ऐसा तो हुआ नहीं होगा कि हम बीमार होना चाहते हैं । हम आराम चाहते हैं । आराम, बहुत ज्यादा आराम हमें बीमार बना देता हैं । लेकिन गरीब आराम नहीं करता है । बल्कि ये कहिये की गरीब की नसीब में ही आराम नहीं है । फिर भी गरीब के नसीब में बीमारियां है ।
बीमारियों का भला किसी की अमीरी और गरीबी से क्या लेना देना हो सकता है ? लेकिन इलाज का तो है न ! आप ही बताइए है कि नहीं । आप कहियेगा सरकार की योजनायें चल रही है । गरीब व निर्धन भी बेहतर स्वास्थ्य सेवा ले सकता हैं । ठीक बात । और जिसके पास पैसा है उसके पास पैसा है , उसका तो फैमिली डॉक्टर भी हो सकता है जो घर आकर इलाज करेगा ।
लेकिन सारा भारत केवल गरीब या अमीर थोड़ी ही है न । जैसे कि पूरा भारत केवल हिन्दू और मुसलमान नहीं है । जैन भी है , पारसी भी है , बौद्ध भी है । वैसे ही मिडिल क्लास नाम की भी तो कोई चीज होती है । साहब ! आप बताइए कौन सी सरकार की स्वास्थ्य योजना मिडिल क्लास के लिए है ।
"हम इतने गरीब न हुए कि हाथ फैला सके और न इतने रईस हुए कि हाथ उठा सके । हम पीस गए योजनाओं को चलाने के लिए टैक्स कमाने में ।"
कुछ ज्यादा ही नेगेटिव हो गया क्या ?
मगर सच बोल रहे है हम । नेगेटिव-पॉजिटिव सेंटीमेंट्स नहीं चेक कर रहे हैं । देश मे कोई पूछने वाला नहीं है कि प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना में सिर्फ 10 करोड़ परिवारों को 5 लाख तक का मुफ्त इलाज क्यों ? देश में लगभग 22 करोड़ परिवार है । देश में आय विषमता पिछले 15 वर्षों में बढ़ी ही है । पूंजी का संकेन्द्रण ऊपरी 10 प्रतिशत लोगों के पास हुआ है । ऐसे में 10 करोड़ सबसे गरीब परिवार का इलाज करने से क्या होगा ?
आप को लग रहा होगा कि ? आंकड़ों को घुमा फिराकर अपनी बात रख रहा है । तो मैं भी सोचता हूँ क्यों न अपनी ही बात रख देता हूँ । आंकड़ों में इतना आपको क्यों उलझाया जाएं ।
ज्यादा दिन पहले की बात नहीं है मुझे , अपने एक फैमिली मेम्बर की तबियत खराब होने के कारण अस्पताल ले जाना पड़ा । मेरे पास प्राइवेट क्लिनिक में इलाज कराने का विकल्प था और पैसे भी । लेकिन एक बार के लिए मुझे लगा क्यों न गवर्नमेंट हॉस्पिटल में जाकर इलाज कराया जाए । आखिर हम टैक्स देते हैं लेकिन हिसाब लेने के वक्त पीछे हट जाते हैं । तो मैं गवर्नमेंट हॉस्पिटल गया । 10 रुपये की पर्ची कटाई और लाइन में लग गया । बारी आई , इलाज हुआ , पर्ची में डॉक्टर द्वारा लिखी दवाइयां मुफ्त में मिली । लेकिन बीमारी ठीक न हुई । समस्या को बढ़ते देख मैं दुबारा अस्पताल गया । इस बार मरीजों की संख्या ज्यादा होने के कारण डॉक्टर साहब को दिखा तक नहीं पाया । अब क्या किया जाए ! इलाज तो करवाना है ।
मेरी अभी भी इच्छा यही थी कि इलाज सरकारी अस्पताल में ही करवाना है । और हम फिर से जाएंगे । भले इस बार नहीं तो अगली बार सही । अबकी बार सुबह सवेरे ही जाके लाइन में आगे लग जायेंगे । लेकिन इलाज की जरूरत बढ़ती जा रही थी और देर करने से समस्या गंभीर हो सकती थी इसलिए बहुत ताल मटोल के बाद जिन डॉक्टर साहब से सरकारी अस्पताल में इलाज मात्र 10 रुपये की पर्ची काटकर करवाया था । उनके प्राइवेट क्लिनिक चलाया गया ।
प्राइवेट क्लिनिक, सरकारी अस्पताल से काफी व्यवस्थित था । डॉक्टर साहब 300 रुपये फीस लिए । बहुत ध्यान से मिले , सारी बात सुने । इलाज भी हुआ और राहत भी पहुंची । बात ध्यान देने वाले ये है कि एक ही व्यक्ति एक सरकारी और प्राइवेट होने भर से जिम्मेदारियों को निभाने में कितना बदल गया ?
