मंगलवार, 7 अप्रैल 2015

ये पश्चिमी विक्षोभ है ।

       15 दिसंबर से 15 मार्च के बीच भारतीय उपमहाद्वीप में भूमध्य सागर, काला सागर और कैस्पिएन सागर से चलने वाली आद्र पछुआ पवनों के कारण वर्षा होती है। इस बेसमय वर्षा से मध्य प्रान्त और उसके आस पास के क्षेत्रों में फसल को  नुकसान पहुँचा है । सो किसानो की हालात दयनीय बनी हुई है ।
        ध्यान देने योग्य बात ये है कि भूमध्य सागर भारत के पश्चिम में है इसके अतिरिक्त पश्चिम में और भी कुछ है। हाँ ! इंग्लिश चैनल उसके बाद बे ऑफ़ बिसके से होते हुए गिब्राल्टर जल संधि से भूमध्य सागर । भूमध्य सागर को लाल सागर से जोड़ दिया स्वेज नहर ने और इसके बाद बाबेल मंडेब जल संधि पार कर के पहुँच गए अरब सागर में । वही अरब सागर जिसकी तट सीमा भारत के पश्चिमी राज्य गुजरात से टकराती है । गुजरात में है सूरत । सूरत में पश्चिम से आये अंग्रेजो ने खोली व्यापारिक कोठी और उसके बाद क्या हुआ आपको पता ही है ?
        सूर्य पूर्व से उगता है, पश्चिम से नहीं और वर्तमान समय सौर्य ऊर्जा का समय है । भारत की विदेश नीति और ऊर्जा नीति क्रमशः पूर्व की ओर देखो और पूर्व से उगने वाले सूर्य की ओर देखो को उल्लेखित करती है ।
        हमे पश्चिम से घृणा नहीं है पर जिन्होंने सोमनाथ का मंदिर तोड़ा था पश्चिम से आये थे। पाकिस्तान भारत के पश्चिम में है। इटली भी पश्चिम में है और इटली से नेपोलियन आते आते रह गया मगर ....। वैसे तो पृथ्वी गोल है अर्थात जो पश्चिम में है वो पूर्व में भी है ।
        पश्चिमीकरण के सामने हमारी प्राचीन सभ्यता और संस्कृति पिछड़ती जा रही है। हम रंग रूप में तो भारतीय परंतु आचार, विचार और व्यवहार में पक्के अंग्रेज है । स्वच्छ और सुगंध भारत की चाहत ने गंदे, गरीब और दुर्गन्ध पूर्ण भारत से दूरी बनानी शुरू कर दी है । अब सहन नहीं होता । कुछ भी हो जाये अब इसके बगल में नहीं बैठ सकता, इसके हाथ का पानी नहीं पी सकता, ये तो यहाँ भी आ गए, इनके कारण ही आज इंडिया इतना पीछे है । ये वाक्यांश प्रायः सुने जा सकते है ।
        पर सौ बात की एक बात भारत ने 200 वर्षो का पराधीनता का समय झेला है और उसके बाद अगर केवल 68 वर्षो में हमे जो मिला और हमारे दूसरे भाइयों को नहीं मिला तो ये मात्र तुक्का है और तुक्के पर अभिमान नहीं करना चाहिए ।
        सो अन्तर का जब वाजिब कारण है तो अगली बार से अकारण सीट से नहीं उठना, इससे किसी को बुरा लग सकता है ?
    
       

सोमवार, 6 अप्रैल 2015

कोयले पर आधारित ताप बिजली घर परर्यावरण को दुष्प्रभावित करते है ।  सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट के द्वारा किये गए अध्ययन से भारत के विभिन्न ताप बिजली घरों में विभिन्न कमियाँ पाई गई है । 
     स्वस्थ्य, शिक्षा, पेय जल, सड़क के सामान ही ऊर्जा भी जनता की बुनियादी आवश्यकता है । जिसमे से विद्युत ऊर्जा, ऊर्जा का एक प्रमुख प्रकार है । विद्युत ऊर्जा के उत्पादन के कई माध्यमों जैसे कोयला आधारित ताप बिजली घर, जल विद्युत परियोजना, अनविनिकृत ऊर्जा स्त्रोतों इत्यादि में से कोयला आधारित ताप बिजली संयंत्र सर्वाधिक अनुपात में भारत की विद्युत ऊर्जा आवश्यकता की आपूर्ति करता है ।
      भारत में कोयले के विशाल भंडार, अन्य ऊर्जा स्त्रोतों की तुलना में आसान तकनीक, सस्ती ऊर्जा दर और तुलनात्मक रूप से कम लागत और कम निर्माण के समय के कारण कोयला आधारित ताप विद्युत परियोजना भारी संख्या में शुरू की गई ।
       कोयला आधारित ताप विद्युत परियोजना के केवल लाभ ही नहीं है अपितु हानि भी है। ऊर्जा संयंत्र से भारी मात्रा में कोयले के दहन के कारण दहन पश्चात उत्पाद के रूप में विषैली गैस, अध जले ईंधन के सूक्ष्म कण, प्रदूषित जल और राख का ढेर निकलता है ।
        ये सभी पर्यावरण के विभिन्न घटको के प्रदूषण का कारण है । विषैली गैसे जैसे कार्बन डाइ ऑक्साइड, सल्फर के ऑक्साइड, नाइट्रोजन के ऑक्साइड और कार्बन मोनो ऑक्साइड, अध जले ईंधन के सूक्ष्म कण इत्यादि वायु प्रदूषण करते है जबकि सल्फर के ऑक्साइड और नाइट्रोजन के ऑक्साइड के कारण अम्लीय वर्षा होती है जो स्थल और जल के प्रदूषण का कारण है । प्रदूषित जल और निष्काषित राख से स्थल, जल और वायु तीनो ही प्रभावित होती है ।
         सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट के द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट में भारत के कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्र की कमियों को उजागर किया गया है । जिसमें कम प्लांट लोड फैक्टर, अधिक कार्बन डाइ ऑक्साइड की वातावरण में निष्काषित मात्रा, अधिक सल्फर के ऑक्साइड का निष्कासन,  अत्यधिक स्वच्छ जल का उपयोग और अत्यधिक दूषित जल का निष्कासन और अत्यधिक दहन पश्चात उत्पन्न राख की मात्रा प्रमुख कमियाँ है ।