शनिवार, 16 मार्च 2019

अ नैरो बैंड

अ नैरो बैंड क्या है ? 
अ नैरो बैंड या एक पतली पट्टी । यह संकरी गली के जैसे है । यह समाज में मेन स्ट्रीम के मेन स्पेस को दर्शाती है । यह समाज में सुंदरता, शिक्षा, व्यवसाय, जीवनस्तर, भाषा, पहनावे, खान-पान आदि के मामले में सीमित होती स्वीकार्यता को दर्शाती है ।

अ नैरो बैंड किस प्रकार विभिन्न मामलों में घटती स्वीकार्यता को दर्शाती है ? 
यह सुंदरता के मामले में गोर रंग को प्राथमिकता देती है । व्यवसाय के लिए समाज के अनुसार कुछ कामों को अन्य से बेहतर और उच्च श्रेणी का मानती है। शरीर के लिए स्वस्थ होने के बजाय सुगठित होने पर ज्यादा ध्यान है । भाषा के लिए लोकल लैंग्वेज को अंग्रेजी ने हटा दिया है । और तो और हर किसी के लिए ये पैमाने उनकी मर्जी के बगैर सेट किये गए है । यह पैमाने इतने रिजिड है कि अधिकांश लोग इनको पूरा करने से चूक जाते हैं और वो खुद ब खुद इस संकरी पट्टी से बाहर हो जाते हैं । 

यह बैंड नैरो क्यों है ? 
इसके कई कारण हो सकते हैं । एक जवाब तो यह है कि हर चीज का एक ट्रेंड होता है । पश्चिमीकरण को इसके लिए दोष दिया जा सकता है । पश्चिमीकरण जो वैश्वीकरण के कारण बढ़ रही है । लेकिन पश्चिमीकरण के पहले से यह पट्टी संकरी होती गयी है । प्राचीन भारतीय समाज के उस कालखंड का इसमें योगदान कितना है? जबकि अधिकार जन्म आधारित हो गये थे । शिक्षा का अधिकार जाति और लिंग तक सीमित हो गया था । मनुष्य केवल गौर वर्ण वाले माने जाने लगे थे।पट्टी तो शुरुआत से ही संकरी होती गयी है

इसके आर्थिक व राजनीतिक निहितार्थ भी है । कुछ विशेष ट्रेंड्स को महत्व में रखने से व्यापार के लिए उत्पादन का प्रकार सुनिश्चित हो जाता है । जबकि उत्पाद एक प्रकार का होगा तो यह बड़ी मात्रा में उत्पादित किया जा सकेगा ।

राजनीतिक मसलों पर गोल बंदी आसान हो जाती है जबकि विविधता घटती है । सभी के अलग-अलग मांगों के स्थान पर एक कॉमन मिनिमम कार्यक्रम चलाने से बात बन जाती है । इससे लोगों को सप्रेस करके रखना भी आसान होता है वे स्वयं ही कुंठा से ग्रस्त होकर जीते है और जो कुछ मिलता है उससे संतुष्ट होने लगते हैं । 

समाज मे विविध मसलों पर स्वीकार्यता के घटने के क्या मायने है? 
जब आप जैसे है वैसे होने में आपको निम्न महसूस होने के लिए मजबूर किया जाए तो इसके मायने खोजने पड़ेंगे । शरीर का रंग, जाति और धर्म पर किसी का वश नहीं है । इसके साथ ही जब समाज सुंदरता, शिक्षा, भाषा और पहनावे की कसौटी गढ़ता है तो यह स्वीकार्यता की पट्टी और पतली हो जाती है । ठीक प्रकार से अस्मिता और गर्व से जीने का अधिकार सभी के लिए उपलब्ध न हो पाने की दशा है । 

स्वीकार्यता की यह पतली पट्टी कैसे समाज को दर्शाती है? 
यह कमजोर होते समाज की पहचान है । जिसमें बराबरी के हक की बात पीछे छूट गयी है । इसमें निश्चित पैमाने है । और यह पैमाने अत्यंत कठोर है । शायद ही कोई व्यक्ति सभी पैमानो पर खरा उतर पाए । और वह अपने नैसर्गिक अधिकारों को तक ठीक से अर्जित कर सके ।

अ नैरो बैंड में कमी क्या है  ? 
इसकी सबसे बड़ी कमी यह है कि यह लोकतांत्रिक नहीं है । किसी वृहत्तर समाज की बड़ी आबादी इसका आचरण करती है लेकिन यह उनकी रजामंदी को दर्शाता नहीं है । इसमें से कई के खिलाफ विरोध होते आये है । घटती स्वीकार्यता ने कमजोर को और कमजोर किया है और शक्तिशाली को और शक्ति सम्पन्न । शक्तिशाली वह है जो इस बैंड की स्वीकार्यता के पैमाने को निर्धारित करता है । एक अपेक्षाकृत छोटी जनसंख्या विभिन्न तरीकों से बड़ी संख्या में लोगों को संकरी पट्टी से बाहर करने में लगी है ।

यह स्वीकार्यता की घटनी सहमति अफोर्डेबल भी नहीं है । यह बाजारीकरण को बढ़ावा देती है जिसमें समाज बिखरने लगता है । परिवार एक संस्था के रूप में टूट जाता है क्योंकि एक परिवार के भीतर ही कुछ लोग नैरो बैंड के अंदर होते है जबकि कुछ बाहर ।

यह दिखावा आधारित व्यवस्था है । यह अस्थायी भी है । जो इसके भीतर है वे लगातार इसमें बने रहने के लिए जरूरत से ज्यादा संसाधन का उपभोग करते है । और जो नैरो बैंड के बाहर है उनके लिए उपयोग योग्य संसाधनों की कमी को बढ़ाते है ।

यह कई सामाजिक समस्याओं की जड़ है ।

"अ नैरो बैंड" रूपी समस्या का समाधान क्या है ? 
सबसे पहले तो हमें यह जानना है कि यह एक समस्या है । तभी इसके समाधान के लिए कदम उठा पाएंगे । इसके समाधान के लिए जागरूकता बेहद जरूरी है । सब को यह समझना होगा कि स्वीकार्यता की पट्टी अत्यंत संकरी है इसलिए इस आधार पर किसी की आलोचना या किनारे न किया जाए ।

इस सँकरी पट्टी के सभी पैमानों को पूरा कर पाना आर्थिक और राजीनीतिक मामलों से जुड़ा हुआ है । यह किसी एक वश के बाहर है । इसलिए व्यक्तिगत दोष और कुंठा से बाहर निकलना है ।

हर कोई अ नैरो बैंड के भीतर आना चाहता है लेकिन संघर्ष इतना अधिक है और संसाधन इतने कम की स्वीकार्यता की पट्टी दोहरी तरीके से सँकरी हो जाती है । पहला तो इसमें स्वीकार्यता के पैमाने अत्यंत कठोर है और दूसरा इसके भीतर आने वाले लोगों की संख्या इससे बाहर हो रहे लोगों से कम है । इसप्रकार इसका समाधान इस बात में भी छिपा है चूँकि समाज का बड़ा हिस्सा इससे बाहर है तो वह परस्पर समस्याओं को हल कर सकता है । 


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