ज्यादा कुछ नहीं, बस भूलभुलैया वाले बगीचे का नक्शा है। कुछ मुरझाए हुए फूल है जिनकी गंध अभी बाकि है । अधसड़े फल है जिनको किनारे से बचा के खाया जा सकता है और भँवरे-तितलियों की गैर मौजूदगी के कारण माली झींगुरों की सभ्यता को सहेजने के लिए .........
गुरुवार, 30 मार्च 2017
मित्र को पत्र
सोमवार, 27 मार्च 2017
१) मैं उन क्षणों को याद करके आनन्द का अनुभव करता हूँ , जबकि शरीर की इंद्रिया सो रही होती है । बिना इच्छा के एक क्षण भी बहुत है । संपूर्ण ब्रह्माण्ड शांत है लेकिन एक हमारा मन नहीं है । क्या थोड़ी-सी शांति मन को नही मिल सकती है ? ॐ शांति! शांति! शांति!
२) आप एक ही समय में दो चीज़ के बारे में नहीं सोच सकते हैं । यदि आप ऐसा कर भी लेते हैं तो प्रत्येक की ओर आपकी चिंतन क्षमता बँट जायेगी, इसलिए एक समय में एक के बारे में सोचिये और किसके बारे में सोचना चाहिए । इसका फैसला इस बात से करिये कि आप के लंबे समय तक सोचने लायक बने रहने के लिए क्या ज्यादा जरुरी है ?
३) गलती कर देने के बाद क्षमा माँगना बहुत बेहतर उपाय नहीं है । ये एक सकारात्मक कदम कहा जा सकता है; दोनों के लिए माफ़ी माँगने वाले के लिए भी और माफ़ करने वाले के लिए भी । लेकिन इस कदम को कतई गलती न करने के कदम से श्रेयस्कर नहीं माना जा सकता हैं ।
४) ये तो जरुरी है ही कि हम क्या देखते हैं लेकिन उससे ज्यादा जरुरी देखने का नजरिया है । जो विभाजन भारत से एक हिस्से का अलग होना था, वो साथ ही एक स्वतंत्र राष्ट्र का बनना भी था ।
५) लालची, कमीना, असंवेदनशील और बुद्धिमान बच्चा पैदा करना आसान है लेकिन कृतज्ञ, सीधा, ईमानदार और मंद बुद्धि बच्चा पैदा करना कठिन है । जबकि लोग उल्टा समझते हैं ।
६) मैं किसी व्यक्ति पर तब तक भरोसा नहीं कर सकता जब तक कि मैं उसके मन के भीतर चलने वाले वाद-प्रतिवाद को नहीं जान लेता ।
शुक्रवार, 17 मार्च 2017
आखिरी कड़ी आखिरकार मिल गई
"भारतीय राष्ट्रीय, वृहद् सामाजिक-आर्थिक योजनाओं को जमीन पर साकार करने जब हम जाते हैं तो विशाल जनसंख्या सबसे पहले हमारे मनोबल को झकझोरती है । इसके बाद जो कुछ बचा मनोबल है उसे आधी आबादी अर्थात स्त्रियों की दशा देखकर गहरी चोट लगती है । इसके आगे, शिक्षा की बाधा आती है । शिक्षा के मुद्दे पर प्राथमिक स्कूलों की जर्जर दशा नजर आती है । प्राथमिक विद्यालयों में निम्न नामांकन अनुपात की समस्या है । नामाकंन अनुपात में निम्नता का कारण बाल-श्रम है । बाल-श्रम का कारण गरीबी है । और गरीबी का कारण पारिवारिक विसंगति है क्योंकि ...नैसर्गिक रूप में जन्तुओं में मादाओं के साथ ही नवजात देखे जाते हैं। यह स्वतः ही होता है कि नवजात के जन्म के पश्चात उनके भरण पोषण की जिम्मेदारी मादा के हाथों में होती है । फिर यह नैसर्गिक व्यवस्था मनुष्य के हाथों में पकड़कर बलपूर्वक बदली गई और समाज पितृसत्तात्मक हो गया । समस्या की आखिरी कड़ी यही है । इसके बाद कुछ कहने को ज्यादा बचता नहीं है । "
गुरुवार, 19 जनवरी 2017
ठक - ठक
दरवाजा दिखता नहीं,
या दरवाजा होता नहीं ,
या दरवाजा वो लगाता नही ।
दरवाजा फिजूल का खर्च,
भी लग सकता है उसे,
हो सकता है ,
हमेशा दरवाजा खुला रखने,
की पाबन्दी हो ,
साहेब का हुक्म हो ,
सो बेगार करने वाला ,
साहेब की मर्जी से आता है।
जाता है ।
दरवाजा लगाना उसे
संस्कार के खिलाफ लगा ,
इसलिए उसने दरवाजा लगाया ही नहीं ।
खट-खटाते ,
बेचैनी होती ,
चिल्लाते, गालियां बकते ,
गुस्सा हो जाते ।
धमकियाँ देते ।
धमकियाँ दरवाजा तोड़ देंने की ,
डर के मारे ,
हिम्मत न कर पाता ,
दरवाजे की आड़ में ,
धमकियाँ न सुन पाता।
तो ,
तो क्या ?
दरवाजा टूट जाता ,
इसलिए दरवाजा लगाया ही नहीं ।
खाना खाना हो ।
कभी रात बिरात,
पेट के दर्द के मारे,
उफ़्फ़ जान न निकल जाये।
कि इससे पहले,
समय पर पहुचना हो,
हर बार चिल्ला नहीं सकते,
कभी हड़बड़ी में ,
तो ,
तो क्या ?
इसलिए दरवाजा लगाया ही नहीं।
सर्दी की सर्द रातो में,
साहेब का घर दरवाजों से पैक,
बिना लीकेज वाला,
डब्बा हो जाता है।
ऐसे में किसी की,
चीख चीत्कार को सुनने का जिम्मा,
दरवाजे वाले नहीं ले पाएंगे ।
ये तो साहेब की मेहरबानी है,
उनने कभी हमें,
घर में दरवाजा लगाने के लिए नहीं टोका,
तो ,
इसीलिये दरवाजा लगाया ही नहीं ।
खजाना धरा रहता हैं।
आता नहीं कि,
लेनदारों का ताँता लग रहता हैं।
लठ्ठबाजों की ठक-ठक से,
जान ऊब जाती है ।
नाम भर को,
दीवारों के बिच का हिस्सा
पिछले साल, जो गिर गया था ।
उसी में से हमारी लक्ष्मी आती है और जाती है ।
