यह पता चला कि जीवन में संगीत जरूरी है और संगीत में रैनडम होना जरूरी है । ऐसा नहीं है कि लोगों कि अपनी प्ले लिस्ट नहीं होती है। मगर किसी दूसरे कि प्ले लिस्ट सुनना और रेडियो से गाने सुनना हमेशा खुद कि बनाई प्ले लिस्ट से बेहतर है। यह एक तरह से हमें खुद से अलग कुछ बेहतर कि तलाश कि उम्मीद को पूरा करती है। 

रेडियो सुनते हुये जो अनुभव करते हैं। वह मोबाइल पर डाउनलोड किए हुये सांग्स को सुनने से काफी बेहतर है । लोगों ने शेयर किया है कि जब रेडियो में कभी भी कोई सांग्स बजने लगता है जिससे उनकी पुरानी यादें ताजा हो जाती है । उन्हें अपने दिमाग पे अपने जीवन के यादगार लम्हों को याद करने के लिए ज़ोर नहीं देना पड़ता है जैसे रेडियो पर वह सांग बिना सोचे समझे या रैंडम प्ले हुआ वैसे ही दिमाग में आए जीवन के यादगार लम्हों कि याद एक दम रैंडम है। रेडियो में बजने वाले गाने बज कर चले जाते है उनको लेकर हमारे दिमाग में यह सोच उसे कीमती बनती है कि जो मिल रहा है उसे एंजॉय करे क्योंकि हो सकता है ये गाना फिर न मिले या आसानी से न मिले या ये तो मेरे पास नहीं होगा इसके बाद । 

यह सोच जीवन के लिए एक सीख है कि हमें रेंडम या बयास्ड फ्री चीजें पसंद है। और खुद कि बजाय किसी टॉपिक पर एक्सपर्ट कि राय मानना बेहतर होता है। यह सोच वही है जो आपको खुद कि प्ले लिस्ट के प्रति बोरियत पैदा कर देती हैं । जीवन में चयन कि स्वतन्त्रता अपेक्षित है लेकिन यह चयन को लेकर ऊब पैदा कर देती है। यह हमेशा स्वयं के प्रति लगाव को कम करके दूसरे के पसंद को पसंद करने की ओर धकेलता है।

बुधवार, 9 अक्टूबर 2019


छोटे से यह सवाल पूछने लगते हैं कि बड़े होकर क्या बनना चाहते हो ? और यह सवाल इसलिए नहीं पूछा जाता है कि बच्चे ने बहुत सोच विचार के किसी निष्कर्ष पर पहुँच गया है बल्कि ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि उसके अवचेतन मन में एक उद्देश्य फीड किया जा सके । यह सिखाने का एक तरीका है ।

इस पद्धति को गलत नहीं कहा जा सकता है । जीवन में लक्ष्य होने से आगे बढ्ने में आसानी रहती है । लेकिन बच्चे को जीवन में स्वयं फैसले लेने कि स्वतन्त्रता देनी चाहिए ?

यदि यह स्वतन्त्रता हो कि जीवन में चुनने कि तुम क्या बनना चाहते हो तो जवाब तक कैसे पहुचेंगे ? इसका एक आसान तरीका है ।

एक उक्ति है “आपको यह स्वीकारना पड़ेगा कि आप सब कुछ ठीक नहीं कर सकते है “

सरकारी तंत्र में बहुत कार्य करने के बाद भी जो टीस मन में उठती है कि अभी भी बहुत से लोग ऐसे है जो वंचित है जिनके लिए मैं अपेक्षित कार्य नहीं कर पाया ।

अब इससे यह बात सामने आती है कि आप क्या बनना चाहते है इसका निर्णय इस बात से होता है कि समाज में क्या बदलाव देखना चाहते है ?

बहुत से लोग जिनसे यह पूछा गया कि वे भविष्य में क्या बनना चाहते है ? और वे लोग प्रबुद्ध है तो वे कहते है कि उनके जीवन में अमुक अमुक घटना घटी इसलिए उनके विचार में बदलाव आया और इसलिए वे अमुक पद पर जाना चाहते है ।

इस बात को सपोर्ट करती कई कहानियाँ है जिनसे कई नए पक्ष भी सामने आते हैं ।

एक लड़की बड़े होकर पुलिस अधिकारी बनना चाहती है क्योंकि जब उसके साथ एक छेड़खानी कि घटना हुयी थी तो पुलिस ने सही तरह से कार्य नहीं किया । वह चाहती है कि वह पुलिस अधिकारी बनकर इस व्यवस्था को ठीक करे ।

इसके अतिरिक्त एक व्यक्ति डॉक्टर इसलिए बनना चाहता है क्योंकि उसके बड़े भाई कि मृत्यु इसलिए हो गयी क्योंकि उसके बड़े भाई को सही इलाज सही समय पर नहीं मिला ।

व्यक्ति को जीवन में जो वह बदलाव समाज में देखना चाहता है यदि उसके लिए ही प्रयास करता है तो एक संतुष्टि का अनुभव करता है । यह काम हॉबी के तौर पर भी लोग करते है क्योंकि हमेशा यह संभव नहीं होता जो नौकरी हम करते है और जैसा समाज हम देखना चाहते है वे एक हो ।

शुक्रवार, 9 अगस्त 2019

नियति कितनी बलवान है ?

