बुधवार, 25 मार्च 2015

अंतिम

मेरी महत्ता किसी अनजान के लिए
क्या होगी ?
मैं नहीं पहले बोलूंगा,
क्या वो बोलेगी ?

जितना प्रगाढ़ मोह होगा,
उतना ही तीव्र,
उसका विद्रोह होगा ।

मैं आरम्भ से ही द्रवित ,
चक्षु सदा रहे अश्रु भरित ,

मेरे रोने का कैसे मान होगा ?
था जो आँशु ले के ,
सदा समक्ष उपस्थित ,

जब भ्रम टूटा था ,
और जब टूटेगा
आँखों में आँशू किसके होंगे ?
किसके ज्यादा सच्चे होंगे ?
सब समय लिखेगा ।






शनिवार, 21 मार्च 2015

जागो ग्राहक जागो !!

यू आर माय हम्प्टी डम्पति हेल्लो हनी बनी, जिंदगी के साथ भी जिंदगी के बाद भी, फेना ही लेना, पहले इस्तमाल करे फिर विश्वास करे , मुँह में रजनीगंधा कदमो में दुनिया, हो रहा भारत निर्माण भारत सरकार द्वारा जनहित में जारी इत्यादि पक्तियाँ आपने यदा-कदा तो सुनी ही होगी और ये वाली लाइन तो पक्का ही सुनी होगी अबकी बार ........ ............।
     ये विज्ञापन जगत है, जो वर्तमान विनिमय बाजार का महत्वपूर्ण घटक है । विज्ञापन कुछ सूचनाओं का व्यवस्थित, आकर्षक, संक्षेपित वर्णन होता है जो संचार के साधनों के मध्यम से विक्रेता और क्रेता के बीच मुद्रा लेन-देन को प्रोत्साहित करता है । विज्ञापन की सहायता से वस्तु एवं सेवाओँ के प्रदेता ग्राहक या उपभोक्ता को अपनी ओर आकर्षित करते है । विज्ञापनों की सहायता से लोगो को वित्त बाजार में आने वाले नए उत्पादों, उपलब्ध उत्पादों एवं सेवाओँ के बारे में जानकारी प्राप्त होती है । विज्ञापन देने के लिए भी विज्ञापन दिए जाते है । सरकार अपनी विभिन्न योजनाओं के प्रचार के लिए सम्बंधित विज्ञापन जारी करती है ।
    जिस प्रकार हम परिवहन साधनों के माध्यम से एक जगह से दूसरी जगह जाते है वैसे ही विज्ञापन संचार के साधनो के माध्यम से हम तक पहुचते है । विज्ञापन होर्डिंग, अख़बार, पम्पलेट, स्पीकर के माध्यम से, टेलीविज़न, रेडियो, व्यक्तिगत बातचीत, टेलीफोन या मोबाइल कॉल के द्वारा आदि के माध्यम से हम तक पहुचते है । मोबाइल कॉल के माध्यम से चुनाव के दौरान प्रमुख राजनेताओं के द्वारा अपनी पार्टी के पक्ष में वोट करने की अपील तो आपने सुनी ही होगी । ये विज्ञापन के वर्तमान तरीकों में सर्वाधिक लोकप्रिय और असरदार तरीका है ।
     विज्ञापनों से हम घिरे हुए है । ये कभी-कभी हमारे लिए सर दर्द बन जाते है तो कभी शांत से महौल में हम से बात भी करते है । हमारे आसपास की बेरंग दीवारे, कोने और सूनी छते सभी कुछ इनसे गुलज़ार है । विज्ञापनों की रचना करते वक्त विज्ञापन निर्माता लोगो के मनोविज्ञान का ध्यान रखकर घटनाओँ का क्रम, पात्र, संवाद और भाषा का चयन करते हैं। ये वही तत्त्व है जो एक अच्छे, अधिक लोकप्रिय और कमजोर, कम लोकप्रिय विज्ञापन के बीच अन्तर का कारण बनते है ।
     अक्सर नए अभिनेता और अभिनेत्रियाँ बड़े परदे पर आने से पहले विभिन्न दैनिक उपयोग की वस्तुओं के विज्ञापन में देखे जा सकते है । ये उनके कॅरियर का पहला पड़ाव है जबकि खेल जगत से जुड़ी हस्तियों के लिए ये उनके कॅरियर के सर्वोच्च स्तर पर पहुचने के बाद आने वाला पड़ाव है ।
     विज्ञापन हमेशा ही अच्छे या बुरे नहीं होते । कुछ विज्ञापन इतने मनोरंजक और हास्यास्पद होते है की लोगो की ज़ुबाँ पे यूँही चढ़ जाते है और मनोरंजन के साथ सही रास्ता भी दिखाते है पर कभी-कभी विज्ञापन लोगो को ठगने का माध्यम बन जाते है । विज्ञापनों के दुरूपयोग पर अंकुश रखने के लिए सरकार ने ' द एडवरटाइजिंग स्टैंडर्ड्स कौंसिल ऑफ़ इंडिया ' का गठन किया है जो भ्रामक विज्ञापनों से जुड़ी शिकायतो के आधार पर उनके प्रसारण पर प्रतिबन्ध लगाता है ।
    

