रविवार, 19 जून 2016

जलवायु परिवर्तन : मेरे और आपके के लिए

मैं आज भी सुबह उठता हूँ । उसके बाद दन्त मंजन, स्नान के बाद दिन की शुरुआत करता हूँ । धीरे-धीरे ये सब कुछ आदत में शामिल हो गया हैं । यदि दिनचर्या में थोड़ा भी अंतर आता है तो अजीब-सी बेचैनी मन को घेर लेती है । लेकिन ये मेरे या आपके व्यक्तिगत जीवन तक सीमित है, जिसे ठीक किया जा सकता है और हम कर भी लेते हैं पर जब बात हमारे वश के बाहर होने लगे तो उसे ही आज कल लोग जलवायु परिवर्तन कहते हैं। 

हम इतनी विशाल पृथ्वी के बहुत-ही छोटे अंश है, लगभग नाममात्र के। यदि हम पृथ्वी को अपने छोटे-छोटे कृत्यों से प्रभावित नहीं कर सकते तो प्रभावित हुये बिना बच भी नहीं सकते हैं उसी प्रकार यदि पृथ्वी के प्राकृतिक कार्यप्रणाली में बदलाव आता है तो हम भी उस बदलाव के शिकार होते हैं । प्रायः हम पृथ्वी के प्रभाव में रहते हैं । पृथ्वी हमारे प्रभाव से कुछ ज्यादा समय तक बची रह सकती है, परंतु हम उससे अलग होकर जीवन की कल्पना नहीं कर सकते । फ़िलहाल ये दो तरफा नहीं बल्कि एक तरफा रिश्ता है । 

मेरे और आपके कितने पास समुद्र है ? क्योंकि समय के साथ ये दूरी घट रही हैं । भारतीय प्रायद्वीप के बीच में रहने वाले कब समुद्री लहरों का दीदार कर पाएंगे ये कहा नहीं जा सकता है। लेकिन ऐसा कुछ होगा इसकी गारंटी तो पक्का है। समुद्र के मैदान से ज्यादा गरम हो जाने के कारण बारिश कम होती है अगर यही हाल रहा तो हमारी जीवन का वो पहलू जिसमें बारिश का रोल होता था बिलकुल फीका ही हो जाएगा। मुझे एक सामान्य जीवन की झलक सभी में दिखती है । बारिश को कोसता हर कोई है, पर प्रेम जितना बारिश में है उतना न तो सर्दी से है और न गर्मी से । मगर लोग कहते हैं अब पहले जैसे बारिश नहीं होती और अब होगी भी नहीं क्योंकि बारिश को बुलाने वाले मेढक, गौराया, कौए और पेड़ नहीं रहे । जहाँ बारिश होती भी है वहाँ पीली बौछारों की खबरें आई है या इतनी बारिश हुयी की लोग चिड़ कर उन इलाकों से पलायन कर रहे है । ये सब मेरे , आप और समुद्र के बीच की बात है । इसे हमें ही सुलझाना होगा । 

सागर की मछलियाँ कूद-कूद कर बाहर आ रही है। कोई तो कारण होगा कि मछलियों को जमीन अब ज्यादा साफ और रहने लायक लग रही है। बहुत ज्यादा लंबी जिंदगी जीने वाले कछुओं ने मछलियों को तड़पते देखा है इसलिए जीवन के प्रति अब वे  काफी उदास हो गए हैं और प्रजनन के मौसम में तटों पर आने से बचते हैं या घबराकर बहुत ज़्यादा अंडे दे देते हैं । डॉल्फ़िन और आक्टोपस इंसान के साथ ताल मेल बैठाने में लगे हुये है । इनके अतिरिक्त सागर के सदाबहार जंगल गल रहे हैं । उन पर एसिड अटैक हुआ है । सागर का नमकीन पानी लगातार खट्टा होता जा रहा है । ये खट्टास हमारे और सागर के संबंधों में किसी दूसरे या तीसरे ने नहीं घोली है । 

बर्फ़ीले पहाड़ पिघल रहे हैं । पत्थरों के ढेर ढह रहे हैं । मैदानों में सूखे कि मार से हाल बेहाल हो रखा हैं । नदियाँ रास्ता भटक गई है । पिता पर्वत और पुत्री नदी के संबंधों का यह नया दौर है । मनचली और राह से भटकी नदियाँ जल्दी सूखने भी लगी हैं । नदियाँ उधार के बरसाती पानी से मौसमी उफान तक सीमित हो चली हैं । ये इनके सदाप्रवाही से मौसमी होने और अंततः लुप्त होने कि कहानी है। 

गाँव मासूम नहीं रहे । गाँव में ठगने वाली गलियाँ नहीं हुआ करती थी । पहले कोई गाँव में भटका नहीं था । सभी अपने-अपने होते थे लेकिन आज रोजी रोटी के लिए सभी गाँव छोड़ के चले गए और झोपड़ियाँ , खुफिया वीरान इमारतों मे तब्दील हो गई हैं । सड़क के किनारें के आम के बगीचों के गुमनाम मालिक पता नहीं कहाँ से आ गए है ? जिसे न तो हम और पेड़ पहचानते है । इसलिए गाँव अब पिछड़े तो हैं पर मासूम नहीं है।

शहरों का विस्तार हुआ है । ये कुपोषित मोटे वयस्क के समान अपना वजन स्वयं उठा पाने में असमर्थ हो गए है और डैबिटीज़ , कैंसर, एड्स जैसे घातक रोगों से ग्रस्त हो गए है। शहरों में नहाना जरूरी होता है, यहाँ लोग जल्दी गंदे हो जाते हैं । शहरों में नहाने के लिए पानी गाँव कि नदियों, तालाब से जाता है। गाँवों से शहरों में कच्चा माल, मज़दूर, नयापन, भोलापन, संस्कार और मैं या आप जाते हैं। हम शहरों को अपने खून पसीने से सींचते हैं । सिकुड़कर सोते है जबकि गाँव में हमारें खेत के खेत पड़े हैं । जब हम शहरों में रम जाते हैं तो बिजली के कारखाने हमारी खेती कि ज़मीनों पर खड़े हो जाते हैं ।

    

