भीड़ की ताकत होती है ।
वो क्रूर को शांत कर सकती है ।
और बस इतना काफी है ।
ये जानने के लिए की पिताजी ,
आज बिलकुल बदले हुए थे ।
बच्चे को सीने से लगाये ।
बच्चे के मुह से अपनी पेन छुड़ाए ।
माँ शंकालु थी विस्मित भी ,
पिता के हृदय परिवर्तन की कायल हो गई ।
कही ये मुहूर्त न बीत जाये ,
उसने मानो अपने ,
वात्सल्य की थाती ही खोल दी ।
बच्चे को दुलारती लोलारती ,
भारी भीड़ में ममता की व्यापारी ,
कोई इनसे सीखो ,
बच्चो को कैसे पालते है ।
भाव इतने उमड़ घुमड़ कर आ रहे थे ।
कि बच्चे के मनोविज्ञान को ,
बड़ो पे लगाना पड़ गया ।
तब कुछ स्थिति साफ हुई ।
कि भीड़ की ताकत होती है ।
वो तो बच्चो को माँ बाप के आँचल तक समेटती है।
बनाती कम ,
मगर उससे ज्यादा बिगाड़ देती है ।
ज्यादा कुछ नहीं, बस भूलभुलैया वाले बगीचे का नक्शा है। कुछ मुरझाए हुए फूल है जिनकी गंध अभी बाकि है । अधसड़े फल है जिनको किनारे से बचा के खाया जा सकता है और भँवरे-तितलियों की गैर मौजूदगी के कारण माली झींगुरों की सभ्यता को सहेजने के लिए .........
गुरुवार, 25 सितंबर 2014
मुहूर्त न बीत जाये
गुरुवार, 18 सितंबर 2014
हिस्सेदारी
बुक बोल देने मात्र से क्या होता है ।
थिएटर की सीट या पहले आओ पहले पाओ ।
जैसा ही सब कुछ थोड़े ही होता है ।
की बस एक बार ,
अपना अधिपत्य साबित करना होता है ।
कोई भी सामान जो कम कीमती हो ,
रख दो , अब से ये चीज़ हमारी ।
ऐसे में तो प्रतिस्पर्धा खूब हो जाएगी , तब ।
नजरो से ही चीज़े आरक्षित होगी ।
सच कह रहा हु ,
इसी तरह छह लडको ने ,
सारे मोहल्ले के माहौल को बाट लिया ।
दुर्भाग्यवास सबसे अच्छा खिलाडी ,
आखिर के लिए बच गया ।
सभी कप्तानो ने उसे सामूहिक रूप से ,
पहले नजरो से बाटा फिर हाथो से ,
अंत में अंत सदा सीधा साधा नहीं होता ।
खिलाडी दर खिलाडी खेल चलता रहा ।
खेल तो कब का शुरू हो चुका था ।
अंतहीन अप्रत्याशित बटवारा इसी प्रकार चलता रहा ।
मै तो पहले से कहता था ,
इनसे खेल न होगा और हुआ भी नहीं ।
मरी हुई सीढ़िया
मरी हुई सीढ़िया ,
शोर नहीं करती ।
चलती हुई भी ,
शोर नहीं करती , मगर कराहा करती थी ।
ये ऊपर जाती , तो सब ऊपर जाते ।
ये निचे जाती , तो सब निचे जाते ।
जब रुक जाती ,
सिर्फ सेवाए देकर ,
जब तक चलती है चले ,
की आशा लेकर, बोझा ढोती ।
मगर इनके ऊपर या निचे नहीं जाने पर भी ,
लोग इन्हें रौदकर , अब भी चले जा रहे है ।
मेहनतकश आज कुछ बढ़ गए है ।
और आलसी अब लिफ्टो में ,
भीड़ बड़ा रहे है ।
देखते है कब तक चलती है , चले !
मंगलवार, 16 सितंबर 2014
रात ही क्यों होती है
दिन को जगे ,
काम को भागे ,
शाम को घर आना पड़ता ही है ।
दिन के राजा को ,
परेशानी इससे होती है ।
की रात ही क्यों होती है ।
पुरे दिन पिसते रहो ,
परिवार के लिए घिसते रहो ।
फिर भी शाम को घर आना पड़ता ही है ।
दिन के राजा को ,
परेशानी इससे होती है ।
कि आखिर रात ही क्यों होती है ।
भागे भागे जाओ , भागे भागे आओ ,
धक्के खाओ , थक भी जाओ ,
उस पर भी जब देर तो हो ही जाती है ।
बहुत ग्लानी होती है ।
की आखिर रात ही क्यों होती है ।
घर जाने में,
जितना कष्ट मिला , उतना ही आराम मिला ।
समता का सिद्दांत मिला ।
खाने का डब्बा , पत्नी का प्यार ,
बच्चो से दुलार ,माँ बाप का आशीर्वाद ,
आखिर क्या लेने घर जाते हो ।
तुम्हारे बिना भी सब अच्छे से रात में सोते है ।
हा तुम्हारी पत्नी भी आराम से सोती है ।
इतनी परेशानी होती है ।
तो क्यों जाते हो ,
विशवास दिलाने को ,
सब घर आते है तो मै भी आता हु ।
तुम सब मुझसे ही हो ।
यह याद दिलाने को ,
की तुम्हारी तकलीफों से ,
मुझको भी तकलीफे होती है ।
तब पर भी आखिर ये रात ही क्यों होती है ।
शुक्रवार, 12 सितंबर 2014
मेरे हिस्से की आज़ादी है
नियमो को मानने वाले ,
बन्धनों में जल्दी बंध जाते है ।
सहायता को तत्पर रहते है।
सस्ते में सभी से छले जाते है ।
क्या करे ?
