रविवार, 15 मई 2016

मिसमैनेजड वीमेन एम्पावरमेंट :अ अपकमिंग थ्रेट

" एक समय था जब भारत में जैविक रूप से पुरुष के रूप मे जन्मना मजे की बात होती थी और त्राश का कारण भी । लेकिन अधिकांश पुरुष आबादी ने तो मजे ही किए थे । अब भी यही हाल है "

    (पिछले दो दशक से भारतीय समाज मे लिंगानुपात में काफी सुधार आया है। जनसांख्यिकीय ढाँचे में भी बदलाव आया है। मानव विकास सूचकांक में भी भारत साल दर साल कुछ पायदान ऊपर चढ़ रहा है। मातृ मृत्युदर और फलतः शिशु मृत्युदर को कम करने के लिए हम कटिबद्ध है। केंद्रीय सरकारी योजनायें जैसे ' बेटी बचाओ  , बेटी पढ़ाओ  ' , 'जननी सुरक्षा योजना ', ' सबला योजना ' , 'समन्वित बाल विकास योजना'  जारी है। हम पिछले कुछ पंचवर्षीय से डेटा डिफिसीएंट से नियमनिष्ठ डेटा मैनेजमेंट की ओर बढ़ रहे हैं। अब ये बात कहना पुरानी और सुनी सुनाई बात लगने लगी है कि महिलाओं ने किसी विशेष क्षेत्र में सर्वजन अपेक्षित सर्वोच्च सफलता को हासिल कर लिया है।  )
       
     इतने प्रपंच के बाद महिलाओं की स्थिति सुधर रही है। ठीक है ! मान लेते है लेकिन क्या बालिकाओं  के पक्ष में झुकते लिंगानुपात की पूर्व शर्त यह हो गई है कि उनको सफल होना ही है ? 

      मतलब अतीत में कभी भी बच्चों के लिंगनिर्धारण में पुरुषों को वरीयता देने के पीछे इतने अधिक कठिन और उच्च मापदण्ड नहीं रखे गए थे। पुरुषों के सम्बन्ध में तो बस इतना कहा जाता था कि ये कुल दीपक है , परिवार की मर्यादा की गंगा और वंश वृद्धि कि शक्ति का एकमात्र स्त्रोत ये ही है। कभी बच्चों के जन्म में ये पूर्वशर्त नहीं रखी गई कि तुम्हे भी पहाड़ ही तोड़ना है अन्यथा तुम्हारा जन्म निरर्थक माना जायेगा. वो तो अनलिमिटेड वैलिडिटी वाला वीज़ा लेके आये थे। लेकिन 
      आज के सामाजिक परिवर्तन की ये छुपी शर्त सी महसूस हो रही है कि देखो लड़कियों ! तुम्हे जन्म तो लेने दे रहे हैं लेकिन अगर कुछ करके नहीं दिखाया तो जानती हो कितने निर्दयी थे हम ? अपनी सलामती चाहती हो तो कुछ तमाशे और हुनर के कुछ कारनामे दिखाओ। तुम निरपेक्ष नहीं हो ,तुम्हे हमने किसी के नुकसान पर कमाया है। ऐसे में ये कैसा दबाव थोपा रहे  है आप मुझ पर  ? ये दबाव नहीं , तुम्हारे बचे रहने की पूर्वशर्त है, यही हमारी मर्जी है।  

     अभी तो शहर बसना ही शुरू हुआ था कि एक रात एक अंजान आंधी आई और सब सपाट कर गई।  ये हर लड़की के बस में नहीं है कि वो अपने जन्म को सार्थक ही साबित कर के दिखा पाए। इसलिए मानवीय जाति की इस अपरिष्कृत और अनंवेषित शक्ति के प्रति सहज व्यवहार की अपेक्षा है। लड़कियां, लड़को की अस्थाई स्थानापन्न नहीं अपितु उनका एक समरूप और सशक्त विकल्प है।  और मार्क्सवाद और गांधीवाद भी ऐसा ही कुछ मिलाजुला कहते है कि व्यक्ति के निर्माण में उसकी परिस्थितियों की पर्याप्त भूमिका होती है। ऐसे में केवल लिंग के रूप में एक जैविक परिवर्तन मात्र हो जाने से सत्चरित्र का ही निर्माण हो जायेगा भरोसे  लायक बात बहुत लगती नहीं है। लेकिन वैधानिक और प्रशाशनिक रूप से सरकार के काम इस दिशा में शून्य भी नहीं कहे जा सकते। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कई ऐसे निर्णय सुनाए है जिनमें घर में बालिका को बालको सदृश ही मानने की प्रेरणा मिलती है। 
     
