गुरुवार, 30 मार्च 2017

मित्र को पत्र

मेरे प्रिय मित्र, 

                 पता नहीं क्यूँ ! कुछ बात तुमसे आज बाँटना चाहता हूँ । ऐसा मेरा विश्वास है कि मेरी कही हुयी बात से ज्यादा बल लिखी हुई बात में होता है ; इसलिए लेखन के इस प्रारूप में अपने मन को आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ । मैं जो कह रहा हूँ उसमें कुछ पूर्वधारणाएँ भी गुप्त रूप से शामिल है, जिन्हें बिना बताएँ सरलता से नहीं समझा जा सकता हैं । 

                मैंने जो महसूस किया है उसे यथावत कह रहा हूँ । 

                जीवन में महत्वकांक्षा होना अच्छा है; परंतु जीवन सम्बन्ध रूपी जंजीरों से बंधा भी हुआ है। हम अधिक ऊंचाई तक केवल इसलिए नहीं जा पा रहे क्योंकि हमने मेहनत कम की है ; ऐसा कहना दो स्थितियों में गलत और अनैतिक हो जाता हैं । पहला ,तब जब आपके सम्बंध आपके महत्वकांक्षा के बीच आ रहे हों और आपने नियत मेहनत कर ली हो और दूसरा, तब जब आपकी परिस्थितियां ही प्रतिकूल हो । ऐसा असंभव नहीं है जब आपका समय प्रतिकूल हो। ऐसी स्थिति में हम पूर्व जन्मों के कर्मों का रोना नहीं रो सकते ; और न ही अपनी महत्वकांक्षाओं से चिपके हुए रह सकते हैं । 

               ईश्वर की मर्जी कुछ और नहीं होती है । ये मुझे लगता है कि बहुत प्रयास करने के बाद भी जब आप निरन्तर असफल हो रहे होते हैं , तो दो ही रास्ते बचते हैं कि आप लगे रहे हैं या हार मान ले । दुनिया बहुत निर्दयी है । ये हम अपने चारों ओर घट रहे घटनाक्रम से जान सकते हैं ; इसलिए लगे रहना अपेक्षित परिणाम देगा इसकी गारंटी कोई नहीं दे सकता है ; लेकिन परिणाम की गारंटी जरूर मिलेगी ।

  
                सब कुछ सापेक्ष भी है, और निरपेक्ष भी । यदि तुम ठीक प्रकार से देखोगे तो क्या एक छोटी सी घटना जीवन को पूरा उलट पलट करने में काफी नहीं हैं । व्यक्ति अँधेरे में रस्सी को सांप समझकर काल के गाल में समां सकता हैं ऐसे में न तो अँधेरे और न ही रस्सी का मिलन असंभव है । 


                 मैं जब ऐसा लिख रहा हूँ तो इसका कदापि अर्थ मेरा पलायनवादी होना नहीं है; बल्कि जीवन को दिन प्रतिदिन देखते हुए इस निष्कर्ष तक पहुचना है कि सरौते से नीम की पतली शाखा को काट कर मुखारी बनाइ जा सकती है, बरगद के मोटे वृक्षों को नहीं कटा-छाटा जा सकता हैं। हमें हमारी नियति ने बनाया है यदि तुम एकाएक इतना सामर्थ्य जुटा कर नियति को बदलने का भरसक प्रयास करोगे तो निश्चय ही अत्यंत अकेले, कमजोर और चोटिल हो जाओगे । 


                मैं बिलकुल यह नहीं कहता कि मेरे प्रयास करने के दिन लद गए है बल्कि यह मैं जान चूका हूँ कि अधिकतम मैं किस सीमा तक जा सकता हूँ। ऐसा बिल्कुल हो सकता है कि कल को कुछेक परिस्थितियां ऐसी हो जाय जिनके कारण मेरे सामर्थ्य में वृद्धि हो जाये , तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए ; लेकिन स्वतः कुछ करने से कुछ नहीं हो सकता हैं । 