शनिवार, 18 जून 2016

गिव एंड टेक : टू सिम्पल टु लर्न

लेन-देन तो लगा ही रहता है । जन्म के समय पैदा करने वाले को दर्द देते हैं । फिर दुनिया में आकर भी लेने-देने में लगे रहते हैं । मनुष्य होने के नाते हम आमतौर पर दर्द, दुख, कष्ट, धोखा, रोग आदि देने से किसी को भी बचते हैं और सुख, धन, स्वास्थ्य, ज्ञान, शांति, प्रेम देने की इच्छा रखते हैं । हम शुरू में सभी को वही देते हैं जो उनसे अपने लिए चाहते हैं या जो उनके लिए अच्छा होता है । लेकिन फिर हम जैसे-जैसे बड़े होते जाते हैं । लेन-देन से पहले सोचने लगते हैं । हम संबंधों का स्तरीकरण कर उनके लिए व्यवहार सुनिश्चित कर लेते हैं । निश्चय ही ऐसा करने से जीवन आसान हो जाता है परंतु हम पूर्वाग्रहों से ग्रसित हो जाते हैं ।  

पूर्वाग्रहों से ग्रसित जीवन सीमित, संकुचित सोच वाला और बेहद आसान होता है । ऐसे जीवन में निर्णय का सर्वाधिक अधिकार हम अपने पास संजोकर रखते हैं । ये किसी कंपनी के अधिकतम शेयर अपने पास रखने जैसा हैं जबकि ऐसा करना किसी खास फ़ायदे और कायदे का काम होता नहीं है । 

परंतु फिर भी दुनिया भर के लोग लेने कि अपेक्षा देने के लिए ज्यादा इच्छुक दिखते हैं । वो ऐसा इसलिए भी कर सकते हैं क्योंकि वो ऐसा मानते हैं कि देने से लेन-देन शुरू होता हैं । आज हम दे रहे हैं कल हमें भी कोई देगा । देना भले ज्यादा लेने जितना सुखप्रद न हो पर उसमें कुछ बेहतर मिलने कि आशा होती हैं  इसलिए हर देने वाला व्यक्ति आशावादी तो होता है । लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जो सिर्फ देने के लिए देते हैं उनको बदले में कुछ बेहतर या बदतर कि अपेक्षा नहीं होती है ।  

हम प्रायः लेन-देन में दूसरों के लिए मानवीय भावनाओं या सुखदायक काया कि कामना करते हैं और अपने लिए रखते भी हैं। ऐसा अक्सर बुद्धिजनों के मुख से सुनने को मिल जाता हैं कि मनुष्य कि वास्तविक संपत्ति तो उसका स्वस्थ शरीर हैं और स्वस्थ शरीर में चंगे मन का वास होता है । लेकिन हम इनके इतर धन-दान को ज्यादा लालायित रहते हैं । ऐसा शायद धन के सर्वसुलभ साधनों के पर्याय के रूप में स्वीकार हो सकने की खूबी के कारण है । धन हमारे पास समान्यतः इतना होता है कि हम दे सके इसलिए लोग खुलकर देते भी है । 

लेकिन धन आधारित समाज में धन-दान सिर्फ पुण्य का मामला नहीं रह जाता है । ऐसा लोग अन्य विविध कारणों से भी करते हैं जैसे टैक्स से बचने के लिए , समाज में नाम के लिए , काला धन छुपाने के लिए और समग्रता में देखे तो दिखावे के लिए भी धन-दान करते हैं । 

शास्त्रों में लिखा है क्षमा देने वाले को बड़े हृदय का माना गया है । ऐसा व्यक्ति महामना होता है । ऐसे ही दान और दानी के अन्य गुणगान किए गए है। इसलिए दान एक प्राचीन कालीन कार्य है। फिर भी लोग दान कर कैसे पाते हैं ? अर्थात क्या वे दान इसलिए करते हैं कि उनकी संपत्ति दिन दूनी रात चौगनी बढ़े या वे इसलिए धन-दान करते हैं ताकि अपने पाप कम कर सके। क्योंकि धन का दान सबसे बेहूदा किस्म का दान है । जिसका कोई आधार नहीं होता है । एक दिन दुनिया में लोगों के देने के लिए पैसा बचेगा क्योंकि वे तब न तो अपने किए के लिए माफी मांग सकेंगे और न ही स्थितियों को बदल सकेंगे । गिनती के छपे हुये नोट एक हाथ से दूसरे हाथ होकर जब जरूरतमन्द तक पहुँचते है तब तक उनकी कीमत में बट्टा लग चुका होता है । 

दान, अमीर गरीब को देता है । ये एक उपभोगी के द्वारा एक कम खर्चीले और संयमी को दिया जाने वाला रॉयल्टी है । चूँकि मैंने तुम्हारे हिस्से के भी संसाधनों का मजा लिया है इसलिए तुम कुछ पैसे लेलों और चुप रहो । 

धन-दान गरीबी के कुचक्र का कारण है । ये ऐसा ऋण है जिससे जीते जी उऋण नहीं हुआ जा सकता । ये दमित के शोषण का मुलायम तरीका है । मजबूर, मालिक के रहम तले दबा रहता है । मालिक अक्सर कहता है जब पैसे होंगे तब दे देना, इतनी जल्दी भी क्या है ? ये शोषक - शोषित के संबंधों को पोषित और दीर्घजीवी बनाने का प्रयास है। 

संसाधनों के अकाल के काल में जमीन को छेद के सोना मंदिरों में दान दिया गया है। साफ पानी , साफ जमीन , साफ हवा , हरे-भरे जंगल उजाड़ के जो पैसा मिला उससे आनंद उठाने के बाद कुछ हिस्सा दान किया तो क्या किया ? अगर आज भी असमानता है तो ये क्यों है ? 