आश्रितों को , इमानदारो को ,
और भोलेपन से भरे मन को ,
लूटने की होड़ जो मची है ।
मौके कम ही दिए जाते है ।
अवसर हमेशा सिमित ही होते है ।
उन मौको को पाकर ,
जिनसे ये बात बदल जाये की ,
अब से आश्रितों को , इमानदारो को ,
और भोलेपन से भरे मन को ,
ठगा न जा सकेगा ।
ऐसा होना पर्याप्त होगा ,यह समझने के लिए ,
मै निराश्रित होकर भी , अलग होकर भी
खुश हु । स्वतंत्र हु ।
अपनों के और बहुत करीबी अपनों के ,
सभी के बन्धनों से मुक्त हु ।
मानों जीती हारी बाज़ी है ,
ये मेरे हिस्से की आज़ादी है ।
बीते सालो में
बीते सालो में ,
मै ज्यादातर समय घर पर ही रहा ,
घर की अपनी महिमा होती है ।
घर उसमे रहने वाले को निजता प्रदान करता है।
और निजी मामले तैयार करता है ।
जो समाज हर मामले को ,
निजी करके टालता हो ,
उसमे व्यक्तिगत विषयो पर टिप्पणिया ,
कम ही मिलती है ।
समाज और व्यक्तिगत जीवन में,
कुछ तो अंतर होना चाहिए ।
जैसे दीवारों के कान होते है ।
वैसे ही घर की दीवारों में ,
एक और भी बात होती है ।
तोड़ने की और जोड़ने की ,
क्यों की जब बात ,
हद से ज्यादा बढ़ जाती है तो ,
ये दीवारे निजता को तोड़कर ,
सच छुपाने को मजबूर करती है ।
और ऐसे ही समाज से जोडती है ।
शुक्रवार, 5 सितंबर 2014
आज कल
जब तक आभासी आशा थी ,
चित् स्वर्थी था , मन ललचाया हुआ , मस्तिष्क में काल्पनिक सपनें थे ।
तब तक रिश्तो में माधुर्य और मिठास था ।
आने का स्वागत हुआ ।
मिलने की आतुरता थी ।
जाने पर अॉखे नम थी ,
अब जब स्वार्थ बहुदेशीय परियोजना की
तरह विफल हो जाएगा ।
सपनें शीशे की तरह टूटें ही समझो ।
लालच मन में ही वृध्द हो गया ।
अब रिश्तों में तीक्ष्ण मौन ,
आभासी माधुर्य और मिठास था ।
आवाज में कर्कशता थी ,
आने का स्वागत तो हुआ ।
पर मिलने का प्रयास नहीं ,
जाने की प्रतीक्षा थी ।
आखें अबकी बार सूखी हूई और लाल थी ।
बुधवार, 3 सितंबर 2014
तात्कालिक सन्यासी
मैं असमय ही कहीं,
नहीं जाता ।
तो कहीं रूक भी नहीं जाता ।
पर कभी - कभी उन ,
एकांत ठिकानों का ध्यान,
मुझे असमय ही रोक लेता है ।
लोग ऐसे ठिकानों पर अब ,
सैर सपाटो को जाया करते है ।
मुझे याद है ,
किंही महापुरुष ने मंदिर बनवाए ,
सोचा होगा की भगवान का संग ,
भगवान बना देगा ।
पर ऐसा हो न सका ,
और जो हुआ सर्वविदित है,
कि हरे - भरे पहाड़ो को देखकर ,
सून - सान गुफाओं मे जाकर ,
और अंत में भव्य देवालयों में प्रसाद पा कर ,
मैं असमय ही रूक जाता हूँ ।
पर अब ऐसा हो न सकेगा ,
क्योंकि ये जगहें तस्वीरों में कैद होने लायक है ।
लोग यहाँ सैर सपाटे के लिए आते है ।
असमय रुकने के लिए नहीं ।