सभ्यता के इतिहास में मनुष्य सबसे पहले क्या सीखा ? उसने सीखा कि कैसे जानवरों को वश में किया जाए ? वह पशुपालक बना । उसने जाना कि किसी को नियंत्रित करना जीवन को आसान बनाता है । खाने और पहनने की चिंता दूर हो जाती है ।
मनुष्य ने बाद में जल को नियंत्रित करने के लिए छोटे बांध बनाये । यह अतिशयोक्ति नहीं होगी कि वह सूरज और चंद्रमा को भी नियंत्रित करना चाहता था। उसने यानी कि मनुष्य ने सूरज के बारे में तफ्तीश की । यह आता कँहा से है और जाता कँहा है ? यह शक्ति की भूख थी ।
जब प्रकृति में उसके लिए हर तरफ खतरे थे । उसने नियंत्रण करने को अपने अस्तित्व के लिए अनिवार्य माना । और बाद में मनुष्य दूसरे मनुष्यों को नियंत्रित करने लग गया । वह शासक बन गया । कुछ प्रजा बन गए । शासक प्रजा को नियंत्रित करने लगा । प्रजा, किसी और को । यह श्रृंखला यूँही चलती गयी । यह श्रृंखला इतनी लंबी चली गयी कि जो बात मनुष्य और जानवरों से शुरू हुई थी वह पुरुष द्वारा स्त्री को नियंत्रित करने तक जा पहुंची ।
कभी कभार ऐसा भी हुआ कि नियंत्रण कमजोर पड़ने लग गया । राजा के मन का नहीं हो रहा था तो उसने प्रजा को कमजोर करने की सोंची । वह यानी कि राजा प्रजा को नियंत्रित करना चाहता था और नियंत्रित करने के लिए प्रजा को कमजोर करना जब जरूरी हो गया तो उसने भेदभाव बोये ।
यँहा ये बात जरूर उठती है कि इसका क्या प्रमाण है कि समाज के भीतर के भेदभाव व असमानता राजा की बोई हुई है या फिर प्रजा के स्वयं के बनाये हुए । लेकिन इस बात में तो पूरी सच्चाई है कि राजा या फिर शासक समाज में मौजूद असमानता को खत्म कर सकता था । सभ्यता के हजार दो हजार साल तक पुरुष और स्त्री के बीच अंतर लगभग नाम मात्र को रहता है । उसके बाद के हजार सालों में यह अंतर गहरा जाता है । जबकि इन्हीं हजार सालों में जबकि महिलाओं व बच्चियों के लिए बाहर की दुनिया में अस्वीकृति बढ़ रही थी, शासक वर्ग और ज्यादा ताकत वर होता जा रहा था । ऐसे में क्यों न कहे कि शासकों ने इस बात की मौन स्वीकृति दी कि महिलाएं घरों की चार दिवारी तक सीमित हो जाए ।
यदि इन सब बातों का और सामान्यीकरण करें , तो आज भी हाल कुछ ऐसा ही दिखता है । बात है क्रिकेट खिलाड़ी हार्दिक पांड्या और के एल राहुल के कमेंट की । कमेंट तो सेक्सिस्ट थे लेकिन जिम्मेंदार केवल ये दो खिलाड़ी बस नहीं है बल्कि वे सब है जिन्होंने इसकी मौन स्वीकृति दी है । मौन स्वीकृति दी है ! उस समय चुप रहकर जब आपको आवाज उठा कर कहना था कि आप ऐसा नहीं कह सकते हैं । आपको अपनी नाराजगी बिना किसी डर के दिखानी चाहिए थी , चाहे आप महिला हो या पुरुष लेकिन आपने बचने का और न उलझने का रास्ता चुना और आप आखिरकार उलझ ही गये ।
लेकिन सबकि मौन स्वीकृति का एक बराबर महत्व नहीं होता है । जब आम इंसान चुप रहता है तो उसका दायर छोटा होता है लेकिन यदि देश का प्रधानमंत्री ऐसा करता है तो एक बहुत बड़े दायरे में मौन स्वीकृति का प्रभाव होता है । और जब सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी में से एक के राष्ट्रीय अध्यक्ष सेक्सिस्ट बयान देते हैं तो बात और गंभीर हो जाती है ।
