आप, मैं और हम सभी को कभी न कभी धैर्य रखने के लिए कहा गया होगा । यदि धैर्य रखने के लिए न भी कहा जाये , तो भी हम स्वतः समझ पाते है कि कभी-कभी धैर्य रखने के सिवाय हमारे पास और दूसरा कोई रास्ता नहीं होता है । लेकिन इसप्रकार तो धैर्य असहाय होने के बराबर हो जाता है । यानी कि जब आप कुछ नहीं कर सकते है तो धैर्य रखिये । इसप्रकार धैर्य तो भाग्य पर निर्भर होना भी हो गया ।
लेकिन धैर्य को परिश्रम से नहीं बल्कि फल से जोड़ा जाता है । अर्थात धैर्य परिश्रम करने के बाद काम आता है । इसलिए धैर्य के गुण को भाग्य से जोड़ना सही नहीं है । भाग्य को मानने वाला कर्म को यथोचित महत्व नहीं दे पाता है ।
और धैर्य असहाय होना भी नहीं है क्योंकि धैर्य कायरों में नहीं होता है । जो व्यक्ति अपने परिश्रम के प्रति ईमानदार होता है वही धैर्य रख पाता है । यदि आपने परिश्रम नहीं किया है तो परिणाम के प्रति आपकी जिज्ञासा और आतुरता परिणाम को बदल नहीं देगी ।
लेकिन जब कभी भी यह कहा जाता है कि आपको धैर्य रखना चाहिए तो इसके क्या मायने होते है ? धैर्य कोई वस्तु तो है नहीं जो खरीद कर रख लिया जाये। फिर धैर्य रखने और न रखने के बीच आप अपने आप में क्या बदलाव महसूस करते हैं ?
असल में धैर्य को लेकर मेरी जिज्ञासा का कारण बड़ा सीधा है । धैर्य वह आधारभूत गुण है जो परिवर्तन से पूर्व हमको तैयार करता है । ऐसे में परिवर्तन कैसा भी हो सकता है ? सकारात्मक या नकारात्मक; बड़ा या छोटा ।
आम तौर पर धैर्य जीवन में सफलता दिलाता है । इसीलिए हम धैर्य को एक गुण के रूप में समझने की कोशिश करेंगे । धैर्य को समझने के लिए हम इंकरेमेंटलिस्म(incrementalism) और कटेस्ट्रोफीइज़्म(catastrophism) की अवधारणा का सहारा लेंगे । और डार्विन के विकासवाद और सरवाइवल ऑफ दी फिटेस्ट के सिद्धांत को भी धैर्य से जोड़कर समझेंगे । हम विभिन्न दार्शनिक और तार्किक तरीकों से धैर्य और विकास के संबंध को समझने की कोशिश करेंगे । और यह भी जानेंगे कि कैसे धैर्य हमारी सफलता को रेगुलेट(regulate) करता है ?
