मंगलवार, 24 नवंबर 2015

एक अनन्त गहरा कुँआ !!!!

घनी झाड़ियों में छिपा हुआ,
एक अनंत गहरा कुँआ।
पाताल तक गहरा,
शायद उससे भी ज्यादा
कहते थे ऐसा सभी,
जब भी इसमें फेंका पत्थर,
जानने को कितना गहरा ?
आज तब एक आवाज नहीं किया।
गूँगा है,
बूढ़ा भी है।
अंदर के दीवारों की छपाई,
उधड़ गई है।
कोई अब नहीं जाता है उसके पास,
मनहूस भी है।
कहते थे ऐसा सभी,
लील ही लेता है।
जो भी गिरता है इसमें।

पता नहीं क्यूँ,
पर कई तो कूदे थे इसमें,
आज तक एक आवाज नहीं आई।
भूखा भी है।

आम हलचल से दूर,
अकेला पड़ा,
झाड़ियों ने जिसके मुँह को है ढक रखा।
एक अनन्त गहरा कुँआ।

मैंने एक दिन उसमें झाँका,
और आवाज़ लगाई ।
ओये! कुँए कब तक नहीं बोलेगा?
इतने दिनों तक चुप रहकर
शायद बोलना ही भूल गया।

हर बरसात के बाद मुँह में पानी,
भर कर बैठ जाता है।
इस बार सूखे,
पर कुछ तो बोलेगा।

अकेला अनमना सा,
उदास होगा शायद,
इसकी पसंद का ही कुछ
देकर देखता हूँ।
कितना कुछ व्यर्थ पड़ा है।
मेरे पास,

लेकिन कितना कुछ डालकर देखा,
एक आवाज़ न आई।
अब कि बार एक ऐसी चीज़,
उसके पास लेकर गया दिखाने को,
जो मेरी मनपसंद थी ।
मैं सतर्क था पर पता नहीं,
कैसे हाँथ से छूट गई ।

मैं चिल्लाया,
अंदर से भी वैसी ही आवाज़ आई।
मेरे पास से गई।
और उसको मिल गई।
एक के बाद एक,
मैं और कुँआ ।
उसका नाम पुकारते रहे।

तब से आज तक,
कुँए ने वही बोला।
जो मैं बोलता हूँ।

मैं ने पूँछा,
क्यों रे कुँए ?
मेरी दी हुयी चीज़ इतनी पसंद आ गई।
मैं तब से,
जवाब के इंतज़ार में चुप हूँ,
और शायद कुँए को अब मुझ से,
बात करने में दिलचस्पी रही नहीं।







कल रात माता का मुझे ईमेल आया है ।

ज्यादातर हिन्दू भगवान की मूर्तियों में -
१) भगवान खड़े रहते हैं।
२) भगवान आशीर्वाद दे रहे होते हैं। 
३) भगवान के हाथों में अस्त्र-शस्त्र होते हैं।
    
     ( पिछले दिनों एक गाना बड़ा प्रचलित था। जिसके बोल कुछ इस प्रकार थे - कल रात माता का मुझे ईमेल आया है माता ने मुझे फेसबुक पर बुलाया है। ये बात आज हास्यास्पद लग सकती है। लेकिन सोचिये जब भगवान की मूर्ति के हाथों में इलेक्ट्रानिक गैज़ेट होंगे, एक हाथ में लैपटॉप, दूसरे में स्मार्ट फ़ोन हो। तब ये सोचना बिलकुल लाजमी होगा की माता का ईमेल मुझे क्यों नहीं आया ? )

