सोमवार, 22 जनवरी 2018

जलेबी वाला


कितनी मीठी होंगी न ?
जिन उँगलियों से देता है जलेबी,
जलेबी वाले की उँगलियाँ।

लेता है पैसे और,
देता है गरम-गरम जलेबी।
शक्कर के शीरे में तरबतर,
रस में नहाई हुयी,
एक के ऊपर एक बेतरतीब चढ़ी हुयी ।
जलेबियों का ढ़ेर,
जिन उँगलियों से गुजरी उनको,
मीठा कर गयी ।
लेकिन सबसे मीठी उँगलियाँ,
जलेबी वाले की ,
कितनी मीठी होंगी न ?
जिन उँगलियों से देता है जलेबी,
जलेबी वाले की उँगलियाँ।

from google images
जलेबी वाला बेहद बेस्वाद,
स्वादिष्ट उँगलियों का सरताज।
देखों कैसे ? 
निर्दयी उँगलियों से मिठास ।  
कपड़े में पोंछ रहा,
क्यों चाट नहीं लेता।  
अपनी उँगलियों को ,
जरा छुपके, जरा चुपके।
कितनी मीठी होंगी न?
जिन उँगलियों से देता है जलेबी,
               जलेबी वाले की उँगलियाँ।


हो सकता है, उसने बहुत खायी हो ।
जलेबियाँ गरमा-गरम,
जब गरम-गरम छान कर,
उतार रहा था थाली पर,
हो सकता है, खिला के ही,
भर जाता हो मन उसका ,
जैसे घर में दिल माँ का।

लेकिन वो जब भी नीचे झुकता है।
तो देर बाद उठता है।
शायद देते हुये गिर गयी,
जलेबी को उठाने के लिए।
लेकिन अभी भी मौके पर,
जलेबी खाता नहीं,
झुकता है, जलेबी उठाता है,
और खुद उठ जाता है ।
एक पायदान और ऊपर,
मन को साध लिया हो उसने जैसे।

मैं देखकर यह सब सोचता हूँ,

आखिर कैसे ?

सवाल और जिनको इसने सुलझा दिया

हर साल एक जमघट-सा लगता है । एक ही दिन में क्रमशः दो बार ; एक बार सुबह और एक बार दोपहर में । सालाना किस्मत और मेहनत आजमाने का दिन आता है । ऐसी कई एक दिवसीय परीक्षाएँ आयोजन होने को होती है जिनके परिणाम भी आते हैं । परीक्षाओं में प्रश्न-पत्र होता है और प्रश्न-पत्र में प्रश्न । प्रश्न सीमित गिनती में होते हैं । प्रश्नों को देखकर विद्यार्थी सोचते है आखिर यही प्रश्न  क्यों आया ? शायद प्रश्नों के आने के पीछे एक सुबोध और पहेलीनुमा कारण छुपा देने में भी परीक्षा लेने वाली संस्थाओं का कोई मन्तव्य छिपा हो । साल भर में कई सवाल चर्चा का विषय होते हैं । उनमें से कई विभिन्न मॉडल प्रश्न-पत्र में आते हैं , कई टेस्ट श्रृंखला में आते हैं । कई बेहद शानदार सवाल कहीं भी नहीं आते हैं या यूँ कह ले कई घटनाएँ , अपनी जगह प्रश्नों के रूप में नहीं बना पाती है । कुछ घटनायें अपने घटने के कई वर्षों के बाद प्रश्न-पत्र में देखी जाती है । सामान्य ज्ञान तौलने वाली ऐसी परीक्षाएँ जिनमें समसामयिक घटनाओं के भी प्रश्न होते हैं । इन परीक्षाओं में सफल होने वाले भी सालाना सवालों के समान ही, कुछ झट से चयनित हो जाते हैं । कुछ बहुत होनहार होने के बाद भी साल दर साल इंतज़ार करते रहते हैं । और कुछ बेहतरीन सवालों की तरह जो कभी नहीं आते हैं उसी प्रकार कुछ प्रतिभागी कभी-भी चयनित नहीं हो पाते हैं । 

एक सज्जन ने मुझसे पूछ लिया कि आखिर क्यों कुछ चयनित हो जाते हैं और कुछ नहीं ? तो प्रश्न का उत्तर इस बात में छिपा है कि चयन करने वाले की प्राथमिकता क्या है ? उसे जो चाहिए और आप जो है इन दोनों के बीच जितनी कम विसंगति होगी । व्यक्ति उतनी ही शीघ्रता से चयनित हो जाएगा ।

मंदिर या मस्जिद : तैरते पत्थर के बोल !

