शहरों के बसने की,
एक शर्त क्या हैं ?
यही तो है न,
कि घर के घर टूटते जाये ।
क्योंकि,
आधुनिकीकरण का प्रसिद्ध मुहावरा है ।
नौकरी करें, कमाए और खाय ।
ऐसे में
घरों के आकार घट रहे हैं ।
कुछ ही एक दम बहुत बड़े बचे हैं ।
अन्यथा,
डिब्बे के डिब्बे ताजा इंसान सड़ रहे हैं।
तो,
आज घर क्या हैं मात्र ?
एक या दो कमाने वाले हैं,
एक पकाने वाला है ।
चार खाने वाले जहाँ हैं ।
और घरों में बाहर से आयात,
हो रही है सेंसर्ड आवाजें ।
टी.वी है, मोबाईल है ।
लेकिन जब सब बंद है रात में।
तब सुनों,
सड़क में रगड़ खाते ट्रक के पहियों की आवाज ।
पटरी पर दौड़ती रेल गाड़ी का मद्धिम शोर,
घर के शांत कोनों में,
चूहों और छिपकलियों की खिट-पिट।
या एकदम भोर में सुने,
कपड़ों में इस्त्री करते हुए,
हाथों की चूड़ियों की खनखनाहट।
पानी में भीगे,
पानी के लिए हड़बड़ाए पैरों से आती
चप्पलों की चूँ- चूँ की आवाज।
खाली बाल्टियों की पहली गपशप ।
भरी बाल्टियों से पानी का छलकना,
न्यूज़पेपर का गिरना ।
बाहर तो बमुश्किल कभी-कभी,
यहाँ तो घर में भी,
धीमी धुनें कम ही सुनाई देती है ।
या तो रात में,
या एक दम भोर में,
या जब दमित मन चिल्ला रहा हो ।
पूरे जोर में ।