बुधवार, 17 सितंबर 2025

सब खत्म

जेन मन थोड़ी दुनिया देखे हे,
वो पैसा, जमीन अउ सोना जानथे।
जेन मन ज्यादा देखे हे,
वो कमाथें, बचाथें अउ उड़ा देथें।
जेन मन इजराइल, गाजा, यूक्रेन देखे हे,
वो बस जीये बर चाहथें।
कमाय ले जादा खर्च करना चाहथें।

मार के बाद पैसा,
उधारी चुकाना नई हे।
जमीन काबर खरीदी?
घर काबर बनाय?

सब तो मिसाइल के निशाना मं हे।
जब हम खुद नई बचबो,
त पैसा का बचाबो?
पैसा हमन ला नई बचाही।

सोमवार, 8 सितंबर 2025

व्हाइट इज डर्टी

साफ–सुथरे शहर,
शहर के साफ–सुथरे लोग,
चूने से भी ज्यादा सफेद,
पुट्टी लगाए चेहरे— हू-ब-हू एक जैसे।

क्योंकि शहर में रहना मतलब—
वेल एजुकेटेड, वेल मैनर्ड और सबसे ज़रूरी—सफेद।
सफेद यानी साफ।

मगर पता नहीं क्यों,
एयर-कंडीशनर की ठंडी में
ये वेल एजुकेटेड लोग
जम गए हैं,
अपने लिए भी नहीं बोल पा रहे।
और वेल मैनर्ड लोग
बर्गर के नीचे कुचल गए हैं,
आस–पास की गंदगी तक साफ नहीं कर पा रहे।

सफेद से रिसते हैं—
बदबूदार,
टॉयलेट पेपर यूजर,
अर्बन व्हाइट कबूतर।

शनिवार, 6 सितंबर 2025

आज अंतिम छुट्टी पर

एक दिन दफ्तर जाते हुए
मैंने एक मुर्दे को देखा।
मुर्दा लेटा हुआ था,
लोग उसे लिए जा रहे थे।

दफ्तर जाने का समय था—
सोचने लगा, अगर यह ज़िंदा होता
तो शायद अभी मेरे साथ
दफ्तर ही जा रहा होता।

मगर आज यह दफ्तर नहीं जा रहा,
और न ही वे लोग,
जो इसके पीछे चल रहे हैं।

दफ्तर जाने के वक्त,
सड़क पर जो भी दिखता है—
सब दफ्तर जाते प्रतीत होते हैं...
यहाँ तक कि मुर्दा भी।
कभी-कभी लगता है
ज़िन्दगी और मौत के बीच
बस इतना ही फर्क है—
जीवित आदमी दफ्तर जाता है,
मुर्दा सीधा श्मशान।

हम दिन भर दफ्तर जाकर
थोड़ा-थोड़ा मरते हैं,
और एक दिन ऐसा आता है
जब हमें भी
दफ्तर नहीं जाना पड़ता।

तब लोग कहते हैं—
“आज वह छुट्टी पर है,
अंतिम छुट्टी।”

कितना अजीब है,
हम जीते-जी छुट्टियों के लिए तरसते हैं,
और मरने के बाद
लोग हमें छुट्टी पर बताते हैं।

शायद ज़िन्दगी भी
एक बड़ा दफ्तर है,
जहाँ हम सब नियुक्त हैं,
कोई स्थायी नहीं,
सब संविदा पर।

हर किसी का कॉन्ट्रैक्ट
किसी अदृश्य हस्ताक्षर से बँधा है।
कोई नहीं जानता
किसका कब समाप्त हो जाएगा।

और फिर एक दिन
“सेवा निवृत्ति” का आदेश आता है।
सिर्फ़ एक चुप्पी,
सिर्फ़ एक यात्रा—
श्मशान की ओर।

गुरुवार, 4 सितंबर 2025

छोटी वाली असंख्य खिड़कियाँ

सुबह के दस बजे ऑफिस के लिए राकेश जैसे-तैसे घर से निकला। उसके सामने दिनचर्या का वही दोहराव था, वही भीड़, वही घड़ी की सुई जो मानो आदेश देती हो—“दौड़ो, वरना छूट जाओगे।”

मेट्रो स्टेशन पर उतरते ही एक भारी-सी सांस निकली—लोगों की भीड़, शरीरों की धक्का-मुक्की, और चेहरों पर बसी उदासीनता। राकेश को लगा, यहाँ हर कोई खिड़की के पीछे खड़ा है।हर किसी की खिड़की की चाहत को पूरा करने के लिए ही शायद खिड़की खिंचते खिंचते इतनी बड़ी हो गई हैं । एक बड़ी खिड़की जिसमें सैकड़ो छोटी खिड़की समा गई हैं । बता पाना मुश्किल है कि सब बड़ी खिड़की को देख रहे है या उसमें से अपनी वाली छोटी खिड़की को । 

ट्रेन आई। भीड़ के साथ राकेश उसमें समा गया। सीट का सवाल ही नहीं था। बड़ी खिड़की से बाहर झांकते ही अनगिनत छोटी-छोटी खिड़कियाँ दिखीं। वह सोचने लगा—क्या हर खिड़की के पीछे कोई अपनी अधूरी इच्छा, अपनी असफल कामना, अपनी थकी हुई देह और मन को छुपाए बैठा है?

🎵 “जिंदगी कैसी है पहेली हाय, कभी ये हँसाए, कभी ये रुलाए…”

ट्रेन पुल पर धीमी हुई। यमुना का बहाव तीखा था। पुल ने जैसे ट्रेन से कहा—“बहन, धीरे चलना।” राकेश ने नदी की ओर देखा। नदी भी खिड़की-सी लगी—एक खिड़की, जिससे प्रकृति शहर को देख रही थी। नदी का जल था, पर ठहराव नहीं। शहर का जीवन था, पर शांति नहीं।

उसके भीतर महंगाई और ज़िम्मेदारियों की कड़वाहट गूंजती रही। तनख्वाह कितनी भी हो, ज़रूरतें बड़ी रहती हैं। घर के रिश्तों में भी अब वह अपनापन नहीं रहा—यौन इच्छाएँ भी कभी-कभी खिड़की की तरह ही बंद हो जाती हैं, भीतर से धुंधली और अनसुनी।

🎵 “तन्हाई, तन्हाई, दिल के रास्ते में कैसी ठंडी साया तन्हाई…”

छोटी-छोटी खिड़कियों के पीछे दौड़ती जिंदगियाँ राकेश को किसी थके हुए घोड़े-सी लगती हैं, जिन्हें यह भी नहीं पता कि मंज़िल कहाँ है। गाँव की धीमी लय को छोड़कर शहर को चुना था, यह सोचकर कि सब सही हो जाएगा। पर यह शहर तो केवल नई निराशाओं का बाज़ार निकला।

राकेश ने फिर नदी को देखा। सोचा—शायद जिस दिन नदी अपनी धार धीमी करेगी, उसी दिन यह शहर भी धीरे चलने लगेगा। और शायद उसी दिन वह इस बड़ी खिड़की से बाहर उतरकर मुक्त हो सकेगा।