"भारतीय राष्ट्रीय, वृहद् सामाजिक-आर्थिक योजनाओं को जमीन पर साकार करने जब हम जाते हैं तो विशाल जनसंख्या सबसे पहले हमारे मनोबल को झकझोरती है । इसके बाद जो कुछ बचा मनोबल है उसे आधी आबादी अर्थात स्त्रियों की दशा देखकर गहरी चोट लगती है । इसके आगे, शिक्षा की बाधा आती है । शिक्षा के मुद्दे पर प्राथमिक स्कूलों की जर्जर दशा नजर आती है । प्राथमिक विद्यालयों में निम्न नामांकन अनुपात की समस्या है । नामाकंन अनुपात में निम्नता का कारण बाल-श्रम है । बाल-श्रम का कारण गरीबी है । और गरीबी का कारण पारिवारिक विसंगति है क्योंकि ...नैसर्गिक रूप में जन्तुओं में मादाओं के साथ ही नवजात देखे जाते हैं। यह स्वतः ही होता है कि नवजात के जन्म के पश्चात उनके भरण पोषण की जिम्मेदारी मादा के हाथों में होती है । फिर यह नैसर्गिक व्यवस्था मनुष्य के हाथों में पकड़कर बलपूर्वक बदली गई और समाज पितृसत्तात्मक हो गया । समस्या की आखिरी कड़ी यही है । इसके बाद कुछ कहने को ज्यादा बचता नहीं है । "
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