गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

विचार प्रतिबिम्ब


गिरते हुए जल को ,
जैसे ही मिलता है ।
कोई आधार या कोई तल ,
तो गिरता हुआ जल ,
ध्वनि करता है ।
तप ! तप ! तप !
ये कैसी मानसिकता या ,
कैसा विरोधाभास है ।
क्यों नहीं रहे बदल ,
गिरते हुए जल को ,
जैसे ही मिलता है ।
कोई आधार या कोई तल ,
तो गिरता हुआ जल ,
ध्वनि करता है ।
तप ! तप ! तप !
ये आदिकाल की घटना हुई ।
जब गिरते हुए जल को ,
जैसे ही मिलता था । 
कोई आधार या कोई तल ,
तो गिरता हुआ जल ,
ध्वनि करता है । 
तप ! तप ! तप !
पर अब तप होने से रहा ,
ये जिसके भी पक्ष में हो ।
नल , जल या तल वो ,
इस ध्वनि को दे बदल ,
की अब से  गिरते हुए जल को ,
जैसे ही मिलता है ।
कोई आधार या कोई तल ,
तो गिरता हुआ जल ,
ध्वनि करता है । 
जप  ! जप  ! जप  !                                  





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