"मंदिर या मस्जिद, पंडा और इमाम की जिद; 
  दोनों में वही ईंट-गारा, एक थे वीर-जारा;"

  http://www.thehindu.com/todays-paper/tp-national/ichr-to-study-if-ram-setu-is-man-made-or-natural/article17660630.ece 

एक अङ्ग्रेज़ी अखबार "द हिन्दू " जिसे हिन्दी में भी छपना चाहिए के 25 मार्च 2017 के संस्करण में एक ख़बर ने सही समय पर सफ़ेद कागज पर निशान छोड़े हैं । समय यूँ तो कलियुग का चल रहा हैं और कलियुग में राज अधर्म का होगा जैसा की पुरानों में लिखा है ,अधर्म से याद आया देश की राजनीति में समय बीजेपी का भी काफी अच्छा चल रहा है। ऐसे में जबकि देश के सबसे बदतर प्रदेश अर्थात उत्तर प्रदेश में और केंद्र में भी बीजेपी की सरकार है तो राम मंदिर तो बनना तय लग रहा हैं । हालिया घटनाक्रम में माननीय सुप्रीम कोर्ट  के इस मामले पर आपसी बात-चीत के सुझाव के बाद राह सुलझने के बजाय कहीं ज्यादा उलझती नजर आ रही है क्योंकि विश्व हिन्दू परिषद जो की हिंदुओं की ओर से मंदिर-मस्जिद विवाद में एक पक्षकार है, के अड़ियल रवैये के कारण कि बनेगा तो मंदिर ही बनेगा और कोई दूसरा रास्ता सोचा तक नहीं जा सकता; इस कारण से अभी तक जमीन खाली पड़ी हुयी है। तरह-तरह के विचार आए कि जमीन का सार्वजनिक सामाजिक अधोसंरचना जैसे अस्पताल आदि के लिए उपयोग कर लिया जाए लेकिन जैसा कि स्वाभाविक है विवाद के दोनों पक्षकार के बीच इस बात पर आम राय न बन पाने के कारण ही ऐसा हुआ कि आज तक जमीन खाली है । आप खुद ही सोचिए, हम अक्सर बोल चाल में कहते हैं कि जो भगवान का होता है उसका बेड़ा भगवान जरूर पार लगते हैं लेकिन ये जमीन जिस पर कथाकथित कुछ लोगों के दावानुसार भगवान राम कि जन्मभूमि होने का दावा है आज तक खाली है या थोड़ फोड़ के खाली कराई गई हैं । लेकिन ये सब तो घिसी पिटी बात हुयी । असल मजा तो उस ख़बर में छिपा है जिसमें ये कहा गया है कि आईसीएचआर अर्थात इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्टॉरिकल रिसर्च राम सेतु कि वैधता कि जाँच करेगा । शब्द थोड़े कड़वे है न ! लेकिन क्या करे सरकार ही जो राम भक्तों कि बनवाई है सबने मिलके अब या तो राम रहेंगे या राम के न होने के तथ्य पर लीपापोती कि जाएगी । क्योंकि ये तो सीधी सी बात है न कि जब भगवान राम रहे होंगे; रावण ने सीता माता का अपहरण किया होगा फिर भगवान राम ने माता सीता को बचाने और अधर्म के नाश के लिए लंका और भारतवर्ष के बीच के समुद्र को पार करने के लिए सेतु बनाया होगा । ये निश्चय ही आस्था का विषय है लेकिन रामचरितमानस केवल आध्यात्मिक साहित्य नहीं है इसकी जाँच कैसे हो सकती है ? ऐसे ही तो हो सकती है कि राम के कृत्य की सत्यता की जाँच की जाए ! लेकिन राम के न होने से ये तो तब भी सिद्ध नहीं होगा कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद को बनाने के लिए पहले से बने राम मंदिर को तोड़ा गया पर एक बात तो तय है कि इसके बाद ये जो इनकी जिद्द है कि मंदिर वही बनाएँगे क्योंकि भगवान राम का यहीं हुआ है कुछ कमजोर हो जाएगा । मित्रों , दावा कमजोर होगा कि नहीं होगा , होगा जरूर होगा । सवा सौ करोड़ भारतीयों को ज्यादा दिनों तक नहीं ठगा जा सकता हैं ।