शनिवार, 27 जून 2015

"सबसे अच्छा दिन, सबसे भाग्यशाली दिन, सबसे मजेदार दिन वो दिन होता है जिस दिन सभी आपको आपके जन्मदिन की बधाई देते है न की वो दिन जिसकी तारीख आपके जन्म दिनाँक से मेल खाती है । "

क्षणिकाएँ

         (1)
आस पास लोग है ।
और उन्ही में से कुछ की ,
आवाज़ लगातार आती रहती है ।
नए आते है ।
उठती आवाज़ों में ,
अपनी भी आवाज़ घोलते है ।
कुछ जाते है ।
खालीपन छोड़ जाते है ।
सिर्फ उनके लिए जिन्होंने ,
उनको आते और जाते देखा था ।

           (2)
रंग बदलते रहते है ।
सभी हलचल ध्यान नहीं खिंच पाते ।
आँखे खुली हुई है ।
क्या कुछ नया है ?
पुराने में क्या नया है ?
आज किसने क्या पहना है ,
कौन क्या देखता है ?
देखो, वो आ गई ।
कपड़ो का रंग मैच कर रहा है ।
आँखे आँखों में पता नहीं क्या देखती है ?

            (3)
बिलकुल भी समय नहीं है ।
सब कुछ बीतता जा रहा ।
व्यस्तता का अपना आनंद है ।
शांत हो जाने के कितने नुकसान है ।
साँसे रुक जाये,
नहीं ?
तो जिंदगी क्यों रुक जाये ।
एक दिन की सन्डे की छुट्टी के मजे
का आधार 6 दिन की मेहनत में है ।










आर्थिक आरक्षण : एक सोच ऐसी भी

जाति निरपेक्ष आरक्षण व्यवस्था, जो की गरीबी और अमीरी पर आधारित होती है आर्थिक आरक्षण कहलाती है, ऐसे में गरीब ब्राह्मण और क्षत्रिय भी आरक्षन का लाभ ले सकेंगे । 1991 में नरसिम्हा राव की सरकार ने तात्कालिक तौर पर इसका प्रयास किया था परंतु माननीय सुप्रीम कोर्ट के यह पूछने पर की यह आर्थिक आरक्षण किस आधार पर दिया जायेगा सरकार के द्वारा आज तक जवाब नहीं दिया गया । जवाब न दे पाने का कारण ऐसी व्यवस्था को न लाने की मंशा नहीं अपितु ऐसी किसी भी भरोसे मंद व्यवस्था का अभाव है जिसके आधार पर यह निर्धारित किया जा सके कौन गरीब है ?

भारत में 2001 की जनगणना के अनुसार कुल कार्य शील जनसँख्या लगभग 40 करोड़ है । जिसमे से लगभग 3.5  करोड़ लोग टैक्स देते है और इस 3.5 करोड़ में से 89% लोग की आय 5 लाख से कम है । एक और बात कृषि से हुई आय पर टैक्स नहीं लगता है इस बात का लाभ उठा कर हर जमींदार गरीब बनकर आरक्षण लेगा, इसको कैसे रोकियेगा ।

इतना ही नहीं भारतीय समाज में टैक्स चोरी के कारण काला धन की समस्या किसी से छुपी हुई नहीं है ।

हालात इतने ख़राब है की बी.पी. एल. कार्ड सबसे पहले उसका बनता है जिसे उसकी सबसे कम जरुरत है ।

वर्तमान में जाति आधारित व्यवस्था सबसे सही है जब तक उपरोक्त वर्णित समस्याओं का हल नहीं हो जाता । आज भी मलाई दार परत और गैर मलाई दार परत के बीच के विभाजन का भी दुरूपयोग हो रहा है । फर्जी आय प्रमाण पत्र कितनी आसानी से बन जाता है सब जानते है ।

आरक्षण को जाति के आधार पर करने का मूल कारन भारतीय समाज की संरचना है । जिसमे जाति केवल सामाजिक मामला न होकर के सामाजिक आर्थिक मामला है । अर्थात् धन एवं संपत्ति का जमाव उच्च जातियों के पास अधिक है और वही शोषण कर्ता भी है ।

यदि इतने पर भी जिस किसी को लगता हो की उसके " समानता के अधिकार का हनन हुआ है तो मैं रोज सुप्रीम कोर्ट (जोकि दिल्ली में प्रगति मैदान मेट्रो स्टेशन के पास है) के सामने से गुजरता हूँ तो एक दिन रुक के पी. आई. एल. पीड़ित के नाम से डाल देता हूँ ।

या फिर जिस किसी को भी वर्तमान आरक्षण व्यवस्था में लगता है सुधार की जरुरत है वो ज्यादा उचित और दोष रहित व्यवस्था के साथ सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रख सकता है । व्यवस्था निश्चय ही बदल जायेगी ।

आलोचना करना आसान है परंतु सुधार के उपाय बताना उतना ही कठिन । और सबसे आसान उपाय बताये - "अपना सरनेम भूल कर सोचिये सब सही लगेगा ।"

मंगलवार, 2 जून 2015

क्षणिकाएँ

तुम जल सम शीतल होकर,
यूँ ही बहते जाना ।
जमकर जो ठोस हो जाना ,
शीघ्र पिघल भी जाना ।

ऐसे न बन जाना ,
और ऐसे बन जाना ।
देखना सब कुछ कितना आसान है पाना ।
जैसे हो वैसे ही ,
आखिरी तक बचे रह जाना ।

जो उचित ही होगा ,
मिलेगा ही ,
मैं स्वयं ही लाकर खुद को दूंगा ।
अर्जित कर लूंगा ।

स्वभाववश जीने में ,
हँसना कम रोना अधिक होता है ।
संवेदना को सहना ,
हमेशा उतना ही सरल नहीं होता है ।

इच्छा आसानी से मन में उठती है ,
उसे पूरा करने की मगर डगर कठिन होती है ।