वास्तव में जो दे रहा हैं उसकी बैलेन्स शीट खुद नेगेटिव में है । शुरुआत में समाज जब कबीलाई था, संपत्ति का अधिकार नहीं था । सभी के हिस्से बराबर थे । तो आज मैं पूछता हूँ तुम्हारे पास मुझसे ज्याद कैसे ? इसकी प्रश्न की कोई सशक्त व्याख्या होती नहीं है । क्योंकि सभी के अपने-अपने कारण है ।  

कोई मुझे या किसी को क्यों दान देता है या याचक कि तरह हमें किसी से मांगना क्यों चाहिए ? आमतौर पर हक़ मागने वाली आवाज़ को दबा दिये जाने का चलन है और जब तक ऐसा है तो जिनके पास ज्यादा है वो चोर है, क्योंकि दान अधिकार है भीख नहीं ।



रविवार, 15 मई 2016

मिसमैनेजड वीमेन एम्पावरमेंट :अ अपकमिंग थ्रेट

" एक समय था जब भारत में जैविक रूप से पुरुष के रूप मे जन्मना मजे की बात होती थी और त्राश का कारण भी । लेकिन अधिकांश पुरुष आबादी ने तो मजे ही किए थे । अब भी यही हाल है "

    (पिछले दो दशक से भारतीय समाज मे लिंगानुपात में काफी सुधार आया है। जनसांख्यिकीय ढाँचे में भी बदलाव आया है। मानव विकास सूचकांक में भी भारत साल दर साल कुछ पायदान ऊपर चढ़ रहा है। मातृ मृत्युदर और फलतः शिशु मृत्युदर को कम करने के लिए हम कटिबद्ध है। केंद्रीय सरकारी योजनायें जैसे ' बेटी बचाओ  , बेटी पढ़ाओ  ' , 'जननी सुरक्षा योजना ', ' सबला योजना ' , 'समन्वित बाल विकास योजना'  जारी है। हम पिछले कुछ पंचवर्षीय से डेटा डिफिसीएंट से नियमनिष्ठ डेटा मैनेजमेंट की ओर बढ़ रहे हैं। अब ये बात कहना पुरानी और सुनी सुनाई बात लगने लगी है कि महिलाओं ने किसी विशेष क्षेत्र में सर्वजन अपेक्षित सर्वोच्च सफलता को हासिल कर लिया है।  )
       
     इतने प्रपंच के बाद महिलाओं की स्थिति सुधर रही है। ठीक है ! मान लेते है लेकिन क्या बालिकाओं  के पक्ष में झुकते लिंगानुपात की पूर्व शर्त यह हो गई है कि उनको सफल होना ही है ? 

      मतलब अतीत में कभी भी बच्चों के लिंगनिर्धारण में पुरुषों को वरीयता देने के पीछे इतने अधिक कठिन और उच्च मापदण्ड नहीं रखे गए थे। पुरुषों के सम्बन्ध में तो बस इतना कहा जाता था कि ये कुल दीपक है , परिवार की मर्यादा की गंगा और वंश वृद्धि कि शक्ति का एकमात्र स्त्रोत ये ही है। कभी बच्चों के जन्म में ये पूर्वशर्त नहीं रखी गई कि तुम्हे भी पहाड़ ही तोड़ना है अन्यथा तुम्हारा जन्म निरर्थक माना जायेगा. वो तो अनलिमिटेड वैलिडिटी वाला वीज़ा लेके आये थे। लेकिन 
      आज के सामाजिक परिवर्तन की ये छुपी शर्त सी महसूस हो रही है कि देखो लड़कियों ! तुम्हे जन्म तो लेने दे रहे हैं लेकिन अगर कुछ करके नहीं दिखाया तो जानती हो कितने निर्दयी थे हम ? अपनी सलामती चाहती हो तो कुछ तमाशे और हुनर के कुछ कारनामे दिखाओ। तुम निरपेक्ष नहीं हो ,तुम्हे हमने किसी के नुकसान पर कमाया है। ऐसे में ये कैसा दबाव थोपा रहे  है आप मुझ पर  ? ये दबाव नहीं , तुम्हारे बचे रहने की पूर्वशर्त है, यही हमारी मर्जी है।  

     अभी तो शहर बसना ही शुरू हुआ था कि एक रात एक अंजान आंधी आई और सब सपाट कर गई।  ये हर लड़की के बस में नहीं है कि वो अपने जन्म को सार्थक ही साबित कर के दिखा पाए। इसलिए मानवीय जाति की इस अपरिष्कृत और अनंवेषित शक्ति के प्रति सहज व्यवहार की अपेक्षा है। लड़कियां, लड़को की अस्थाई स्थानापन्न नहीं अपितु उनका एक समरूप और सशक्त विकल्प है।  और मार्क्सवाद और गांधीवाद भी ऐसा ही कुछ मिलाजुला कहते है कि व्यक्ति के निर्माण में उसकी परिस्थितियों की पर्याप्त भूमिका होती है। ऐसे में केवल लिंग के रूप में एक जैविक परिवर्तन मात्र हो जाने से सत्चरित्र का ही निर्माण हो जायेगा भरोसे  लायक बात बहुत लगती नहीं है। लेकिन वैधानिक और प्रशाशनिक रूप से सरकार के काम इस दिशा में शून्य भी नहीं कहे जा सकते। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कई ऐसे निर्णय सुनाए है जिनमें घर में बालिका को बालको सदृश ही मानने की प्रेरणा मिलती है। 
     
    भारत में वैचारिक बदलाव हो रहा है। शैक्षिक और स्वास्थ्य के मामले में चेतना जागृत हो रही परन्तु पता नहीं किन अदृश्य हाथों ने भारत सरकार को सामाजिक क्षेत्र में खर्च करने से पूर्व रोक रखा है।और इनके दुष्परिणाम भुगतने के लिए हमें असहाय छोड़ देते हैं। 
      ऐसा हो सकता है सामाजिक इंजीनियरिंग के इस एक्सपेरिमेंट में सभी के हाथ उम्मीदों के अनुरूप फल हाथ न लगे और कुछ को ये डर भी हो सकता है कि महिलाओं की यह अनियंत्रित और गैरजवाबदेह संख्या समाज के हित में नहीं है। ऐसी स्थिति में सभी करे कराये पर पानी फिर जायेगा, क्योंकि ईमारत बनाने में साल और महीने लग जाते है पर गिराने को एक झटका ही काफी होता है। यही प्रकृति का नियम भी रहा है क्रमिक विकास चुटकी भर समय में न होकर कई वर्षो तक चलने वाली घटना श्रृंखला के बाद ही एक प्रजाति दूसरे का स्थान लेती पाती है।  

     फिर भी क्यों भारत में महिलाओं के शक्ति में इजाफा और इस शक्ति के कुप्रबंधन के दुष्परिणाम देखने को मिल सकते है  ? 

