मेरे प्रिय साथियों ,
आज संघर्ष कहीं ज्यादा स्पष्ट है । इसमें जिनके मध्य प्रतिस्पर्धाएं हैं वे तुम्हारे संगी-साथी ही मात्र नहीं है । यह वर्चस्व, संसाधन, शक्ति और प्रतिष्ठा के लिए; कुछ के लिए कुछ के द्वारा रचा गया है । जो चिरकालीन-सा लगातार विभत्स होता जा रहा हैं । यह स्वाभाविक, भेदभावपूर्ण, विवादास्पद, कठिन और असंतुलित भी है । इसमें सभी के बराबर भागीदारी का स्पर्श तो है लेकिन ऐसा सचमुच में नहीं है।
दुनिया में जितने ज्यादा दिन बचे रह जाओगे उतना अधिक इस बात को सच पाओगे कि संघर्ष को स्थगित करना मेरी सबसे बड़ी गलती थी । मुसीबतें, आकाँक्षाओं से बल लेती है और आकांक्षाएँ समय से बंधी हुयी है । हम समय से नहीं लड़ सकते ; केवल समय पर, समय के अनुकूल व्यवहार कर सकते हैं ।
यह विचार करने योग्य है कि संघर्ष के क्षण कितने कठिन हो सकते हैं ? और किसके-किसके लिए कठिन हो सकते हैं ?
यह कैसे भी स्वयं से स्वयं की लड़ाई तक सीमित नहीं हैं । इसमें परिस्थितियों के मूल्यहीन होने का सवाल ही पैदा नहीं होता । यह अलग-अलग दशाओं के मध्य पले बढ़े नवजवानों का संघर्ष हैं । जिन खूबियों पर वे इतराते हैं , वे कमियाँ जिनका वे रोना रोते है ; नतमस्तक से कमजोर कृशकाय से बर्ताव करते हैं और वे अभाव जिन्हें वे लिस्टगत करके अपनी बदहाली के मूल कारण मानकर जपते रहते हैं, उनके लिए और ऐसे रोने धोने वालों के लिए यहाँ कोई जगह नहीं हैं ।
यहाँ नाम मात्र को कुछेक वर्गगत सुविधायें है जो वर्गगत समस्याओं से घिरी हुयी है । इनमें भी सरकार की मैली नीतियों की छाप पड़ गयी है । जो कागजी तौर पर मैला धोने के बराबर हैं ।
यहाँ वे आगे खड़े हैं । सुविधा के भोगी है, जिनकी पूछ है समाज में । वे तुमसे ज्यादा खूबियों से भरे हुए हो सकते हैं और उनपर वे इतराते भी नहीं हैं । उनके पास कमियों को गिनने का समय नहीं रहा ,और ज्यादातर को उन्होंने पिछले ही सप्ताह निपटा लिया हैं । वे जन्म से अभाव के दंश से बचे हुए है और शायद बचे भी रह जायेंगे । और इन सब के बाद भी उनकी कहानी का यथार्थवाद सुखों के मध्य मंडराता रहता है ।
ऐसे में बहुत ज्यादा संकरी गली में चलने में की दशा में पिसना तो तय है । यह पिसने का हिस्सा हमारा है पर गली की दीवारों पर पोस्टर नहीं ।
संक्षेप में , ऐसे में एकदम बदलाव के इरादे से हम आगे नहीं बढ़ सकते । हमें योजनागत तरीके से परिस्थिति को समझ कर लक्ष्य बनाने होंगे । और कैसे भी करके उनकी हालत का ताज़ा और सटीक अंदाज़ा लगाकर उनसे आगे निकलना होंगा। उनकी गतिविधियाँ झुण्ड के झंझट के जैसी है जिससे उलझे बिना उनसे आगे निकलना होगा। यही समय की जरुरत और हमारा नैतिक उतरदायित्व भी ।
शेष शुभ !!!
आपका अपना ,