तो शुरू करते है एकदम शुरुआत से , शुरुआत से यानी कि पृथ्वी की शुरुआत से जब शायद ही पृथ्वी पर जीवन भी नहीं रहा होगा । उस समय पृथ्वी बहुत गर्म थी । फिर वर्षा हुई । पृथ्वी ठंडी हुई । पृथ्वी की शुरुआत में सागर और सतह इतनी संख्या में बाटें हुए नहीं थे । सारी जमीन एक थी और सारे सागर एक थे । धीरे धीरे परिवर्तन के दौरान पृथ्वी वह रूप ले सकी जिस रूप में आज हम उसे देख सकते हैं । लेकिन पृथ्वी जैसी आज है वैसी बनने में चूंकि समय बहुत अधिक लगा तो हम मान लेते है कि परिवर्तन कि प्रक्रियाएं बेहद धीमी थी । जैसे कि अपरदन (erosion), प्लेट टेक्टोनिक्स (plate tectonics) आदि । लेकिन साथ ही इस बात के कोई पुख्ता प्रमाण नहीं है कि सारी प्रक्रियाएं धीमी थी । क्योंकि यदि सारी प्रक्रियाएं ही धीमी थी तो एकाएक होने वाले ज्वालामुखी विस्फोट, भूकम्प , तेज वर्षा और चक्रवात को हम कैसे समझा पाएंगे ? तो आप देख सकते है कि पृथ्वी तीव्र और मन्द दोनों ही प्रकार के परिवर्तन से रूप लेती है ।
यही वजह है कि हमारे पास इंकरेमेंटलिस्म (incrementalism) और कटेस्ट्रोफीइज़्म (catastrophism) जैसी दो बिल्कुल विपरीत विचारधाराएं मौजूद है । जहां एक ओर इंकरेमेंटलिस्म कहती है कि संसार में विकास की स्थितियों की प्राप्ति क्रमवार होती है। और प्रत्येक क्रम समय अवधि से बंधा हुआ है ।वहीं दूसरी ओर कटेस्ट्रोफीइज़्म संसार के परिवर्तनों को तीव्र मानता है । कटेस्ट्रोफीइज़्म विकास के लिए शॉर्टकट्स (shortcuts) की पुष्टि करता है । यह ये समझने में हमारी मदद करता है कि जो कुछ हम आज देख रहे हैं जरूरी नहीं है वह बेहद लंबे समय के परिश्रम या परिवर्तन का फल हो । कटेस्ट्रोफीइज़्म में अचानक हुए बदलावों को सहजता से स्वीकार किया जाता है जबकि इंकरेमेंटलिस्म अचानक हुए बदलावों के प्रति शंका का भाव रखता है ।
अब यह प्रश्न उठता है कि पृथ्वी में हुए परिवर्तनों का किसी के धैर्य से क्या लेना-देना है ? और धैर्य का इंकरेमेंटलिस्म और कटेस्ट्रोफीइज़्म से क्या संबंध हो सकता है ?
पृथ्वी का मनुष्य के धैर्य के गुण से सीधा संबंध न दिखे किंतु मनुष्य और पृथ्वी का सीधा संबंध है । मानव के मानव बनने का इतिहास भले ही पृथ्वी के इतिहास से छोटा है । लेकिन मानव का इतिहास बड़ी खोपड़ी वाले आदिमानव से आधुनिक मानव बनने का इतिहास है । यह इतिहास महत्वपूर्ण इसीलिये है क्योकि मनुष्य ने धैर्य किया । बहुत सीधे शब्दों में कहे तो वनमानुष से आधुनिक मानव बनने के बीच का अंतर मनुष्य का धैर्य है । धैर्य , साधारण को विशिष्ट बनाने वाला गुण है। धैर्य मनुष्य को बड़े परिवर्तनों के लिए तैयार भी करता है । और प्रायः एक उत्तरोत्तर अवस्था में पहुंचता है ।
आप ही सोचिये ! आग की खोज और पहिये की खोज एकाएक हुई या क्रमिक परिवर्तन से । यह मनुष्य के धैर्य का फल था या एक चमत्कार । यह इंकरेमेंटलिस्म था या कटेस्ट्रोफीइज़्म । लेकिन अध्यनन बताते है कि विभिन्न प्रारंभिक खोजें धैर्य का और क्रमिक सुधार का फल थी। और धैर्य रखने के दौरान ऐसे कटेस्ट्रोफीइज़्म ने मानव को एकाएक बड़ी छलाँग लगा दी ।