    भारत में वैचारिक बदलाव हो रहा है। शैक्षिक और स्वास्थ्य के मामले में चेतना जागृत हो रही परन्तु पता नहीं किन अदृश्य हाथों ने भारत सरकार को सामाजिक क्षेत्र में खर्च करने से पूर्व रोक रखा है।और इनके दुष्परिणाम भुगतने के लिए हमें असहाय छोड़ देते हैं। 
      ऐसा हो सकता है सामाजिक इंजीनियरिंग के इस एक्सपेरिमेंट में सभी के हाथ उम्मीदों के अनुरूप फल हाथ न लगे और कुछ को ये डर भी हो सकता है कि महिलाओं की यह अनियंत्रित और गैरजवाबदेह संख्या समाज के हित में नहीं है। ऐसी स्थिति में सभी करे कराये पर पानी फिर जायेगा, क्योंकि ईमारत बनाने में साल और महीने लग जाते है पर गिराने को एक झटका ही काफी होता है। यही प्रकृति का नियम भी रहा है क्रमिक विकास चुटकी भर समय में न होकर कई वर्षो तक चलने वाली घटना श्रृंखला के बाद ही एक प्रजाति दूसरे का स्थान लेती पाती है।  

     फिर भी क्यों भारत में महिलाओं के शक्ति में इजाफा और इस शक्ति के कुप्रबंधन के दुष्परिणाम देखने को मिल सकते है  ? 

    ऐसा क्या नहीं देखा भारतीय नारियों ने ? जौहर करती रानियाँ , मंदिरों में नाचती देवदासियां, अवैध मानवतस्करी के रूप में बालिकाओं का घृणित कामकाजों में नियोजन और भी बहुत कुछ। इन सब के पीछे कल तक पुरुष के होने का विश्वास था। धीरे-धीरे ये विश्वास शक में बदलता गया क्योंकि एक महिला ही दूसरी की दुश्मन बन बैठी और अब ये विश्वास एक अन्धविश्वास में तब्दील हो जाने की चौखट पर है क्योंकि  निरंतर उत्कृष्ट प्रदर्शन, सामजिक प्रतिष्ठा और वर्चस्व के लोभ में भारतीय नारी किसी भी हद तक जा सकती है, इसमें संदेह नहीं है। इतिहास में उसे इतना पतित कर दिया गया था कि वर्तमान में वैसे जीवन को विकल्प के रूप में चुनने में उसे तनिक भी संकोच नहीं होना चाहिए। 

      

      
     

रविवार, 8 मई 2016

क्योंकि बच्चों ने देखा है माँ किस तरह पिता जी से बात करती है !!!!

किसी भारतीय महानगर के एक प्रगतिशील परिवार के घर के भीतर का हाल लेकर आया हूँ आपके लिए । परिवार में सिर्फ दो और उनके दो है । विपिन , रिंकि से छोटा है । विपिन और रिंकि कि माँ एक वर्किंग वुमन है और पापा घर संभालते है ।  मतलब पापा कुछ नहीं करते है ।  (अब आगे )


बच्चो ने अपनी आंखों से देखा है अपने प्यारे पापा को दिन भर घर का काम करते हुये । झाड़ू, पोंछा करते-करते उनकी तो कमर ही टूट जाती होगी । उसके बाद खाना भी तो बनाना पड़ता है । सुबह जल्दी उठकर दूध लेने जाना होता है और मम्मी के लिए चाय भी बनानी पड़ती है क्योंकि तभी मम्मी कि नींद खुल पाती है । थोड़ी सी भी अगर देर हो गई तो मम्मी तो पापा पर बहुत गुस्सा होती है । इन सबके बाद भी मम्मी तो कितना घूमती है पर पापा दिन भर घर के काम मे लगे रहते हैं । ऐसे में विपिन, हमने जो मदर्स डे के गिफ्ट के लिए पैसे सेव किए है उन पैसों से हम फाथर्स डे पर पापा को गिफ्ट देंगे । मजे की बात ये है कि फथर्स डे ,मदर्स डे के बाद आता है । ( बच्चों  ने  तो मदर्स डे कि हवा ही निकाल दी )