    ऐसा क्या नहीं देखा भारतीय नारियों ने ? जौहर करती रानियाँ , मंदिरों में नाचती देवदासियां, अवैध मानवतस्करी के रूप में बालिकाओं का घृणित कामकाजों में नियोजन और भी बहुत कुछ। इन सब के पीछे कल तक पुरुष के होने का विश्वास था। धीरे-धीरे ये विश्वास शक में बदलता गया क्योंकि एक महिला ही दूसरी की दुश्मन बन बैठी और अब ये विश्वास एक अन्धविश्वास में तब्दील हो जाने की चौखट पर है क्योंकि  निरंतर उत्कृष्ट प्रदर्शन, सामजिक प्रतिष्ठा और वर्चस्व के लोभ में भारतीय नारी किसी भी हद तक जा सकती है, इसमें संदेह नहीं है। इतिहास में उसे इतना पतित कर दिया गया था कि वर्तमान में वैसे जीवन को विकल्प के रूप में चुनने में उसे तनिक भी संकोच नहीं होना चाहिए। 

      

      
     

रविवार, 8 मई 2016

क्योंकि बच्चों ने देखा है माँ किस तरह पिता जी से बात करती है !!!!

किसी भारतीय महानगर के एक प्रगतिशील परिवार के घर के भीतर का हाल लेकर आया हूँ आपके लिए । परिवार में सिर्फ दो और उनके दो है । विपिन , रिंकि से छोटा है । विपिन और रिंकि कि माँ एक वर्किंग वुमन है और पापा घर संभालते है ।  मतलब पापा कुछ नहीं करते है ।  (अब आगे )


बच्चो ने अपनी आंखों से देखा है अपने प्यारे पापा को दिन भर घर का काम करते हुये । झाड़ू, पोंछा करते-करते उनकी तो कमर ही टूट जाती होगी । उसके बाद खाना भी तो बनाना पड़ता है । सुबह जल्दी उठकर दूध लेने जाना होता है और मम्मी के लिए चाय भी बनानी पड़ती है क्योंकि तभी मम्मी कि नींद खुल पाती है । थोड़ी सी भी अगर देर हो गई तो मम्मी तो पापा पर बहुत गुस्सा होती है । इन सबके बाद भी मम्मी तो कितना घूमती है पर पापा दिन भर घर के काम मे लगे रहते हैं । ऐसे में विपिन, हमने जो मदर्स डे के गिफ्ट के लिए पैसे सेव किए है उन पैसों से हम फाथर्स डे पर पापा को गिफ्ट देंगे । मजे की बात ये है कि फथर्स डे ,मदर्स डे के बाद आता है । ( बच्चों  ने  तो मदर्स डे कि हवा ही निकाल दी )

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बहुत पढ़ा भैया और खूब पढ़ा । क्या चातुर औलाद पाई है, तूने माँ । तेरे एहसानों को तुझको ही गिना-गिना के तेरे ही एहसानों में तुझे कैसा बंधा है ? वैसे तो कहने को पक्के दोस्त को थैंक यू नहीं बोलती हमारी ये पीढ़ी और मदर्स डे पर कैसे कृतज्ञता से लहूलुहान हो रही है । 
ये सब कुछ नहीं चोचले है इनके। डर गए है । ये आज कि औरत को कल कि माँ वाली कड़ुवाहट भरी जिंदगी थोपने के प्रपंच रचे जा रहे हैं । देखो आज कि लड़कियों  घर में रहकर चूल्हा चौका करना कितना महानता का काम है। गोल-गोल मकई कि रोटी बनाओगे तो एक दिन साल मे तुम्हारा बेटा तुमको शाबासी देगा ।
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जी जल जाता है, साहब ऐसे कपटी षडयंत्रो से । माँ को माँ बने रहने में  किसका हित है ये सब जानते हैं । उसके ऐसे घूचू बने रहने से खाने, धोने का टेंशन दूर रहता है माथे से । घर का काम करने वाला कोई तो चाहिए होता है न की नहीं । 
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मार्क्स ने सच ही कहा था, पूंजीवादी समाज के पनपने कि एक अनिवार्य शर्त है कि नारी को उसके शोषण का बोध न होने पाये। और भारत जिस पूंजीवादी समाज के रास्ते पर चल रहा है उसमें ऐसा बिलकुल होते दिख रहा है । 

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गली के चलताऊ भाषा में  बोलू तो माँ कसम ये पुरुष वादी मानसिकता का खेल है, मायाजाल है और साहब एक और बात है नारीवादी चिल्ला-चिल्ला के कहते हैं  कि स्त्री पैदा नहीं होती बल्कि बनाई जाती है । क्योंकि कि मैं ने आज तक एक दिन ऐसा नहीं सुना जब भारत में ये कहता हो कोई कि " वर्किंग मदर्स डे " मनाएंगे । ऐसा तो हो नहीं सकता न , क्योंकि ऐसे में इन रूढ़िवादियों कि जान चली जाती। मुझे आश्चर्य नहीं है कि बजरंगदल के जोशीले नवजवान मदर्स डे का विरोध क्यो नहीं करते, कारण साफ है ऐसा कर पाने के लिए उनको समझ में भी तो आना चाहिए कि गलत क्या है ? और सही क्या है ? ,वो तो  भेड़ चाल चलने के माहिर है । 
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ऐसे में एक शानदार स्लोगन याद आता है कि स्त्री वो सब करने के लिए नहीं बनी है जो पुरुष करते हैं बल्कि वो तो वो सब भी करने के लिए बनी है जो पुरुष नहीं कर सकते हैं  ।  ऐसा क्या हो गया कि पुरुषों के रिकॉर्ड बनाने  का इंतज़ार करें  , और फिर उन रिकॉर्ड को तोड़ने वाला बने। 
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लेकिन मजे कि बात ये है कि इतने प्रपंचो के बाद भी बदलाव कि लहर तो चल चुकी है। विदेशों में और कुछ भारतीय महानगरों में अब ये चलन बढ़ रहा है जब परिवार में पिता घर संभालते हैं और माता काम पर जाती है। ऐसे परिवारों मे फथर्स  डे ज्यादा दिलचस्पी से मनाया जाता है, न कि मदर्स डे क्योंकि बच्चों ने देखा है माँ किस तरह पिता जी से बात करती है।

मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

लेटैस्ट ट्रेंड इन सोसाइटी : द पावर ऑफ मनी

लगभग सब कुछ ठीक ही था। जिस समय की बात है उस समय एक बेटा और दो बेटियाँ होना शायद कोई बड़ी बात नहीं थी। घर भी नौकरो से गुलजार था। प्रेमचंद लिखते है निर्मला के लिए  शादी का रिश्ता आया है। रिश्ता एक अच्छे परिवार से आया है, लड़का काफी पढ़ा लिखा और परिवार भी खानदानी है। लेकिन ये क्या? विवाह की तैयारियों के बीच निर्मला के पिताजी की हत्या हो जाती है। अब निर्मला का विवाह उस परिवार मे न हो सकेगा क्योंकि वो बड़े खानदानी है और उनकी नजर लड़की के साथ-साथ लड़की के पिता की दौलत पर भी थी ।

(आर्थिक कारकों को व्यक्ति इतना महत्व क्यों देता है? क्या आर्थिक कारक सचमुच मे महत्वपूर्ण है ? समाज के द्वारा पैसो को महत्व देने पर व्यक्ति भी पैसो को महत्व देने लगता है या व्यक्ति के द्वारा पैसो को महत्व देने पर समाज भी उसी अनुसार चलने लगता है । दोनो मे से कोई भी बात पूरी तरह सही नहीं है । आंशिक रूप से दोनों का ही प्रभाव रहता है। ये एक दूसरे के समानार्थक नहीं अपितु पूरक है।)

अंततः निर्मला का विवाह वहाँ नहीं हो पाया जहा उसके पिता स्वर्गवासी होने के पहले तय करके गए थे , ये केवल नारी के शोषण की गाथा नहीं है, ये उसके अभावग्रस्त और निर्धन होने की मजबूरी है। निर्मला जैसी सुकुमारी का विवाह एक अधेड़ उम्र के सेठ से होने की घटना अधेड़ के केवल सुखवादी होने की बात नहीं है बल्कि उसके धनाढय होनी की खशियत है।

(इसी बीच प्रेमचंद लिख ही देते है पैसा सब कुछ नहीं है लेकिन जो चीज़ सब कुछ है उसके बहुत करीब की चीज़ पैसा है। इसीलिए शायद भगवान विष्णु मोक्षदाता है तो देवी लक्ष्मी धन देवी है । लीजिये सबकुछ के नजदीक तक धन पहुँच गया ।)

इस सब के बीच दो नवजवानों के मन की उधेड़बुन को सुनते है और देखते है आज का मन क्या कहता है ? रोशनी आज के जमाने की लड़की तो नहीं है पर उसे आज के जमाने के अंदाज़ो को अपनाने से गुरेज भी नहीं है। ज्यादतरो की तरह उसने भी अपने साथी के साथ जीने मरने की कसमे खाई थी । लेकिन अचानक समय के गुजरने के साथ क्या हुआ , किसी को पता नहीं ? रोशनी का करीबी उसका हमदर्द, उसका पहला प्यार मृणाल आज एक मध्यम दर्जे की आय कमाता है। उसकी तंखावह कोई 20000 रुपये महीने है , शायद बाद मे बढ़ भी जाए लेकिन अभी तो इतनी ही है । ऐसे मे अगर दोनों की शादी हो जाए तो जितना मैं जनता हूँ मृणाल रोशनी को हर संभव सुख देने का प्रयास करेगा । लेकिन एक दिन रोशनी के लिए एक रिश्ता आता है परिवार काफी खानदानी है , लड़का काफी पढ़ा लिखा है और कमाता भी अच्छा है । ऐसे मे इस बात को रोशनी मृणाल को बताती है और दोनों कुछ बाते करते है –

रोशनी – मुझे तो बहुत अजीब लग रहा है । पता नहीं पिता जी क्या निर्णय लेंगे ? उनको तो मेरे और तुम्हारे बारे मे सब पता है ।
मृणाल – तो वो लड़को वालों को माना क्यों नहीं कर देते ।
रोशनी – कैसे कर दे ? पिता जी कहते है - ऐसा खानदानी परिवार और रिश्ता फिर मिले न मिले क्या पता ?
मृणाल – लड़का मुझे से ज्यादा कमाता है ।
रोशनी- हाँ ! उसकी शुरुआती तंख्वाह कोई 60000 है और पिताजी का कारोबार भी है। महीने के यही कोई मोटा-मोटा डेढ़ लाख रुपये घर आते है ।

क्या इनके बीच की बातो को हमे और आगे भी सुनना चाहिए, मुझे लगता है नहीं । क्योंकि रोशनी एक समझदार लड़की है। उसकी किस्मत अगर निर्मला के जैसे हुयी तो एक हाथ मे उसके मृणाल जैसा प्रेमी है और सब कुछ ठीक रहा तो शानदार कमाऊ पति । हाँ ! मैंने तो मृणाल को रिजैक्ट कर दिया क्योंकि पति कमाऊ ही अच्छा लगता है। वैसे भी समाज में सम्बन्धो को गढ़ते समय लड़के की आय और लड़की की सुंदरता समानुपातिक रूप से तौली जाती है।  

इसप्रकार की द्वन्द्वत्म्क परिस्थितियो मे या तो मृणाल रोशनी से ये कहकर पहले दूर हो जाए कि उसे कोई लाइलाज बीमारी हो गई है और वो ज्यादा दिनो का मेहमान नहीं है। और ऐसा कहने मे कोई हर्ज़ भी नहीं है क्योंकि अभावग्रसत्ता एक बीमारी ही है, एक लाइलाज बीमारी । या इंतज़ार करे कब रोशनी उसे अपने जीवन से निकाल उसी तरह फेंक देती है जैसे लोग दूध मे से मक्खी को निकाल फेंक दिया करते है। 