     मूर्ति का निर्माण अक्सर एक पूर्वधारणा लेकर किया जाता है । एक परिस्थिति सोची जाती है उसके बाद मूर्ति का निर्माण किया जाता है । मूर्तिकला चित्रकला का थ्री डायमेंशनल व्यू होता है इसलिए मूर्ति का प्रभाव मानव मन पर भी चित्र से कहीँ अधिक होता है । चित्रकला से मूर्तिकला की तनिक सी समानता के कारण चित्र कला के किंचित आधारभूत गुण एक आदर्श मूर्ति से भी अपेक्षित होते हैं।
      हमारी नैतिकता का एक स्रोत धर्म है। धर्म हमें नैतिकता के आधार भगवान को अपना आराध्य मानने की अपेक्षा रखता है । सामान्यतः भगवान को मानने से बहुदा धार्मिक व मनोवैज्ञानिक उलझनों का जवाब सरलता से मिल जाता है । 
       परंतु यहाँ प्रश्न यह नहीं है। सोचने की बात ये है कि शक्तिपीठों में स्थापित पिंडो से लेकर बुद्ध और महावीर की ऊर्ध्वाधर गगन चुम्बी मूर्तियों की व्यवहारिकता कितनी है ? अर्थात् ये मूर्तियाँ केवल आशीर्वाद दे सकती है क्या ? ये हमें एक गैर लचीले नियम में बाँधती है जिसमें भगवान से हमारा रिश्ता फिक्स हो गया है। 
       पिछले दिनों हिंदी के जाने माने अख़बार पर एक लेख पढ़ा । लेख हनुमान जी की बदसूरत सी दिखने वाली मूर्ति पर था । लेखक का मानना था जब हमारी चेतना में हनुमान जी की इतनी शक्तिशाली छवि है तो उनकी ऐसी मरियल सी मूर्ति बनाना कैसे उचित हो सकता है ? यूरोप के देवताओं की नंगी मूर्तियों को देख कर हमें शर्म आ जाती है इस प्रकार का भाव मन में आना में ही उस मूर्तिकार की सफलता है । शर्म तो हमें आती है उनके लिए तो धरोहर है। 
       जो बात कहने के लिए इतनी भूमिका बांधी गई वो बात बहुत साधारण सी है कि जगजीत सिंह के एक वीडियो में एक बच्ची राम को अपना भाई मानती है। देश में कौन से मंदिर में राम जी मूर्ति को देख कर पाँच साल की लड़की को उसमें अपना भाई दिखेगा ? निश्चय ही किसी में भी नहीं । इसीप्रकार फेसबुक पर एक फ़ोटो तैर रही है जिसमेँ लगभग 5-6 साल की बच्ची हनुमान जी की मूर्ति से गले मिल रही है और मूर्ति तब भी आशीर्वाद दे रही है । मेरा मानना है एक ऐसी मूर्ति बननी चाहिए जिसमेँ भगवान से गले मिलने का सुख भी मिल सके और लगे भगवान भी हमसे गले मिलने में सहज मासूस कर रहे है क्योंकि निकटता से प्रेम बढ़ता है। 
        नैतिकता का बीज बचपन में बोया जाता है इसलिए मंदिरों में मूर्तियाँ बच्चों का मनोविज्ञान ध्यान में रख कर बनानी चाहिए न की तलवार, भाला लिए हुए और सिर्फ आशीर्वाद देते हुए

    

गुरुवार, 19 नवंबर 2015

निराश मत होओ, सब ठीक हो जायेगा

"निराशा से सिर्फ मन घायल होता है, हमारी नसमझी हमारी जान ले लेती है । "

      मनोनुकूल जीवन न होने के कारण निराश होना मन का स्वाभाविक लक्षण है। ऐसे में किसी के यह कहने पर की "निराश मत होओ सब ठीक हो जायेगा "। सिर्फ और सिर्फ कोरा झूठ प्रतीत होता है जो कि मन बहलाने के लिए बोला जा रहा है । हालाँकि हो सकता है, ऐसा बोलने वाला हमारा हित ही चाहता हो फिर भी उसकी इन बातों से मन का हाल और जीवन का अकाल दोनों ही दूर तो नहीं हो पायेगा । और इसकी जकड़न के बढ़ने का परिणाम अत्यंत भयवाह होता है । निराश और हताश व्यक्ति ही आत्महत्या करते हैं। मच्छर और मक्खी से बचने के लाख जुगत भिड़ने वाला मनुष्य खुद को मर लेगा । सुनने भर से विश्वास नहीं होता । आत्महत्या की ऊँची दर वैश्विक समस्या है । विश्व में, हर 40 सेकेण्ड में एक मनुष्य खुद को मर लेता है । 
      देख लिया इतनी खतरनाक चीज़ है निराशा। निराशा और कुछ नहीं मनुष्य के पञ्च चिर शत्रुओं का ही ऐसा मिश्रण है जिसमें इन पाँचों के विपरीत गुण भरे हुए है । उदाहरण के लिए सामान्यत: निराश व्यक्ति स्वतः भले क्रोध, काम, लोभ से बचा रहे पर उससे जुड़े अन्य लोगों में वह इन भावों को बोता और सींचता रहता है । निराश व्यक्ति वास्तव में चलता फिरता शांति विनाशक यंत्र है । 
       ऐसे में निराशा के साथ किये गए प्रयोग के कुछ संभावित परिणाम अग्र लिखित है । शायद ये आपकी या आपके किसी अपने के मन से निराशा को दूर कर आशा का संचार कर सके । और हाँ ये प्रयास उस एक बेकार लाइन से लाख गुना अच्छे है जिसमें कथा कथित शुभचिंतक ये कहते है कि 'निराश मत होओ सब ठीक हो जायेगा' । ऐसे में एक ही बात बोलने का मन करता है-" घण्टा ठीक हो जायेगा, आप के ऊपर आएगा तब पता चलेगा और तब देखूँगा कैसे सब अपने आप ठीक होता है ?"


