मेरे प्रिय मित्र,
पता नहीं क्यूँ ! कुछ बात तुमसे आज बाँटना चाहता हूँ । ऐसा मेरा विश्वास है कि मेरी कही हुयी बात से ज्यादा बल लिखी हुई बात में होता है ; इसलिए लेखन के इस प्रारूप में अपने मन को आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ । मैं जो कह रहा हूँ उसमें कुछ पूर्वधारणाएँ भी गुप्त रूप से शामिल है, जिन्हें बिना बताएँ सरलता से नहीं समझा जा सकता हैं ।
मैंने जो महसूस किया है उसे यथावत कह रहा हूँ ।
जीवन में महत्वकांक्षा होना अच्छा है; परंतु जीवन सम्बन्ध रूपी जंजीरों से बंधा भी हुआ है। हम अधिक ऊंचाई तक केवल इसलिए नहीं जा पा रहे क्योंकि हमने मेहनत कम की है ; ऐसा कहना दो स्थितियों में गलत और अनैतिक हो जाता हैं । पहला ,तब जब आपके सम्बंध आपके महत्वकांक्षा के बीच आ रहे हों और आपने नियत मेहनत कर ली हो और दूसरा, तब जब आपकी परिस्थितियां ही प्रतिकूल हो । ऐसा असंभव नहीं है जब आपका समय प्रतिकूल हो। ऐसी स्थिति में हम पूर्व जन्मों के कर्मों का रोना नहीं रो सकते ; और न ही अपनी महत्वकांक्षाओं से चिपके हुए रह सकते हैं ।
ईश्वर की मर्जी कुछ और नहीं होती है । ये मुझे लगता है कि बहुत प्रयास करने के बाद भी जब आप निरन्तर असफल हो रहे होते हैं , तो दो ही रास्ते बचते हैं कि आप लगे रहे हैं या हार मान ले । दुनिया बहुत निर्दयी है । ये हम अपने चारों ओर घट रहे घटनाक्रम से जान सकते हैं ; इसलिए लगे रहना अपेक्षित परिणाम देगा इसकी गारंटी कोई नहीं दे सकता है ; लेकिन परिणाम की गारंटी जरूर मिलेगी ।
सब कुछ सापेक्ष भी है, और निरपेक्ष भी । यदि तुम ठीक प्रकार से देखोगे तो क्या एक छोटी सी घटना जीवन को पूरा उलट पलट करने में काफी नहीं हैं । व्यक्ति अँधेरे में रस्सी को सांप समझकर काल के गाल में समां सकता हैं ऐसे में न तो अँधेरे और न ही रस्सी का मिलन असंभव है ।
मैं जब ऐसा लिख रहा हूँ तो इसका कदापि अर्थ मेरा पलायनवादी होना नहीं है; बल्कि जीवन को दिन प्रतिदिन देखते हुए इस निष्कर्ष तक पहुचना है कि सरौते से नीम की पतली शाखा को काट कर मुखारी बनाइ जा सकती है, बरगद के मोटे वृक्षों को नहीं कटा-छाटा जा सकता हैं। हमें हमारी नियति ने बनाया है यदि तुम एकाएक इतना सामर्थ्य जुटा कर नियति को बदलने का भरसक प्रयास करोगे तो निश्चय ही अत्यंत अकेले, कमजोर और चोटिल हो जाओगे ।
मैं बिलकुल यह नहीं कहता कि मेरे प्रयास करने के दिन लद गए है बल्कि यह मैं जान चूका हूँ कि अधिकतम मैं किस सीमा तक जा सकता हूँ। ऐसा बिल्कुल हो सकता है कि कल को कुछेक परिस्थितियां ऐसी हो जाय जिनके कारण मेरे सामर्थ्य में वृद्धि हो जाये , तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए ; लेकिन स्वतः कुछ करने से कुछ नहीं हो सकता हैं ।
तुम स्वतः व्यवहारिक जीवन से परिचित हो। ऐसा कहने वाले लोग कि असंभव कुछ भी नहीं होता है , बहुत ज्यादा नासमझ और भोले स्वाभाव के लोग हैं । असल में ; असल जिंदगी में अधिकांश चीज़े तो असंभव है ,हम ताउम्र देखते है अपने माता-पिता को चीज़ों को हमारे लिए संभव बनाने के लिए संघर्ष करते हुए ; और तब पर भी हम कहते है कि असंभव कुछ नहीं है ।
मैंने जो लिखा है, इसे मैं ने न केवल तुम्हारे लिए बल्कि स्वयं के लिए भी लिखा है क्योंकि यह जानना बहुत जरुरी है कि समझौते करना और , जीवन के प्रति अधिक मात्रा में स्वीकार का भाव होना बेहद जरुरी है ।
कोई भी अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए अपने पारिवारिक संबंधों को दांव पर नहीं लगा सकता है और ; यदि कोई ऐसा करता है तो उससे मुर्ख, स्वार्थी और स्वयं का विनाश करने वाला कोई दूसरा नहीं है । ये आत्मघाती स्वाभाव का व्यक्ति है ।
हमें स्वीकारना होगा । हम स्वीकार नहीं पाते है क्योंकि हम स्वयं को साध्य संकटों से घिरा हुआ मानते है लेकिन ये साध्य से लगने वाले संकट कुछ शर्तों के साथ असाध्य से है । हमारी अयोग्यता कई बार हमारी विफलता तय नहीं करती है। यह हमारी परिस्थितियां भी होती है जिन्होंने हमारे मार्ग को गढ़ा है। यह बात जितनी हमारे लिए सच है उतनी ही दूसरों के लिए भी , इसलिए किसी को हम दोष बहुत देर तक और बहुत दिन तक नही दे सकते हैं ।
क्षमा बड़ो को शोभने वाला आभूषण है । हमे सदैव क्षमा करते रहना चाहिए ।
तुम्हारा मित्र,
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