ऐसे मे क्या ये निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि जो संबंध बनते भले ही भावनाओ के आधार पर है पर उनका जीवनकाल भावनाओ पर नहीं टीका होता । 

गरीबी पैसे का अभाव है और भुखमरी को जनमती है । भुखमरी अनाज की कमी नहीं है । ये पैसो के अभाव मे खाना न खरीद पाने की मजबूरी है। सरकार कहती है जिसके पास पैसा है उसके हिस्से का अनाज गोदाम मे रखा है और जिसके पास पैसे नहीं है उसके हिस्से के अनाज को चूहे खा गए ।

सरकार ने व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए बोलने कि, घूमने कि, कही भी बसने, किसी भी धर्म को मानने कि स्वतन्त्रता तो दी है लेकिन इससे पहले उसने व्यक्ति को समानता दी है। समानता आर्थिक क्रियाओ मे भागीदार होने का। ये समानता के अधिकार के कवर मे आर्थिक स्वतंत्रता का अधिकार छुपा हुआ है। ये आरक्षण केवल समानता नहीं, आर्थिक स्वतंत्रता है क्योंकि वो धन ही है जो जाति से टक्कर ले सकता है। 

दुनिया मे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के बाद व्यक्ति सिर्फ आयकर विभाग के प्रश्नो का जवाब देने के लिए बाध्य होता है । ऐसा जीवन एकाकी नहीं होता, चाटुकार हमेशा साथ होते है , बोरियत भी नहीं होती ।



रविवार, 17 अप्रैल 2016

अब समय आ गया है कि !!!

" मानवाधिकारों पर लेशमात्र भी आँच आने पर मानवाधिकार आयोग सक्रिय हो जाता है, होना भी चाहिए । क्योंकि मामला भी तो दुनिया के सबसे होनहार, समझदार दो पैरो वाले जीव से जो जुड़ा है । मगर मानवाधिकार अब आत्यंतिक रहने लायक बचे नहीं है क्योंकि मानव अब मानव बचा नहीं है। संविधान ने वो दौर भी देखा जब जमींदारी के लिए भारतीयों को दिए  मानवाधिकारों पर प्रश्न उठे, तो अब भी कई नए प्रश्न उठे है । जब व्यक्ति स्वयं से नहीं समझ रहा तो अब कानून का सहारा लेना ही पड़ेगा । "  
    सभ्यता का विकास भी क्या खूब अंदाज़ से हुआ । पहले समाज शिकारी था फिर पशुचारक और कृषक बना । और आज ज्ञान के गट्ठर ढो रहा है । क्या से क्या हो गए हम  ?

     मगर अब तो एक नया भाग जुड़ेगा या भाग 3 (क) बनेगा । और शीर्षक होगा - पशुओ के मूल अधिकार ।  तो क्या करे । संविधान तो बदलना पड़ेगा । वैसे पहले से एक कानून है बिलकुल अपाहिज शक्तिमान जैसा है , अरे वही शक्तिमान, जिसको उत्तराखंड के बी०जे०पी० विधायक के हाथों अपने  पैर से हाथ धोना पड़ा ।

     ऐसे मे कौन बचाएगा शक्तिमान को ? क्या कहा - कानून । कानून का नाम बता दू , बताता हूँ - पहला है, पशुओ पर अत्याचार रोकथाम अधिनियम, 1960 । लेकिन कानून तो कानून ही है। और दूसरा है ,आईपीसी सेक्शन 429 । आईपीसी मे तो बड़ी जबर्दस्त बात लिखी है,  मैं मूल पंक्तिया ही छापे देता हूँ -  https://indiankanoon.org/doc/3563/  इस लिंक पर जाकर जरूर पढ़े । क्योंकि देने को तो कुछ नहीं लेकिन धरे गए ।  जैसे की विधायक जी धरे गए है तो पाँच साल की सजा तक हो सकती है ।

      ऐसो मे एक बात तो साफ है जानवर मारने - पीटने की चीज़ न है । उनको भी दर्द होता है । और वो भी रोतो है ।  


      लेकिन आज कल ये आम आदमी की दिल्ली सरकार मे जनवरन की खैर नहीं है । अभी विडियो शेयर हो रहा है की कोई ग्रीन पार्क मेट्रो स्टेशन की सीढ़ी मे बैठकर कुत्तन को चाकू से घायल कर रहा है । और एक पिल्ला का तो उसने वध भी कर दिया । कुत्तो का सिरियल किल्लर पैदा हो गवा है । एक दम राक्षस हो गवा है। लेकिन पुलिस भी विडियो को खंगाल के उको पकड़ ही ली । लेकिन इतने मे काम नहीं बनने वाला । पता चला है दिल्ली का गौतम बुध नगर जनवरन की कब्रगाह बन गया है । सबसे ज्यादा बेजुबानों पर अपराध वही हो रहे हैं ।


     ये हाल तो राजधानी का है । उसके बाद देश पर नजर डाले तो, खबरों की हैड लाइन कुछ ऐसी मिलती है - एक व्यक्ति कर रहा था, कुत्ते के साथ बलात्कार । प्यासे जानवर को इतनी बेदर्दी से मारा की चली गई उसकी जान । जानवरो को बूचड़खाने मे कितनी क्रूरता से मारा जाता है वो तो मुद्दा ही नहीं है, गाय को छोड़कर ।  हाँ ! अगर कोई नोनवेज खाने को दे तो एक बार ऐसे मे पूछना जरूर बनता है , ये क्या है ? क्योंकि आजकल सब कुछ उपलब्ध है ।

