बुधवार, 29 अक्टूबर 2014

क्षणिकाएँ

हम जिधर नहीं चाहते तुम जाओ,
उन गलियों में अपनी तश्वीर लगा देंगे ।
कोई काम न होंगे,
मगर तुमको तो मुसीबतों से बचा लेंगे ।
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जानते है तुम नहीं मिलोगी हमें,
फिर भी ये काम किया करते है ।
जब भी सोते है ,
बिस्तर में तेरे लिए भी जगह छोड़ दिया करते है ।
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ये कैसा पर्दा है ।
जब मैं तुम्हे देखता हूँ ,
तो तुम मुझे नहीं देखती ।
मगर जब तुम्हे मैं नहीं देखता ,
तो तुम ये देखती हो , मैं उस वक़्त और क्या देखता हूँ ।
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कपड़ें बहुत रंग के नहीं है मेरे पास,
भीड़ में भी आसानी से तुम पहचान सको ।
स्वाभाव भी कोई ढंग का नहीं है ।
जो तुम आसानी से हमको भूल सको ।
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चाहे मैं कहूँ या तुम कहो ,
एक सी बात हो ।
मुख अलग हुए ,तो भी क्या ?
एक भाव के संवाद हो ।
जान न पड़े , आखिर कहा किसने ?
वाणी भले दो ,
आश्चर्य ! एक विद्यमान हो ।
मिलकर क्या होगा ,
जब क्षण भर का ही साथ हो ।
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शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2014

माँ ! मैं कहे देती हूँ

माँ कहती है ,
तिथि त्यौहार है बेटी ,
घर मेहमान आयेंगे ,
तनिक तैयार तो हो जा ।

माँ ! जो भी आयेंगे ,
क्या मुझसे ही मिलने वाले आएँगे,
यदि मुझे देखने वाले भी आयेंगे ।
तो भी मुझे नहीं सजना ,

क्यूँ बेटी , इतना बस माँ कहती ,
और है चुप हो जाती ।

माँ ! मैं जानती हूँ ।
और तुम से कुछ छुपाना भी नहीं चाहती।
माँ ! देखने वाले तो आएँगे,
मगर मुझे आज से पहले तक हर दिन हर क्षण ,
देखने वाली आँखे न आएँगी ।
मेरे संजने में सौन्दर्य न होगा ।
दर्पण का सामीप्य भी व्यर्थ होगा ।
माँ ! मैं कहे देती हूँ ।
मेरा सजना - सँवरना किसी काम का न होगा ।
जब तक वो मेरी आँखों से आके न देखेगा ।
माँ ! तुम कितना मुझे सुन्दर कहती हो ।
मगर आज मेरे केशों की सुगंध और
तन की सुगढ़ता भी ,
देखने वालो को तो खिंच लाएगी ।
मगर मेरी इस बेकाम की आंगिक सुन्दरता ,
को अपने निश्चल नयनो में ,
सदा से खेलने वाले को न बुला पाएँगी ।

बुधवार, 22 अक्टूबर 2014

मैं भी पीता हूँ मगर ......

मैं चाय या काफी नहीं पीता हूँ, ये सामान्य नशा है । इसके अतिरिक्त जीवन की व्यस्तता में निद्राकाल सीमित हो गया, गाने सुनना बस यू ही अच्छा नहीं लगता, और कुछ सोच भी नहीं पा रहा जिसे मैं नशा कह सकूँ की मैं भी आपने शारीरिक, मानसिक असंतुष्टि के क्षणों को कायर की तरह किसी सामान्य से नशे में बिता सकूँ। हाँ ठीक से सोच लिया , बिलकुल नशा मुक्त हूँ । मगर एक नयी चीज़ सीख़ ली है । मै पहला ऐसा व्यक्ति तो हो नहीं सकता क्योंकि ये भी नशे का कारण और नशा है । मैं ने भी चुनौती स्वीकार कर ली है ।

संसार में इच्छाएँ करने का निषेध है , इच्छाएँ कभी तृप्त नहीं होती और असीम भी है और सबसे जरुरी दुःख का कारण भी । मै इच्छओं के पूर्ण न होने के लिए इच्छाएँ करता हूँ और अधूरी कामनाओं के साथ रोता भी हूँ , मगर मैने झूठ कहा था की मैं कोई सामान्य नशा नहीं करता । हाँ , मरणासन्न अवस्था तक , जीवित होकर भी मरने का अनुभव हो जाये उस स्तर तक स्वतः निर्मित दुःख पीता हूँ। कम मात्रा में मगर सबसे असरदार दुःख प्रेम संबंधों के भावों से बनता है परन्तु प्राणघातक दुःख तो माता पिता को पहुँचे दुःख के भावों से बनता है ।

मंगलवार, 21 अक्टूबर 2014

तुम जानती हो न ?

