गुरुवार, 17 नवंबर 2016

मेरे आसपास

शहरों के बसने की,
एक शर्त क्या हैं ?
यही तो है न,
कि घर के घर टूटते जाये ।
क्योंकि,
आधुनिकीकरण का प्रसिद्ध मुहावरा है ।
नौकरी करें, कमाए और खाय ।
ऐसे में
घरों के आकार घट रहे हैं ।
कुछ ही एक दम बहुत बड़े बचे हैं ।
अन्यथा,
डिब्बे के डिब्बे ताजा इंसान सड़ रहे हैं।
तो,
आज घर क्या हैं मात्र ?
एक या दो कमाने वाले हैं,
एक पकाने वाला है ।
चार खाने वाले जहाँ हैं ।

और घरों में बाहर से आयात,
हो रही है सेंसर्ड आवाजें ।
टी.वी है, मोबाईल है ।

लेकिन जब सब बंद है रात में।
तब सुनों,
सड़क में रगड़ खाते ट्रक के पहियों की आवाज ।
पटरी पर दौड़ती रेल गाड़ी का मद्धिम शोर,
घर के शांत कोनों में,
चूहों और छिपकलियों की खिट-पिट।

या एकदम भोर में सुने,
कपड़ों में इस्त्री करते हुए,
हाथों की चूड़ियों की खनखनाहट।
पानी में भीगे,
पानी के लिए हड़बड़ाए पैरों से आती
चप्पलों की चूँ- चूँ की आवाज।
खाली बाल्टियों की पहली गपशप ।
भरी बाल्टियों से पानी का छलकना,
न्यूज़पेपर का गिरना ।

बाहर तो बमुश्किल कभी-कभी,
यहाँ तो घर में भी,
धीमी धुनें कम ही सुनाई देती है ।
या तो रात में,
या एक दम भोर में,
या जब दमित मन चिल्ला रहा हो ।
पूरे जोर में ।

सोमवार, 14 नवंबर 2016

पूछोगे नहीं किसका ?

सुख में कैसे आनन्द हो सकता है ?
मुझे समझाओं,

खीर खाने तक,
मुँह मीठा रहता हैं ।
खिलौने के लिए बच्चा रोता हैं ।
दूसरे पल ही तोड़कर,
हँसता है ।
शाश्वत मिलन में ,
किसी सम्बन्ध की निष्ठा की
कैसी परीक्षा हो सकती है ?
ये मन तो,
वियोग की कामना में रमता हैं ।

रुक-रुक कर सीने में,
वेदना उठती है ।
मन घुटने टेककर निहत्था होता है जब,
तब शूलों से खरोंच के,
स्याही लाता हूँ ।
और मिलन की कटु यादों,
को लिखता जाता हूँ ।
मुझे समझाओं,
सुख में कैसे आनन्द हो सकता है ?
जो मिलता है,
वो खोता है ।
हंसने वाला,
रोता हैं ,
देख-देख कर मन के भीतर जो होता हैं ।

जब-जब जोर-जोर से,
हंसने वाला रोता है ।
नियति के चक्कर में पड़कर ।
मन को घायल करने को,
आमादा पागल,
चाले रच-रच चलता हैं ।
रोज बिछुड़ता है मिलने को,
मिलता है बिछुड़ने को, 
कुछ भी कह लो,  
दिल तो टूट ही गया ।

पूँछोगे नहीं किसका ?
पागल की प्रेमिका का ।

शनिवार, 12 नवंबर 2016

सच की समझ

सच जानने के लिए ,
दुःख , पीड़ा और त्याग,
मिलके आग से देखो,
सब है राख ।

रेत में अंगुलियां फेरते थे ।
जो कभी गीली मिट्टी को ,
अँगुलियों का स्पर्श हो गया ।
क्या बन गया ?
ये क्या बना दिया ?
जैसा न पहले कभी किसी ने देखा था ।
केवल कुछ की सोच में आया होगा ।
इसी के जैसा कुछ मिलता जुलता ,
मगर ये नहीं ।

व्यवस्था में मत ढलो ।
लड़ो, भोगों, बदल सको ,
तो बदलों ,
मत भागों ,
जीवन सीमित है ।
मन का है तो भी,
मन का नहीं है तो भी ,
नहीं पता पहले क्या था ।
आगे नहीं पता क्या होगा ?

जब जीवन नहीं होगा ,
मैं नहीं होगा ।
किस-किस के लिए ,
मगर मरने के बाद,
खुद के लिए खुद का ,
क्या होता है ?
मरने के बाद क्या कभी ,
किसी ने देखा ,
मरने वाला रोता है ?

जेब भरती है ,
जेब से पेट भरता ,
फिर बुद्धि मोटी होती है ।
आकांक्षाएँ दुहराने लगती है ।
लोग अपना बोया काटने से डरने लगते है ।
नैसर्गिक मौत के आने से पहले ,
लाइन लगा के पैसे देकर ,
मरने लगते है ।

एक नहीं, दो

मैं जीतते जी दो हो गया,
उसकी क्या हस्ती ?
जो खुद में बँट गया ।

एक तुम्हारा एक तुम्हारे लिए ,
एक डरपोक एक साहसी,
एक उच्छङ्खल एक शांत,
एक मैं और दूसरा भी मैं ही ।

फ़र्क़ इतना किसने बोया ?
इस तरह कपडे को किसने धोया ?
और फाड़ दिया ,
एक मुँह उठाता ,
एक को जीते जी गाड़ दिया ।
तुम्हारे लिए ,