     दुनिया मे ऐसे देश भी है जहा जानवरो से बेहतर बर्ताव किया जाता है लेकिन शायद ही ऐसा कोई देश होगा जहा मांसाहार के नाम पर उनको न काटा जाता हो इसलिए मांसाहार को छोड़कर बचे जानवरो पर किए जा रहे बर्ताव को ध्यान मे रखकर देखते है तो पता चलता है लगभग ज़्यादातर पश्चमी देश जहा इंसान मजे से है वहा जानवर के भी मजे है । ऐसे मे नाम गिनने से कुछ खास मिलने वाला नहीं ।
     क्योंकि जब रुस या अमेरिका लंबी दूरी की इंटेर्कोंटीनेंटल मिसाइल इराक या सीरिया पर दगता होगा तो क्या वहा के जानवर बच जाते होंगे। नहीं वो भी राख उनके मालिक भी राख । बिलकुल वैसे ही जैसे हड़प्पा कालीन कब्र की खुदाई मे मानव की अस्थियो के साथ कुत्ते के भी अस्थिपंजर मिले थे। मुसीबत मे गेंहू के साथ घुन भी पिस्ता है । अबे , जानवर आतंकवादी थोड़ी है । जानवर जिहादी थोड़ी है । गधा या बकरा इस्लामिक स्टेट का वफादार कब से हो गया ? लेकिन हो गया जानवर जो ठहरे । उनकी कौन सुनता है ?

      सेंसरबोर्ड भी क्या बैन करता है ? घंटा । अच्छे अच्छे डाइलॉग मे बीप गुसा गुसा के उनकी बीप बीप एक कर देता है । लेकिन अगर डाइलॉग कुत्तो पर हो तो क्या बात ।  गोविदा बोलते है - " जब दस कमीने मरते है तो एक कुत्ता पैदा होता है , मैं पूछता हूँ गोविंदा को ये दिव्य ज्ञान कैसे हुआ ? नहीं पता ।  इसके बाद सुरवीन चावला बोलती है - पागल कुत्ता और आवारा हाथी दोनों बंदूक की गोली के लिए बने हैं । और अंतिम मे बसंती इन कुत्तो के सामने मत नाचना । एक और ये वाला पक्का अंतिम है - जगिरा जी बोलते है इंडिया गेट मे मेरे मन को भाया मैं कुत्ता काट के खाया । मैं पूछता हूँ ये सब क्या है , माइ लॉर्ड । यही इंसाफ है । कानून की देवी कब तक आंखो मे इसी तरह  पट्टी बांध के रखेगी और उसके कुत्ते जुल्म सहते रहेंगे और हाँ ! घोडा और हाथी भी ।
   
      इसके बाद डबल्यूडबल्यूएफ़ , पेटा , वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन सोसाइटी ऑफ इंडिया और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एनिमल वेलफ़ैर जैसी संस्थाए क्या कर रही है ? कुछ तो करनाल मे भैस का क्लोने पैदा कर रही , कुछ चीता पकड़ रही , कुछ बाघ की गिनती कर रही , गंगा की डॉल्फ़िन बचा रही , चंबल से डोलफिनो को निकाल के दूसरी नदी मे डाल रही । या गिद्ध बचाओ, गौरैया बचाओ , गाय बचाओ, शेर बचाओ । यही सब चल रहा है । लेकिन ऐसे मे घोडा , कुत्ता और गधे का हाल पूछने वाला कोई नहीं है । बिलकुल अकेले पड़ गए है ये ।
    मैं पूछता हूँ आदमी का बच्चा किसके साथ खेलेगा , कुत्ते के साथ । आदमी का बच्चा किसकी सवारी करेगा , घोड़े की । और यही कष्ट मे है ।
 
    इसलिए कुत्ते को भोकने दे क्योंकि  कुत्ते तब ज्यादा भोकते है जब वो अकेलापन महसूस करते है । उनकी भावनाओ को समझे और उनपर अत्याचार करना बंद करे। और देश मे पशुओ के अधिकार की मांग जायज है इसका समर्थन करे। जानवरो से ही दुनिया गुलजार है  क्योंकि इंसान जानवर बन गया है  और  बेजुबान इंसान ही काम के है और वो कम  रह गए है । 
 
 
  

रविवार, 10 अप्रैल 2016

यह एक सामान्य व्यवहार है !!!

सुअर धरती में रहने वाले,
कुछ होशियार जानवरो में से है।
यहाँ तक की उन कुत्तों और बिल्लियों से भी ज्यादा, जिनके साथ हम रहते हैं । 
डॉल्फ़िन और हाथियों की तरह,
सुअर समझते है कि दर्पण कैसे काम करता है ?
और उन्हें कुछ सरल वीडियो गेम,
खेलना भी आता है ।

जब रात में वो सोते है ,
तो उन्हें सपने आते हैं ।
और उसके बच्चे अपना नाम जानते है,
और उत्तर देते हैं, जब उन्हें पुकारा जाता है ।
कुत्तों की तरह ही,
सुअर भी वफादार और स्नेही होते हैं ।
उन्हें उनका पेट अच्छे से रगड़े जाना पसंद है ।

बाड़ भले ही उनके और बच्चों के लिए भयानक था ।
लेकिन इसने उनकी जान बचाई ।
एक फैक्ट्री फॉर्म में,
अपना जीवन,
एक छोटे से धातु के पिंजड़े में बिताते हैं। 
जिसमेँ वो बड़ी मुश्किल से हिल डुल पाते हैं ।
वो ऐसे तंग परिस्थितियों में रखे जाते हैं,
जहाँ तनाव और मानसिक उतेजना की कमी
उनको पागल कर देती है ।

उनके बच्चे उनसे जन्म के बाद ही,
दूर कर दिए जाते हैं।
और बिना दर्द नाशक के ,
उन्हें बधिया बनाया जाता है।
और उनकी पूँछ भी काट दी जाती है।

वो बीमार होते, या
वो काफी तेजी से विकसित नहीं होते,
तो उनका सर ज़मीन पर पटक कर,
मर दिया जाता है ।
या उन्हें डिब्बे में फेंककर,
गैस देकर मर दिया जाता है।
यह सब आम है। 

पुराने सुअरों के बच्चे गंदे बाड़े में ठूस दिए जाते हैं।
वो एक भी दिन बाहर नहीं बिताते हैं।
उन्होंने कभी भी अपनी पीठ पर,
सूरज को महसूस नहीं किया ।
और न ही अपने पैरों के नीचे घास को ।