प्राइवेट होके हर मरीज का 300 ले रहे है तो ठीक से इलाज कर रहे है । सरकारी अस्पताल में तनख्वाह मिल रही लेकिन काम ठीक से नहीं कर पा रहे । शायद देश में डॉक्टर ही एक पेशा बन गया है जिसमें लोग सरकारी के बजाय प्राइवेट नौकरी चाहते हैं । और हाँ ! शिक्षक का भी मामला कुछ इसी लाइन पर चल रहा है । स्कूल की बजाय ट्यूशन में टीचर बेहतर पढ़ाते हैं । देश में शिक्षा और स्वास्थ्य का ऐसा बाजारीकरण हुआ कि पूछिये मत ! एक दम सर्जिकल स्ट्राइक कर देने का मन करता है । लेकिन हो नहीं पा रही है ।
अभी तक हम आपको केवल समस्या समस्या बताये जा रहे हैं । लेकिन समस्या तो आप भी जानते ही थे । कुछ हद तक भोगे भी होंगे । चलिए समाधान की ओर भी आप को ले चलते हैं । इस तरफ आपका जाना शायद न हुआ हो ! हम सोच रहे थे कि डॉक्टर साहब से जाके पूछते कि सर आप सरकारी डॉक्टर के लिबाज में दूसरे प्रकार का काम चलाऊ , ग्राहक बनाऊ टाइप का इलाज करते हैं । और अपने प्राइवेट क्लिनिक का ग्राहक बनाके बड़े ध्यान से टिकाऊ व कमाऊ टाइप का इलाज करते हैं । ऐसा क्यों सर ?
फिर हम नहीं पूछे ? पूछ लेते भी तो क्या जवाब मिल जाता ? जवाब मिल जाता भी तो क्या वह जवाब पूरा होता या अधूरा कौन बता सकता है ?
लेकिन हम सोचे कि आखिरकार ऐसा क्यों हो रहा है ? हमको दो तीन चीज समझ में आया । पहला, तो ये कि सरकारी अस्पताल में जितना जिम्मेदारी दिया जाता है उसके अनुपात में तनख्वाह नहीं दिया जाता है । दूसरा, डॉक्टरी की पढ़ाई ही इतनी महंगी है कि खाली आप तनख्वाह से पढ़ाई का लोन नहीं न पटा पाएंगे तो सप्लीमेंट्री इनकम सोर्स बनाएंगे ही । तीसरा , देश में डॉक्टर का जबरदस्त कमी है । ऐसे में डिमांड सप्लाई इमबेलेंस के कारण प्राइवेट इलाज महंगा होता जा रहा है। चौथा, चलिए इलाज का पैसा दे भी ले । सरकार जेनेरिक दवाई उपलब्ध करा पाने में असमर्थ है ।
आप को याद होगा कि अभी दवाई दुकान मालिकों ने ऑनलाइन दवा बिक्री के खिलाफ देशव्यापी हड़ताल किया था । क्यों किया था ? क्योंकि उससे इनका धंधा डाउन हो रहा था । अरे ! एक दम ही बुड बक्क समझ रखे है क्या हमको ? हमको दिखता नहीं न है का कि अगर जेनेरिक आ गया तो उससे भी इनका धंधा डाउन ही होगा न । आपको बहुत आसानी से सुनने को मिल जाएगा कि प्रधानमंत्री जन औषधि योजना के दुकानों में दवाई नहीं मिल पा रही है । वही प्राइवेट दुकान में सारा दवाई है और सरकार की खोली दुकान में दवाई ही कभी नहीं रहता है । रिसर्च कहता है कि महंगी दवाई के कारण 40 प्रतिशत इलाज का खर्च दवा खरीदने में चला जाता है ।
अब तो सारा तस्वीर लगभग लगभग क्लियर होने लगा हो गया होगा कि नहीं ! डॉक्टर प्राइवेट में इलाज ठीक से करेगा । जेनेरिक दवाई आपको मिलेगा नहीं । स्वास्थ्य बीमा योजना गरीबों के लिए है । अमीरों को इससे फर्क ही नहीं पड़ता कि क्या उत्पात मचा हुआ है ?
कुल मिलाकर सार यह हुआ कि लाइफ में कट ऑफ सेट है ? उसके नीचे गए तो सरवाइवल का दिक्कत आएगा ही आएगा । जीना है तो छीनना पड़ेगा । अपना हिस्सा भी और दूसरे का भी । क्योंकि डॉक्टर ने यही किया है उसने जो फीस एक प्राइवेट क्लिनिक में ली शायद उसकी नौबत ही न आये अगर सरकारी डॉक्टर के रूप में वो ठीक से इलाज करें तो !
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