रविवार, 13 जनवरी 2019

       सोचिये जरा ! यदि आपको एक मौका मिले । अपने अनुसार अपनी दुनिया गढ़ने का । हालाँकि यह मौका भी सबको नहीं मिलेगा क्योंकि प्रवेश परीक्षाएँ हर जगह होती है । यह समझना आज मुश्किल है कि प्रतिस्पर्धा के बगैर भी कुछ मिल सकता है । 

       तो अपने अनुसार अपनी दुनिया गढ़ने का कैसे मिल जाएगा ? और मिलता भी नहीं है । भारत में कम से कम कठिन तो ,आसान चीज भी होता ही है न । वैसे ही यह भी हो गया । आप समझ लीजिए ग्रेजुएशन के बाद अगर यूपीएससी करना है तो अलग से एक ठो क्रोमोसोम जीन में लगा के आना पड़ता है । काहेकि कि सब को मौका सब के जैसा नहीं मिल पाता है । 

       और यही से आप गढ़ने लगते है, अपनी दुनिया । जिसमें कौन कौन होंगे । दोस्त होंगे, दोस्तियां होंगी । रूम होगा आपका । रूम में किताबे होंगी, अखबार का ढेर होगा । अब सोचिये अगर महीना भर आप रूम में ही बंद है और दुनिया से खाली नेट या फिर अखबार से इंटरैक्ट करते है तो आपका दुनिया बन गया कि नहीं । हाँ ! हम ये जरूर मान सकते है कि यह आपके मन माफिक न हो । लेकिन वो भी हो जाता है । 

        अब कैसे हो जाता है ? यही तो राज है । दिल्ली जाइये, यूपीएस सी का तैयारी करिये और हाँ ! मुखर्जी नगर में रूम लेके जरूर रहिएगा । तब खुद ही जान जाइयेगा । लेकिन इतना कष्ट मत उठाइये । हम है न हम राज से पर्दा उठाये देते है । 
       
         हमको यह बात कभी कभी बहुत कचोटता है कि हम दिल्ली भी गए, यूपीएससी का तैयारी भी करे लेकिन मुखर्जी नगर में रह के नहीं कर पाए । हम दुनिया तो बनाये लेकिन उसमें हम थे, यूपीएससी भी था लेकिन इस दुनिया का वैलिडिटी नहीं था । एक दम बोलते तो असंवैधानिक दुनिया था हमारा । संसद से पास हो भी जाता तो न्यायालय में टिक न पाता । लेकिन हाँ ! हम जब भी क्लास करने मुखर्जी नगर जाते थे और समय रहता था तो दोस्ते के रूम में जरूर जाते थे । उनकी दुनिया में बहुमत वाला मजा था । स्पीकर से लेकर राष्ट्रपति सब उनके थे । खाली विपक्ष की पोजीशन में यूपीएससी था । सरकार हमारी भी गिरी और उनकी भी । लेकिन मजा तो था न !  
 
       एक और संकट है ! अपने अनुसार दुनिया बनाने में । और वो है विचारधारा का । हमने जिंदगी में पहली बार मुखर्जी नगर पहुँच के जाना कि अपनी विचारधारा होनी चाहिए, जीवन दर्शन होना चाहिए । हमने पूछा भी क्या सब की होती है, जवाब मिला हाँ ! सब की होती है। जिससे हमने यह सवाल पूछा उनकी तो थी वो मुखर्जी हमसे पहले आ गए थे , हम नए थे तो हमारी विचारधारा भी नही थी और बेहद नई थी । 3 महीने तक हमें दिल्ली की जीवन शैली बढ़ी रास आयी । तो हम न जानते हुए भी शहरीकरण के पक्षधर बन गए । लेकिन शहरीकरण तो कोई विचारधारा नहीं है । तभी तो कहा कि विचारधारा हमारी नहीं थी । विचारधारा होने के लिए इज़्म होना चाहिए , वाद होना चाहिए । शहरीकरण में तो करण है । लेकिन मुखर्जी नगर ऐसे ही थोड़ी फेमस है, यंहा दिमाग चकर वाना है तो खाली कान खोल के बच्चा लोग का बात सुन लीजिए । अइसने ही एक दिन हम भी किसी को कहते सुने लिए कि यँहा सब की आँखों मे एक ही रंग का चश्मा चढ़ा हुआ है और वो है लाल । हम सकपका  गए , नए तो थे ही दिल्ली में । पहले उस व्यक्ति को देखे फिर सबके चेहरे पर देखे । भीड़ में न वो व्यक्ति दिखा और एक्का दुक्का चेहरे को छोड़कर चेहरों पर न चश्मे दिखे । ऐसा कुछ भी नहीं था कि चश्मे लाल ही हो । 

        लेकिन फिर एक दिन जब हम क्लास में एंटर कर रहे थे तो हमारे लिए एक उड़ता हुआ लाल सलाम आया । हमें बड़ा मजा आया । लाल सलाम सुनते ही चेहरे पर मुस्कुराहट आ गयी । हम भी उछल कर लाल सलाम बोल दिए और क्रांति होकर रहेगी ये भी जोड़ दिए प्रत्युत्तर में ।  हमको तो पता चल गया था कि एक इज़्म और एक लाल चश्मा हमारे पास भी हो गया है । लेकिन ये इतना आसान नहीं था और न ही एक तरफा । विश्व इतिहास में जो पूंजी लगाए थे उस पूंजी के लाभ से आधुनिक भारत में उपनिवेशवाद की रेल चला चुके थे । कला संस्कृति और राजव्यवस्था में थोक के भाव वाद और इज़्म कि कमी पूरी हो गयी थी । स्थिति ये हो गयी कि पहले खोजे खोजे एक विचारधारा मिलती थी बताने के लिए, अब हाल ये है कि पहले किसको बोले कहीं सुनने वाला जान न जाये हम किसी के फॉलोवर है । 

      अब जो प्रक्रिया शुरू हुई थी अपने अनुसार दुनिया बनाने की वो लगभग पूरी हो चुकी थी । एक कमरा था, हम थे , दोस्त थे , किताबे थी , अखबार का ढेर था , मंथली मैगज़ीन थी , टिफिन थी और एक विचारधारा । हम रूम में लगे वर्ल्ड मैप को जभी भी देखते थे, रूस से देखना शुरू करते थे । पता नहीं क्यों ? शायद बड़ा सा देश है इसीलिए ध्यान उधर पहले चला जाता है । आजादी के बाद भी सरकार ने रूस को ही देखा शायद उनके साथ भी यही कारण रहा होगा । 

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