सिर्फ छह महीने की उम्र में,
उन्हें परिवहन ट्रको में भरकर,
उनका वध करने वाले करखानों में,
उन्हें भेज दिया जाता है ।
जहाँ उन्हें उल्टा लटका कर रखा जाता है।
बिजली के चिमटे से छेद किया जाता है,
और गले को काट दिया जाता है ।
सभी फार्म सुअरों के साथ,
अविश्वसनीय क्रूरता के साथ पेश आते हैं।
यह एक सामान्य व्यवहार है ।

सोमवार, 4 अप्रैल 2016

अनगिनत छेद है ।

बीते सालों में,
ज्यादातर घर पर ही रहा ।
घर की अपनी महिमा होती है।
घर निजता प्रदान करते हैं,
और निजी मामले भी तैयार करते हैं।

जो हर मामले को,
निजी करके टालता हो,
उसे व्यक्तिगत विषयोँ पर टिप्पणियॉ,
कम ही मिलती है ।

समाज और व्यक्तिगत जीवन में,
कुछ तो अन्तर होना चाहिए,
और सारा जीवन ही,
व्यक्तिगत नहीं होना चाहिए।

जैसे दीवारों के कान होते है ।
वैसे ही घर की दीवारों में,
एक और भी बात होती है,
तोड़ने और जोड़ने की,
क्यों कि जब बात,
हद से ज्यादा बढ़ जाती है तो,
ये ऐसे ही समाज से हमें जोड़ती है ।

अब जब मौके आए है,
महसूस करने को कि,
क्या क्या गलत किया था, मैंने?
ताकि सुधार,
गलतियों के आदत में ,
तब्दील होने से पहले,
पहल हो जाए।
तो मालूम होता है कि ,
ऐसे दल-दल में फंसे हुए को देखकर,
जिंदगी कि नई सीख समझाईस यही है ।
कि अम्मा की हर बात का तपाक से ,
जवाब न देकर, मौन हो जाये ।

वैसे भी अपनी ग़लतियाँ खुद को कहाँ दिखती है ?
वो तो दूसरों में नुक्स और नखरे गिना रहे थे तो,
याद आया ऐसा तो कुछ हमारे पास भी है ।
मगर अब जब समझ ही गए है ।
तो बात को क्यों इतना घुमाना,
जो जब समझा सो तब सुधरा ।

क्षणिकाए


(१ )
अँधेरी गलियों में चलते हुए ,
भयक्रांत मन को सँभालने के लिए ,
साहस को तौलकर पाता हूँ,
कि सचमुच गलियाँ सुनसान और खतरनाक हो गई है।

(२ )
दुनिया में एक दिन गुजारने  के बाद ,
जब आपने  बने बिगड़े कामों का हिसाब करता हूँ।
पाता हूँ कि अपने काम बनाने में।
मैं दुनिया से भी निचे गिर गया हूँ,
और बचे हुए समय जैसा कि है ही ,
ये दुनिया के जितना मैं बिगड़ के,
अपने बिगड़े काम बना न  सका।

(३)
किसी को कहते सुना था कभी ,
कभी ऐसे ही नज़र पड़ गई तो हो सकता है पढ़ा भी हो ,
कि सफलता कठिन परिश्रम मांगती है,
और मास्टर जी भी कहते है -
परीक्षा में सफल होना है तो पहले सरल सवाल किया करो।
मैं पूछता हूँ -
क्या सरल सवाल को ढूंढना सरल है ?
हो भी जाता है जब पेपर कठिन न हो ,
मुझे जंहा तक याद है।
मैंने तो पेपर कठिन ही देखे है।
मगर उनमे से अक्सर सरल सवाल ढूंढ ही लिया करता था।
 मगर ये काम भी  परिश्रम का होता था।

मंगलवार, 24 नवंबर 2015

एक अनन्त गहरा कुँआ !!!!

घनी झाड़ियों में छिपा हुआ,
एक अनंत गहरा कुँआ।
पाताल तक गहरा,
शायद उससे भी ज्यादा
कहते थे ऐसा सभी,
जब भी इसमें फेंका पत्थर,
जानने को कितना गहरा ?
आज तब एक आवाज नहीं किया।
गूँगा है,
बूढ़ा भी है।
अंदर के दीवारों की छपाई,
उधड़ गई है।
कोई अब नहीं जाता है उसके पास,
मनहूस भी है।
कहते थे ऐसा सभी,
लील ही लेता है।
जो भी गिरता है इसमें।

पता नहीं क्यूँ,
पर कई तो कूदे थे इसमें,
आज तक एक आवाज नहीं आई।
भूखा भी है।

आम हलचल से दूर,
अकेला पड़ा,
झाड़ियों ने जिसके मुँह को है ढक रखा।
एक अनन्त गहरा कुँआ।

मैंने एक दिन उसमें झाँका,
और आवाज़ लगाई ।
ओये! कुँए कब तक नहीं बोलेगा?
इतने दिनों तक चुप रहकर
शायद बोलना ही भूल गया।

हर बरसात के बाद मुँह में पानी,
भर कर बैठ जाता है।
इस बार सूखे,
पर कुछ तो बोलेगा।

अकेला अनमना सा,
उदास होगा शायद,
इसकी पसंद का ही कुछ
देकर देखता हूँ।
कितना कुछ व्यर्थ पड़ा है।
मेरे पास,

लेकिन कितना कुछ डालकर देखा,
एक आवाज़ न आई।
अब कि बार एक ऐसी चीज़,
उसके पास लेकर गया दिखाने को,
जो मेरी मनपसंद थी ।
मैं सतर्क था पर पता नहीं,
कैसे हाँथ से छूट गई ।

मैं चिल्लाया,
अंदर से भी वैसी ही आवाज़ आई।
मेरे पास से गई।
और उसको मिल गई।
एक के बाद एक,
मैं और कुँआ ।
उसका नाम पुकारते रहे।

तब से आज तक,
कुँए ने वही बोला।
जो मैं बोलता हूँ।

मैं ने पूँछा,
क्यों रे कुँए ?
मेरी दी हुयी चीज़ इतनी पसंद आ गई।
मैं तब से,
जवाब के इंतज़ार में चुप हूँ,
और शायद कुँए को अब मुझ से,
बात करने में दिलचस्पी रही नहीं।