सेक्सिस्ट होना , लिंग के आधार पर महिलाओं को नीचा दिखाना है । जब किसी कथन को सेक्सिस्ट कहा जाता है तो उससे सीधा सा तात्पर्य यह होता है कि उस बात को बोला ही गया इस लिए है ताकि सुनने वाले को एक विशेष लिंग का होने के कारण हीन भाव आये । यह कितना हास्यास्पद है कि लिंग का चयन एक प्राकृतिक मसला है लेकिन उस पर गर्व किया जाता है। केवल यही बात नहीं जबकि जाति और चमड़ी का रंग भी पूर्णतः मनुष्य के वश के बाहर होने के बाद भी उसे ताउम्र तंग करता रहता है ।
इन्ही बातों के संबंध में एक घटना आपको बताता हूँ । एक फोर व्हीलर गाड़ी के शोरूम में किसी काम से मुझे जाना पड़ा । वंहा पर क्वालिटी कंट्रोलर के पद पर एक महिला पदस्थ थी । किन्ही कारणों से आफिस में अजीब से फ़ाउल स्मेल आ रही थी । इस पर एक अन्य पुरुष कर्मचारी उस महिला सहकर्मी से कहा कि आप रूम फ्रेशनर स्प्रे करवा दीजिये । यह एक वाजिब मांग है मगर थोड़ा रुककर उसने अपनी बात में यह भी जोड़ दिया कि यँहा जो गंदगी है उसके लिए आप तो झाड़ू भी लगा दीजियेगा । यह कहते हुए उसकी बात में हंसी थी । सम्भव हो वह गंभीर न हो , सिर्फ मजाक के लिए ऐसा कहा हो । लेकिन मजाक करने की शर्त ये है कि सभी को हंसी आनी चाहिए । क्योंकि यदि मजाक पर आप नहीं हंस रहे है तो इसके दो ही अर्थ है या तो मजाक आपको समझ में आया ही नहीं या फिर मजाक आप पर किया गया था जो कि आपको पसंद नहीं आया । इन्हीं दो ही मामलों में अक्सर लोग नहीं हँसते है ।
मुझे तो पूरी घटना देख कर ऐसा तो बिल्कुल नहीं लगा कि मजाक या तंज या शब्दों के सहारे की गई इस छींटा कशी को समझा न जा सके । जरूर दूसरा वाला ही कारण रहा होगा । मजाक करने वाले के लिए हंसी से भरा था लेकिन सुनने वाले के लिए नहीं ।
तो आप ही बताइए ऐसा करना चाहिए या नहीं ? यदि नहीं करना चाहिए तो हर रोज ऐसा क्यों करते है लोग ? और आपको क्या लगता है महिलाओं पर भविष्य में ऐसी छींटा काशी घटेगी या बढ़ेगी ? ओबियासलि बढ़ेगी ही । जैसे जैसे महिलाएं पुरुषों को रोजगार के विविध क्षेत्रों में प्रतिस्थापित करेंगी वैसे वैसे ही अपनी खीज और बेचैनी के कारण शब्दो से प्रहार किए जाएंगे । और यह केवल आफिस तक सीमित न होकर आफिस के बाहर भी होगा ।
तो अंत में ऐसे में क्या करना चाहिए ? ऐसे में सबसे पहले आप आत्मविश्वस के साथ सेक्सिस्ट कमैंट्स पर प्रतिक्रिया देना शुरू करें । आप अपनी भावनाओं के प्रति ईमानदार बनाइये । यदि किसी की भी बातों से ऐसा लगता है कि यह बात सिर्फ आपको इसी लिए कही जा रही है क्योंकि आप एक लड़की है या महिला है तो आपको विरोध तुरंत ही शालीनता से दर्ज करवाना चाहिए ।
समस्या के बढ़ने पर आफिस स्तर पर वर्कप्लेस पर उत्पीड़न से जुड़ी समिति के पास बात रखनी चाहिए । समस्या के गंभीर मोड़ लेने से पहले पुलिस तक आपको पहुंच बनानी चाहिए । और सरकार की योजनाओं जैसे कि SHE बॉक्स पोर्टल का उपयोग करना चाहिए ।
आपको यह समझना जरूरी है कि आपको नियंत्रण में लाने के लिए ऐसा किया जा रहा है । आपके पास दो ही विकल्प है, नियंत्रण में आ जाये और अब इस धोखे में जीये कि सब कुछ ठीक है । या फिर विरोध करिये । और बताइये कि सब कुछ ठीक नहीं है ।
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