डार्विन और डार्विनवाद (darwinism) की वैकल्पिक थियोरियाँ (theories) भी क्रमिक विकास के पक्षधर है । डार्विन ने मानव के एवोल्यूशन(evolution) को क्रमवार तरीके से समझा है । इसके अलावा सरवाइवल ऑफ दी फिटेस्ट का सिद्धांत भी एवोल्यूशन(evolution) को समझता है । यह तुलनात्मक श्रेष्ठता को कसौटी के रूप में निर्धारित करता है । विकास के दौर में वही बच पाएगा जो श्रेष्ठ होगा । और श्रेष्ठ या सर्व उपयुक्त (फिटटेस्ट) होने के लिए नयी चुनतियों के अनुसार नए हुनर सीखने होने । सीखने के लिए धैर्य चाहिए होता है । इसप्रकार जिसमें धैर्य था , वही बच पाया ।
डार्विनवाद(darwinism) की वैकल्पिक थियोरियाँ जैसे कि ग्रेड्यूएलिस्म (gradualism) ने भी क्रमिक विकास को ही महत्व दिया है । क्रमवार तरीके से बड़े बदलाव को हासिल किया जा सकता है । हालांकि इस सिद्धान्त में परिस्थिति और समय का अवरोध रहता है ।
इस प्रकार हमने देखा कि किसप्रकार पृथ्वी के विकास का मानव के धैर्य से गहरा सम्बंध है । और किस प्रकार धैर्य इंकरेमेंटलिस्म स्कूल ऑफ थॉट्स का आधारभूत तत्व है । हालांकि हमने यह भी जाना कि भले धैर्य इंकरेमेंटलिस्म को सहारा देता है लेकिन धैर्य का फल कटेस्ट्रोफीइज़्म के माध्यम से मिलता है ।
अब तक कि बातचीत से शायद हम धैर्य और उसके वैचारिक और तार्किक पक्षों से भली भांति परचित हो गए है । और दैनिक जीवन में धैर्य के महत्व को पहचाने और अपनाने से जुड़ी चर्चा को समझने में सक्षम होंगे । जिसकी बात आगे की गई है । इसके साथ ही हम यह भी जान पाने में सक्षम होंगे कि धैर्य ( patience ) किस प्रकार हमारी सफलता को रेगुलेट(regulate) करता है ।
दैनिक जीवन में धैर्य हमें न तो अक्षम होने और न ही भाग्य वादी होने की सीख देता है । धैर्य परिश्रम के बाद काम आता है । धैर्य वही रख पाता है जिसने परिश्रम के दौरान सत्यनिष्ठा दर्शायी है । सत्यनिष्ठ व्यक्ति धैर्यवान भी होता है । और बिना परिश्रम के धैर्य रखना किसी अर्थ का नहीं है । परिश्रम के बिना धैर्य अक्षमता और भाग्यवादी होने को दर्शाता है ।
अंततः धैर्य और सफलता के बीच के संबंध को समझते है । सार्वजनिक जीवन में हर प्रेरणादायी व्यक्तित्व कठिनाईयों से संघर्ष की कहानी कहता है । हर वह व्यक्ति जो आज अविश्वसनीय स्तर का कार्य कर रहा है, और दुनिया के कुछ चुनिंदा लोगों में गिना जाता है । वह कई बार विफल हुआ है । बिल्कुल उसी प्रकार से विफल हुआ है जैसेकि सम्पूर्ण मानव समाज विफल हो हो कर सफल हुआ है । उसने एक बार में कोई बड़ी खोज नहीं की । वह क्रमिक विकास के द्वारा आगे बढ़ा है। विफल हो कर सफल होना मानव के जेनेटिक स्ट्रक्टचर (genetic structure) में है ।
तो प्रश्न उठता है कैसे कुछ लोग एकाएक सफल होने का दावा करते हैं ? तो उत्तर है कि यह सिर्फ एक धोखा है । बात को गलत तरीके से कहने का तरीका है । यह वही बात है कि भले ही आग की खोज कितने असफल प्रयासों के बाद कि गयी थी लेकिन आज हमें उतनी ही आसानी से उपलब्ध है । मनुष्य एक बार धैर्य से जो साधता है उसका फल सारा संसार खाता है । हालांकि कुछ लोगों ने अपने हिस्से के धैर्य से कमाए फल को छिपा कर रखा और चले गए । हम आजीवन अपने धैर्य से कमाए फल को संसार में बाटते है और दूसरे के धैर्य के फल को चखते हुए जीते हैं ।