मेरी कमी में तेरी हँसी जैसे थी ,
वैसे ही तेरी कमी में मेरी हँसी हो गई ।

मेरे साथ होने में जो तेरी हँसने की अदाएँ थी ।
तेरे साथ न होने पर,
वो अदाएँ बस मेरे साथ रह गई ।
मैं तेरे साथ न होने पर ,
बिलकुल तेरी तरह आँखों पर हाथ रखकर ,
हँसता हूँ ।
तेरी ही तरह शर्माता भी हूँ ।
तेरी नक़ल भी करता हूँ ।

तेरे साथ न होने पर ,
कितना कठिन हो जाता है हँसना ।
तुम जानती हो न ,
मुझे हम दोनों का ,
एक-एक कर अभिनय करना पड़ता है ।
और एक ही बात पर ,
तेरे रहने के लिए मगर मेरे जिन्दा रहने के लिए ,
दो बार हँसना पड़ता है ।

शनिवार, 11 अक्टूबर 2014

क्षणिकाएँ

सन्देश भेजा है ।
न कबुतरो से ,न चिट्ठियों में ।

बात की बात जाये ,कोई भाव जगाये ।
इस प्रक्रिया में भावनाओ का ह्रस हो सकता है ।
बात जो इशारो में कही गई ।
उसको चेहरे में दिखने से रोका नहीं जा सकता है ।
संबंधो की शुरुआत इच्छाओं, व्यवहार में परिवर्तन,
और आँखों के टकराहट से होती है ।
मगर संबंधो का निर्वहन इशारो , मनोभावो ।
और मुस्कराहट से होता है ।

संतुलित हृदयाभावो के अभाव में ,
चयन की मांग होती है ।
चयन प्रक्रिया आँखों के मिलने से मात्र आरम्भ हो कर ,
मुस्कराहट के आदान प्रदान से समाप्त होती है ।

रविवार, 5 अक्टूबर 2014

क्षणिकाएँ

छत नीची हो ,
दीवारे संकरी हो ।
बड़ा इतना की काया मात्र ठहर जाये ।
बारिस में , गर्मी में और सर्दी में ,
मेरे अंग पानी से गिले हो ,
पसीने से भीगे हो ,
और हड्डियों में कम्पन हो ।

मगर ये सब सबसे छुप जाये ,
मौसम से भिडंत एकाकी ही हो ।
न दया का सहारा हो ।
न प्रोत्साहन के शब्द हो ।
सरीर मात्र के नाप का ,
छोटे छत वाला घरोंदा हो ।
और उसके चारो ऒर ,
गजानन के सूंड की ,
हनुमान के पूछ की परछाई हो

हे प्रभु !
आपके आंगन में मेरा भी एक कोना हो।

गुरुवार, 2 अक्टूबर 2014

यू एन मी

सृष्टि का सौन्दर्य ,
न तो त्रुटी विहीनता में ,
न तो कारन कार्य के सफल सम्बन्ध में ,
क्रियाओ के मूक संपादन में भी नहीं ।
जनम देने से पालने तक ।
शांत नीरव नभ से लेकर ,
उद्वेलित सागर धाराओ तक ।
किसी में भी नहीं ।

जीवन बीत जाये ,सम्बन्ध निभ जाये ।
अलगाव क्षणिक ही होगा ।
शीघ्र ही पुनः मिल जाये ।
भाई भाई के लिए , भाई बहन के लिए ।
और पत्नी पति के लिए ।
सभी ने आपने लिए सब कुछ नहीं माँगा ।

सृष्टी का सौंदर्य ,
सटीक अनुपातिक गुणों और अवगुणों के ,
बटवारे में है ।
मिलन की व्याकुलता में ,
उपहारों की परंपरा में ,
जीवनपर्यंत आनंयोश्रिता में है ।
रुदन के भावो और मुस्कराहट के ,
आश्रय के आदान प्रदान में  है ।
भाग्य में विपत्तियो के होने में ,
और विपतियो में हमारे अलग हो सकने में नहीं ,
साथ होने में है ।

बुधवार, 1 अक्टूबर 2014

क्षणिकाएँ

किसी को किसी का सहारा मिला ,
मैं अकेला था ।
पीछे से खम्बे था , जा भिड़ा ।
पहले तो बाधा लगा ।
मगर अगले ही क्षण कन्धा, टिक गया ।
अब उसी के सहारे खड़ा हूँ।
तो कल्पनाएँ कही ज्यादा ,
वास्तविक प्रतीत होती है ।
न तो ये विकल्प और न सदा का साथी खोजा है ।
खम्बे को जब बेजान देखा है ।
मैंने उसमे भगवान देखा है ।
सारे एक सामान थे ।
भीड़ में एक निश्चित पहचान खोजा है ।

क्षणिकाएँ

अपनी बुराइया देख सकने ,
की क्षमता होनी चाहिय ।
ये पंक्तिया बड़ी आसानी से ,
किसी भी नैतिकता के औजार पर ,
छापी हुई मिल जाएँगी ।
मुझे लगता है ,
इससे जीवन स्वर्ग मय हो गया है , पता नहीं ?
मुझे ऐसा कोई अनुभव याद नहीं ।
मगर नारकीय पीड़ा के ज्वर से ,
पूरा सरीर तप रहा है ।
आसुओ के बहने का कारन ,
मेरे दोषों का सरीर से निकलना मात्र नहीं है ।
ये मेरे समझ की कीमत की ,
आदायगी भी हो सकती है ।