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बहुत पढ़ा भैया और खूब पढ़ा । क्या चातुर औलाद पाई है, तूने माँ । तेरे एहसानों को तुझको ही गिना-गिना के तेरे ही एहसानों में तुझे कैसा बंधा है ? वैसे तो कहने को पक्के दोस्त को थैंक यू नहीं बोलती हमारी ये पीढ़ी और मदर्स डे पर कैसे कृतज्ञता से लहूलुहान हो रही है । 
ये सब कुछ नहीं चोचले है इनके। डर गए है । ये आज कि औरत को कल कि माँ वाली कड़ुवाहट भरी जिंदगी थोपने के प्रपंच रचे जा रहे हैं । देखो आज कि लड़कियों  घर में रहकर चूल्हा चौका करना कितना महानता का काम है। गोल-गोल मकई कि रोटी बनाओगे तो एक दिन साल मे तुम्हारा बेटा तुमको शाबासी देगा ।
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जी जल जाता है, साहब ऐसे कपटी षडयंत्रो से । माँ को माँ बने रहने में  किसका हित है ये सब जानते हैं । उसके ऐसे घूचू बने रहने से खाने, धोने का टेंशन दूर रहता है माथे से । घर का काम करने वाला कोई तो चाहिए होता है न की नहीं । 
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मार्क्स ने सच ही कहा था, पूंजीवादी समाज के पनपने कि एक अनिवार्य शर्त है कि नारी को उसके शोषण का बोध न होने पाये। और भारत जिस पूंजीवादी समाज के रास्ते पर चल रहा है उसमें ऐसा बिलकुल होते दिख रहा है 

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गली के चलताऊ भाषा में  बोलू तो माँ कसम ये पुरुष वादी मानसिकता का खेल है, मायाजाल है और साहब एक और बात है नारीवादी चिल्ला-चिल्ला के कहते हैं  कि स्त्री पैदा नहीं होती बल्कि बनाई जाती है । क्योंकि कि मैं ने आज तक एक दिन ऐसा नहीं सुना जब भारत में ये कहता हो कोई कि " वर्किंग मदर्स डे " मनाएंगे । ऐसा तो हो नहीं सकता न , क्योंकि ऐसे में इन रूढ़िवादियों कि जान चली जाती। मुझे आश्चर्य नहीं है कि बजरंगदल के जोशीले नवजवान मदर्स डे का विरोध क्यो नहीं करते, कारण साफ है ऐसा कर पाने के लिए उनको समझ में भी तो आना चाहिए कि गलत क्या है ? और सही क्या है ? ,वो तो  भेड़ चाल चलने के माहिर है । 
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ऐसे में एक शानदार स्लोगन याद आता है कि स्त्री वो सब करने के लिए नहीं बनी है जो पुरुष करते हैं बल्कि वो तो वो सब भी करने के लिए बनी है जो पुरुष नहीं कर सकते हैं  ।  ऐसा क्या हो गया कि पुरुषों के रिकॉर्ड बनाने  का इंतज़ार करें  , और फिर उन रिकॉर्ड को तोड़ने वाला बने। 
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लेकिन मजे कि बात ये है कि इतने प्रपंचो के बाद भी बदलाव कि लहर तो चल चुकी है। विदेशों में और कुछ भारतीय महानगरों में अब ये चलन बढ़ रहा है जब परिवार में पिता घर संभालते हैं और माता काम पर जाती है। ऐसे परिवारों मे फथर्स  डे ज्यादा दिलचस्पी से मनाया जाता है, न कि मदर्स डे क्योंकि बच्चों ने देखा है माँ किस तरह पिता जी से बात करती है।