कितनी मीठी होंगी न ?
जिन उँगलियों से देता है जलेबी,
जलेबी वाले की उँगलियाँ।
लेता है पैसे और,
देता है गरम-गरम जलेबी।
शक्कर के शीरे में तरबतर,
रस में नहाई हुयी,
एक के ऊपर एक बेतरतीब चढ़ी हुयी ।
जलेबियों का ढ़ेर,
जिन उँगलियों से गुजरी उनको,
मीठा कर गयी ।
लेकिन सबसे मीठी उँगलियाँ,
जलेबी वाले की ,
कितनी मीठी होंगी न ?
जिन उँगलियों से देता है जलेबी,
जलेबी वाले की उँगलियाँ।
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| from google images |
जलेबी वाला बेहद बेस्वाद,
स्वादिष्ट उँगलियों का सरताज।
देखों कैसे ?
निर्दयी उँगलियों से मिठास ।
कपड़े में पोंछ रहा,
कपड़े में पोंछ रहा,
क्यों चाट नहीं लेता।
अपनी उँगलियों को ,
जरा छुपके, जरा चुपके।
कितनी मीठी होंगी न?
जिन उँगलियों से देता है जलेबी,
जलेबी वाले की उँगलियाँ।
हो सकता है, उसने बहुत खायी हो ।
जलेबियाँ गरमा-गरम,
जब गरम-गरम छान कर,
उतार रहा था थाली पर,
हो सकता है, खिला के ही,
भर जाता हो मन उसका ,
जैसे घर में दिल माँ का।
लेकिन वो जब भी नीचे झुकता है।
तो देर बाद उठता है।
शायद देते हुये गिर गयी,
जलेबी को उठाने के लिए।
लेकिन अभी भी मौके पर,
जलेबी खाता नहीं,
झुकता है, जलेबी उठाता है,
और खुद उठ जाता है ।
एक पायदान और ऊपर,
मन को साध लिया हो उसने जैसे।
मैं देखकर यह सब सोचता हूँ,
आखिर कैसे ?

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