मंगलवार, 19 जून 2012

ये सिर्फ दिन का सपना था ।



देश और देश की रक्षा कितनी आवश्यक है। देश के दुर्गम क्षेत्रो में कुछ सैनिक की उपस्थिति भी दुश्मनों को देश की सीमा का अनुमान लगाने के लिए पर्याप्त होती है। यह देश हमारा है इस हेतु से किसी भी अप्रत्याशित घटना के घट जाने पर भी नुकसान हमारा ही होगा यह पूर्ण सत्य है ।

एक पंख वाले बेलनाकार विमान ,
कुछ एक उतरने वाले थे जमीन पर ,
और अनगिनत थी उनकी संख्या ,
जो आकाश को ढक रहे थे
उनमे से एक उतर गया ।
कई और उतरने वाले ही थे
तीन सैनिक एक कतार में  , एक विमान में
बड़ी संख्या में कही और से भी
सैनिक दौड़ कर  आ रहे थे
वहा कुछ उत्सव सा नहीं था
फिर भी भीड़ थी ।
पास ही घर थे ।
सब दौड़ कर  घर  के अंदर चले गए
घर में खिड़कियाँ बहुत सारी थी
छिपना मुश्किल था
गोलिया चलना शुरू हो गई
बम  फेंके जा रहे थे
निर्विरोध ये कैसा युद्ध होने लगा
उन्हें कोई रोक क्यों नहीं रहा ?
मेरे देश की सीमाएँ निर्धारित नहीं क्या ?
सीमओं पर सैनिक नहीं क्या ?
हम कौन है ?
हमारा देश नहीं क्या ?
हमे हमारे घरों में घुसकर मार रहे थे
मैं रसोईघर में जाकर ,
दीवारों के सहारे छीप गया
वो  हमे ढूढ़ - ढूढ़ कर मरने आये थे
मुझे भी ढूढ़ लिया
और गोल दाग दिया मेरे ऊपर ,
मै आपनी मृत्यु स्वीकार चुका था
तभी गोले की गर्मी का स्पर्श किया  ।
शरीर चादर से ढँका हुआ था
कमरे का पंखा भी बंद था
मेरी नींद गर्मी के कारण खुल गई ।
ये सिर्फ दिन का सपना था
मुझे लगता है
इसके बारे में सबको जानना चाहिए



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