                 तुम स्वतः व्यवहारिक जीवन से परिचित हो। ऐसा कहने वाले लोग कि असंभव कुछ भी नहीं होता है , बहुत ज्यादा नासमझ और भोले स्वाभाव के लोग हैं । असल में ; असल जिंदगी में अधिकांश चीज़े तो असंभव है ,हम ताउम्र देखते है अपने माता-पिता को चीज़ों को हमारे लिए संभव बनाने के लिए संघर्ष करते हुए ; और तब पर भी हम कहते है कि असंभव कुछ नहीं है । 


                  मैंने जो लिखा है, इसे मैं ने न केवल तुम्हारे लिए बल्कि स्वयं के लिए भी लिखा है क्योंकि यह जानना बहुत जरुरी है कि समझौते करना और , जीवन के प्रति अधिक मात्रा में स्वीकार का भाव होना बेहद जरुरी है । 

                 कोई भी अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए अपने पारिवारिक संबंधों को दांव पर नहीं लगा सकता है और ; यदि कोई ऐसा करता है तो उससे मुर्ख, स्वार्थी और स्वयं का विनाश करने वाला कोई दूसरा नहीं है । ये आत्मघाती स्वाभाव का व्यक्ति है ।  


                 हमें स्वीकारना होगा । हम स्वीकार नहीं पाते है क्योंकि हम स्वयं को साध्य संकटों से घिरा हुआ मानते है लेकिन ये साध्य से लगने वाले संकट कुछ शर्तों के साथ असाध्य से है । हमारी अयोग्यता कई बार हमारी विफलता तय नहीं करती है। यह हमारी परिस्थितियां भी होती है जिन्होंने हमारे मार्ग को गढ़ा है। यह बात जितनी हमारे लिए सच है उतनी ही दूसरों के लिए भी , इसलिए किसी को हम दोष बहुत देर तक और बहुत दिन तक नही दे सकते हैं । 


                  क्षमा बड़ो को शोभने वाला आभूषण है । हमे सदैव क्षमा करते रहना चाहिए ।


तुम्हारा मित्र,

सोमवार, 27 मार्च 2017

१) मैं उन क्षणों को याद करके आनन्द का अनुभव करता हूँ  , जबकि शरीर की इंद्रिया सो रही होती है । बिना इच्छा के एक क्षण भी बहुत है । संपूर्ण ब्रह्माण्ड शांत है लेकिन एक हमारा मन नहीं है । क्या थोड़ी-सी शांति मन को नही मिल सकती है ? ॐ शांति! शांति! शांति!

२) आप एक ही समय में दो चीज़ के बारे में नहीं सोच सकते हैं । यदि आप ऐसा कर भी लेते हैं तो प्रत्येक की ओर आपकी चिंतन क्षमता बँट जायेगी, इसलिए एक समय में एक के बारे में सोचिये और किसके बारे में सोचना चाहिए । इसका फैसला इस बात से करिये कि आप के लंबे समय तक सोचने लायक बने रहने के लिए क्या ज्यादा जरुरी है ? 

३) गलती कर देने के बाद क्षमा माँगना बहुत बेहतर उपाय नहीं है । ये एक सकारात्मक कदम कहा जा सकता है; दोनों के लिए माफ़ी माँगने वाले के लिए भी और माफ़ करने वाले के लिए भी । लेकिन इस कदम को कतई गलती न करने के कदम से श्रेयस्कर नहीं माना जा सकता हैं ।

४) ये तो जरुरी है ही कि हम क्या देखते हैं लेकिन उससे ज्यादा जरुरी देखने का नजरिया है । जो विभाजन भारत से एक हिस्से का अलग होना था, वो साथ ही एक स्वतंत्र राष्ट्र का बनना भी था ।

५) लालची, कमीना, असंवेदनशील और बुद्धिमान बच्चा पैदा करना आसान है लेकिन कृतज्ञ, सीधा, ईमानदार और मंद बुद्धि बच्चा पैदा करना कठिन है । जबकि लोग उल्टा समझते हैं ।

६) मैं किसी व्यक्ति पर तब तक भरोसा नहीं कर सकता जब तक कि मैं उसके मन के भीतर चलने वाले वाद-प्रतिवाद को नहीं जान लेता ।