शुक्रवार, 20 मार्च 2015

अर्थव्यवस्था- सामाजिक व राजनीतिक विसंगति एवं वणिज्यवादी धर्मं

  • 'मुझे याद है, हमने पैसे जोड़ कर सबसे पहले बैट और बॉल ख़रीदा था उसके बाद कमाएँ हुए पैसो से क्रिकेट अकादमी शुरू की । ' 
  •     यही तो नियमबद्ध व्यवस्था की विशेषता है । आरम्भिक संसाधनों को जुटाने का साहस था तो भविष्य में संसाधनों से पूँजी और पूँजी से ढेर सारी सेवाएँ, संसाधन और पूँजी अर्जित कर ली और इसप्रकार अर्जित पूंजी से और पूंजी ।
  •     अर्थव्यवस्था भी नियमो से आबद्ध है । जोखिम उठाने वाला लाभ कमाता है । मैंने ये बिलकुल नहीं कहा की वही धनाढ्य बन जाता है । ये तो लाभ की महिमा है क्योकि अर्जित लाभ का उद्यमशीलता से सीधा सम्बन्ध होता है । 
  •      किसी भी व्यवस्था के नियम एक ही दिन में नहीं बने होंगे मगर आधारभूत नियम तो व्यवस्था निर्माण की आरंभिक अवस्था में ही बनते है और अत्यंत कम विचलन के साथ और आवश्यकता के अनुसार संशोधित होकर प्रभाववान बने रहते  है । 
  •      अर्थव्यवस्था से बँधे हुए समाज की ये विशेषता है की उसमे विषमता होगी ही होगी । गरीबी और बेरोजगारी इसकी आवश्यक बुराइयाँ है । संसाधनों का असमान वितरण, समाज का आर्थिक आधार पर स्तरीकरण कभी समस्या है तो कभी समाधान । तापमान के अन्तर के कारण ऊर्जा का प्रवाह होता है । ये विषमता ही प्रवाह का कारण है । मुद्रा का प्रवाह भी आवश्यकता के अनुरूप और सामाजिक विषमता के न्यूनता के उद्देश्य से होता है । 
  •      अर्थव्यवस्था में पूंजीवाद या साम्यवाद । साम्यवाद समाजवाद की अंतिम वह अवस्था है जिसको परिभाषित ही इस शर्त पर किया गया है की इसकी प्राप्ति संभव है परंतु किसी एक समय । ये ऐसी ही बात हुई की चींटी एवेरेस्ट पर चढ़ना शुरू कर दे तो उसके शिखर पर पहुचेगी तो परंतु किसी एक समय । इसप्रकार पूंजीवाद कही ज्यादा प्रतिस्पर्धा पूर्ण व्यवस्था है और जोखिम से लाभ का सीधा सम्बन्ध कही ज्यादा सटिकता से  स्थापित करता है । होना भी यही चाहिए -'लोगो को उनकी क्षमता के अनुसार न की जरूरत के अनुसार ' ।
  •       समय के साथ जैसे जैसे अर्थ का महत्व बढ़ता गया । सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक पहचान भी अर्थ आधारित ही हो गई । सामाजिक सम्मान और जाति मूलतः दो ही रह गई - धनी और निर्धन । राजनीति भी धनाढ्य और पूंजीपति के अनुसार चलने लगी जबकि गरीब और बेरोजगार राजनीति रूपी रथ के पहिये बनकर रह गए है और पूंजीपति उस रथ का  मालिक है । धार्मिकता रूढ़िवादी विचारो से भरी हुई होती है । अर्थ से जन्मे धर्मो ने कट्टर ब्राम्हणवाद और धर्म संचालित स्तरीकरण को ध्वस्त कर दिया है । आर्थिक क्रियाओ से बंधे होने का ये विरोध है या समर्थन की वणिज्यवादि धर्मो ने जैसा वस्त्र त्यागकर दिखाया है या तो तुम व्यवस्था का अंश हो जाओ या नग्न और नगण्य हो जाओ ।
  •        अब सब कुछ, सारे सम्बन्ध अर्थ आधारित होने पर ही अर्थपूर्ण है । सड़क और सड़क के दोनों ओर की पूंजी का उपयोग उसकी कीमत चूका कर ही किया जा सकता है अन्यथा छः-छः महीने जगह बदलते रहो, मन लगा रहेगा ।