तुम हाँ ! तुम्ही से कह रहा हूँ ! इधर उधर क्या देखते हो ? तुम जो कभी ये सोच कर कि सफल हो , खुश हो गए । वही तुम कभी ये सोच कर कि असफल हो, दुखी हो गए । तुम्हारे जीवन में तुम्हारी यह स्थिति दयनीय से अधिक कुछ नहीं है । कभी भी बिना जड़ के पेड़ देखा है । बिना जड़ का पेड़ होगा भी तो पल भर में सूख जाएगा । बिना नींव कि इमारत गिर जाएगी । आधारहींन बातों को कोई नहीं सुनता वैसे ही जीवन में उन बातों को क्या महत्व देना जिनके होने न होने पर किसी का वश नहीं था । तुमने जन्म किस जाति में लिया तुम्हारे वश में नहीं था , और न ही तुम्हें माता पिता के चयन का अधिकार दिया गया । शिशु के रूप में जब तुम्हारा जन्म हुआ तो तुम इतने अबोध थे कि अपनी नियति से जुड़े फैसले नहीं कर सकते थे । यदि जन्म के बाद भोजन न कराया जाता तुम्हें तो तुम मर जाते । जन्म लेने के वर्षों तक तुम्हें सही गलत और अपना हित-अहित नहीं पता था । एक सेकेंड भर को रुककर अपनी स्थिति को देखो और सोचो आज जिस संसार में रह रहे हो उसमें जिन बातों और तर्कों को लेकर जी रहे हो उनमे से कितनों का निर्धारण योग्यता के आधार पर होता है । जाति, धर्म , रंग , धन , रूप , नागरिकता किसी को भी चुनने के लिए तुम्हें स्वतन्त्रता नहीं थी । तुम जन्म से परतंत्र प्राणी थे । यदि आज स्वतन्त्रता के लिए सोचते हो तो यह वही स्थिति है जिसमें बिना जड़ के पेड़ सूख जाता है । तुम किससे स्वतंत्र होना चाहते हो ? एक व्यवस्था है जिसमें से सभी को गुजरना पड़ा । 

जब कभी भी ये लगे कि जीवन में तुम स्वतंत्र हो । तुम जीवन के फैसले ले सकते हो तो उन बातों को याद करना कि  किस बारीक व अति भाग्यवाद के बीच से तुम्हारा निर्माण हुआ है । जिस स्थिति में तुम्हें किस किनारे लगा दिया जाता उसका कोई हिसाब लेने वाला नहीं था । एक नवजात शिशु कि पहचान नगण्य होती है । ऐसी भयानक स्थिति से निकलकर तुम्हें यह जीवन मिला है जिसमें यदि आँख , नाक , कान , हाथ , पैर  सलामत है तो मान लो बड़ी मेहरबानी कर दी पालने वाले ने जो वह इतना समय निकाल पाया और सोचा कि तुम सही सलामत रहों । यह आश्चर्य नहीं है कि दुनिया में ऐसे लोग दिखते है जिनके हाथ न हो या एक पैर से विकलांग हो । भगवान का दिया हुआ यह शरीर तुम्हारा घर है । जब कभी भी तुम इन बातों को पढ़कर इनकी तह तक पहुचना तुम पयोगे जीवन में जितना कुछ भी तुम्हें मिला है वो न भी मिल पाता तो कोई अदालत नहीं थी जंहा गुहार लगाकर अपने साथ हुये अन्याय का हिसाब मांग पाते । बल्कि तुम्हारी स्थिति ही न्याय के बाद कि स्थिति है । दुनिया तुम्हारे साथ हुये को तुम्हारे पुराने जीवन के कर्मों के मत्थे मढ़ देती और तुम सोचते रह जाते कौन सा पिछला जन्म ? 

असल में यह व्यवस्था है जिसमें अव्यवस्था भी है जैसे कि हर व्यवस्था में होती है । शुभ के साथ अशुभ भी होते है। बिना सोचे विचारे लोग हाहाकार करते रहते है । सीधी सी बात है जब , जिस दिन जिस वक्त यह समझ जाओ कि जिस स्थिति में उस स्थिति से भी बदतर स्थिति हो सकती थी तो उसी समय से अपनी गति बदल देना । निराशा का कोई स्थान नहीं है । निराशा किसलिए ? तुम्हारे हाथ में जब था ही नहीं कुछ तो तुम निराश होकर भी कुछ नहीं कर सकते । ऐसा भी नहीं है कि आगे तुम्हारी निराशा तुम्हें इस बात का भरोसा देगी कि तुम अपनी नियति चुन पाओगे। ब्रह्मांड में लटकती हुयी पृथ्वी को ध्यान करके इस बात को समझों । जो व्यक्ति इन बातों को समझ कर अपनी गति में सुधार कर लेता है उसी ने वास्तव में जीवन को जी पाया । ज़्यादातर जीव इस जगत में नियति के सहारे उड़ते , गिरते , बढ़ते , घटते है । कोई जन्म से अमीर या गरीब हो जाता है ।  किसी की जाति उसे पंडित घोषित कर देती है । कोई जाति से ही ग्वाला है और कोई जाति से ही सेवक है । नियति ने उन्हें अपने कर्म तक चुनने का अधिकार नहीं दिया । यह कोई आश्चर्य करने वाली बात नही है । समाज ऐसा भी होता है । 

दुनिया में कोई भी नहीं जो यह बात समझ लेने वाले व्यक्ति को जरा भी विचलित कर सके कि नियति कितनी बलवान है ?