सुबह के दस बजे ऑफिस के लिए राकेश जैसे-तैसे घर से निकला। उसके सामने दिनचर्या का वही दोहराव था, वही भीड़, वही घड़ी की सुई जो मानो आदेश देती हो—“दौड़ो, वरना छूट जाओगे।”
मेट्रो स्टेशन पर उतरते ही एक भारी-सी सांस निकली—लोगों की भीड़, शरीरों की धक्का-मुक्की, और चेहरों पर बसी उदासीनता। राकेश को लगा, यहाँ हर कोई खिड़की के पीछे खड़ा है।हर किसी की खिड़की की चाहत को पूरा करने के लिए ही शायद खिड़की खिंचते खिंचते इतनी बड़ी हो गई हैं । एक बड़ी खिड़की जिसमें सैकड़ो छोटी खिड़की समा गई हैं । बता पाना मुश्किल है कि सब बड़ी खिड़की को देख रहे है या उसमें से अपनी वाली छोटी खिड़की को ।
ट्रेन आई। भीड़ के साथ राकेश उसमें समा गया। सीट का सवाल ही नहीं था। बड़ी खिड़की से बाहर झांकते ही अनगिनत छोटी-छोटी खिड़कियाँ दिखीं। वह सोचने लगा—क्या हर खिड़की के पीछे कोई अपनी अधूरी इच्छा, अपनी असफल कामना, अपनी थकी हुई देह और मन को छुपाए बैठा है?
🎵 “जिंदगी कैसी है पहेली हाय, कभी ये हँसाए, कभी ये रुलाए…”
ट्रेन पुल पर धीमी हुई। यमुना का बहाव तीखा था। पुल ने जैसे ट्रेन से कहा—“बहन, धीरे चलना।” राकेश ने नदी की ओर देखा। नदी भी खिड़की-सी लगी—एक खिड़की, जिससे प्रकृति शहर को देख रही थी। नदी का जल था, पर ठहराव नहीं। शहर का जीवन था, पर शांति नहीं।
उसके भीतर महंगाई और ज़िम्मेदारियों की कड़वाहट गूंजती रही। तनख्वाह कितनी भी हो, ज़रूरतें बड़ी रहती हैं। घर के रिश्तों में भी अब वह अपनापन नहीं रहा—यौन इच्छाएँ भी कभी-कभी खिड़की की तरह ही बंद हो जाती हैं, भीतर से धुंधली और अनसुनी।
🎵 “तन्हाई, तन्हाई, दिल के रास्ते में कैसी ठंडी साया तन्हाई…”
छोटी-छोटी खिड़कियों के पीछे दौड़ती जिंदगियाँ राकेश को किसी थके हुए घोड़े-सी लगती हैं, जिन्हें यह भी नहीं पता कि मंज़िल कहाँ है। गाँव की धीमी लय को छोड़कर शहर को चुना था, यह सोचकर कि सब सही हो जाएगा। पर यह शहर तो केवल नई निराशाओं का बाज़ार निकला।
राकेश ने फिर नदी को देखा। सोचा—शायद जिस दिन नदी अपनी धार धीमी करेगी, उसी दिन यह शहर भी धीरे चलने लगेगा। और शायद उसी दिन वह इस बड़ी खिड़की से बाहर उतरकर मुक्त हो सकेगा।