शुक्रवार, 17 मार्च 2017

आखिरी कड़ी आखिरकार मिल गई

"भारतीय राष्ट्रीय, वृहद् सामाजिक-आर्थिक योजनाओं को जमीन पर साकार करने जब हम जाते हैं तो विशाल जनसंख्या सबसे पहले हमारे मनोबल को झकझोरती है । इसके बाद जो कुछ बचा मनोबल है उसे आधी आबादी अर्थात स्त्रियों की दशा देखकर गहरी चोट लगती है । इसके आगे, शिक्षा की बाधा आती है । शिक्षा के मुद्दे पर प्राथमिक स्कूलों की जर्जर दशा नजर आती है । प्राथमिक विद्यालयों में निम्न नामांकन अनुपात की समस्या है । नामाकंन अनुपात में निम्नता का कारण बाल-श्रम है । बाल-श्रम का कारण गरीबी है । और गरीबी का कारण पारिवारिक विसंगति है क्योंकि ...नैसर्गिक रूप में जन्तुओं में मादाओं के साथ ही नवजात देखे जाते हैं। यह स्वतः ही होता है कि नवजात के जन्म के पश्चात उनके भरण पोषण की जिम्मेदारी मादा के हाथों में होती है । फिर यह नैसर्गिक व्यवस्था मनुष्य के हाथों में पकड़कर बलपूर्वक बदली गई और समाज पितृसत्तात्मक हो गया । समस्या की आखिरी कड़ी यही है । इसके बाद कुछ कहने को ज्यादा बचता नहीं है । "

गुरुवार, 19 जनवरी 2017

ठक - ठक

निर्धन के घर में,
दरवाजा दिखता नहीं,
या दरवाजा होता नहीं ,
या दरवाजा वो लगाता नही ।

दरवाजा फिजूल का खर्च,
भी लग सकता है उसे,
हो सकता है ,
हमेशा दरवाजा खुला रखने,
की पाबन्दी हो ,
साहेब का हुक्म हो ,
सो बेगार करने वाला ,
साहेब की मर्जी से आता है।
जाता है ।
दरवाजा लगाना उसे
संस्कार के खिलाफ लगा ,
इसलिए उसने दरवाजा लगाया ही नहीं ।

सूदखोर के चमचे आकर ,
खट-खटाते ,
बेचैनी होती ,
चिल्लाते, गालियां बकते ,
गुस्सा हो जाते ।
धमकियाँ देते ।
धमकियाँ दरवाजा तोड़ देंने की ,
डर के मारे ,
हिम्मत न कर पाता ,
दरवाजे की आड़ में ,
धमकियाँ न सुन पाता।
तो ,
तो क्या ?
दरवाजा टूट जाता ,
इसलिए दरवाजा लगाया ही नहीं ।

गईया को पानी पीना हो,
खाना खाना हो ।
कभी रात बिरात,
पेट के दर्द के मारे,
उफ़्फ़ जान न निकल जाये।
कि इससे पहले,
समय पर पहुचना हो,
हर बार चिल्ला नहीं सकते,
कभी हड़बड़ी में ,
तो ,
तो क्या ?
इसलिए दरवाजा लगाया ही नहीं।

गर्मी की लू में,
सर्दी की सर्द रातो में,
साहेब का घर दरवाजों से पैक,
बिना लीकेज वाला,
डब्बा हो जाता है।
ऐसे में किसी की,
चीख चीत्कार को सुनने का जिम्मा,
दरवाजे वाले नहीं ले पाएंगे ।

ये तो साहेब की मेहरबानी है,
उनने कभी हमें,
घर में दरवाजा लगाने के लिए नहीं टोका,
तो , 
तो क्या ?
इसीलिये दरवाजा लगाया ही नहीं ।

हमारे घर भला कौन-सा,
खजाना धरा रहता हैं।
आता नहीं कि,
लेनदारों का ताँता लग रहता हैं।
लठ्ठबाजों की ठक-ठक से,
जान ऊब जाती है ।
नाम भर को,
दीवारों के बिच का हिस्सा
पिछले साल, जो गिर गया था ।
उसी में से हमारी लक्ष्मी आती है और जाती है ।