(१) सबसे पहले निराशा को मन का स्वाभाविक गुण मानते हुए अपनी निराशा को और उसके कारण को स्पष्ट रूप से स्वीकार करना चाहिए । ऐसा करने से आपको अपनी भावनाओं की सही समझ बनेगी । कभी-कभी निराशा के कारण इतने संश्लिष्ट होते है कि उनको पहचानना कठिन होता है । ऐसा करके आप खुद को जान पाएंगे । और सबसे मजेदार बात आप यह जान पाएंगे कि किसी विषय में कौन-सी बात आपको सबसे ज्यादा मानसिक स्तर पर चुभ रही है और तब आप अनायास ही मन ही मन कहेंगे "ओ तेरी, अबे इस बात को लेकर मैं इतना परेशान हूँ । " व्यक्ति केवल चिंतन न करने के कारण सामान्य सी बातों को भी नज़रअंदाज़ कर देता है । ऐसा करने से बचें ।

(२) अपने जीवन की परिस्थितियों को आप से बेहतर और कोई नहीं समझ सकता । हाँ हाँ ! वो चाहे कितना बड़ा बाबा या फ़क़ीर हो । दूसरों से जल्दबाजी में अपने भाव शेयर न करें । क्योंकि वो कुछ नहीं कर सकते वो केवल वही घिसी पिटी पञ्च लाइन " निराश मत होओ......." दे सकते हैं । और आपके इस कुत्सित मानसिक दशा से बाहर निकलने के विश्वास को कमजोर कर सकते हैं । इस तरह का हर असफल प्रयास आप को और निराश के दलदल में धकेलते जायेंगे ।

(३) यह बिंदु सबसे महत्त्वपूर्ण है । समस्या को पहचान जाने के बाद उसके वास्तविक हल का विकल्प खोजें (बस इतनी सी ही बात है) । यह उपाय अखंड, अपराजेय, सब मन शोक निवारक, विशेष तरीकों से सिद्ध किया हुआ है । यह उपाय किसी भी निराशाग्रस्त मन से उसके निराशा के कारण को क्षण भर में तो नहीं हटा सकेगा पर हाँ हटाना शुरू जरूर कर देगा । अब समस्या बढ़ेगी नहीं । धीरे-धीरे ही सही उपचार होने लगेगा ।
एक आम जीवन की परंतु काल्पनिक-सी परिस्थिति को लेकर इसका परिक्षण करके देख सकते है जैसे कि मान लेते हैं कोई परीक्षार्थी किसी अमुक 'सफलता' की प्राप्ति की आकांक्षा में मेहनत करता है और हर बार विफल हो जाता है। ऐसी स्थिति में उसके मन में निराशा घर कर जायेगी । कुछ भी करने का उसका मन नहीं करेगा । और इस मनः दशा के साथ उसका जीवन दिन ब दिन कठिन होता जायेगा । सम्भावना है कि एक विषम दिन वो आत्महत्या भी कर ले । ऐसी स्थिति में यदि विकल्प रूप में उसे शीघ्रता से कोई अन्य सफलता मिल जाती है तो निश्चितरूप से उसकी निराशा में कमी आएगी ।

कुछ अन्य अवलोकन का भी सहारा लेकर इसे समझ सकते हैं । मान लेते है कि कोई व्यक्ति किसी बड़े व प्रतिष्ठित संस्थान से इंजीनियरिंग करना चाहता था परंतु ऐसा नहीं हो पता है तो वह किसी अन्य संस्थान से भी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर सकता है । और यदि वो ऐसा कर पता है तो उसके जीवन में कम से कम इस कारण से कभी भी स्थाई और दृढ़ निराशा नहीं छायेगी ।

(४) विकल्पों की जहाँ भी बहुलता होगी । वहाँ निराशा के मामले कम मिलेंगे । व्यक्ति सिर्फ अपनी आकाँक्षाओं की पूर्ती करना चाहता है । स्वाभाविक सी बात है जब एक ही प्रकार की इच्छा कई लोग पालेंगे तो कुछ को निराशा और विफलता हाथ लगेगी ही परंतु ऐसे में भी मनुष्य को चाहिए की तुलनात्मक रूप से समानान्तर विकल्प की तलाश करते हुए सदा आशावादी बने रहने का प्रयास करना चाहिए ।

"निराशा से सिर्फ मन घायल होता है हमारी न समझी हमारी जान ले लेती है । "

सोमवार, 16 नवंबर 2015

मुझे तो जाना ही था ।

खोजते हुए ठिकाना,
मेरा वहाँ आना,

शायद वो दो थे,
एक हो ही पाना ।
बाजू वाली कुर्सी पे नज़र पड़ते ही,
मेरा समझ जाना,
और चुप चाप वहाँ से चले जाना,
मुझे तो जाना ही था ।

किसने सोचा था,
होगी ऐसी मुलाकात,
आँखों का टकराना ।
न मुझे कुछ कहना था ।
और न उसने कुछ कहाँ,
ऐसा ही होगा पता था ।
रो रो कर खुद को समझाना ।
की मुझे तो जाना ही था ।

ऐसा कैसे हो गया ?
मैंने कभी खुद के लिए,
जो नहीं माँगा,
वो कैसे मैं समझ गया ।
करीब एक घंटे बिताने का इरादा था मेरा,
पर पता नहीं क्या हुआ,
मैं उठा और सेकंड भर में वहाँ से चला गया,
क्योंकि मुझे तो जाना ही था ।

ये बात उसको कैसे बताता,
की उसकी विवश्ता को,
समझता हूँ मैं न ।
इसलिए तो ,
कुछ कहे बिना ही चला गया ।

क्योंकि मुझे तो जाना ही था।