"सबसे अच्छा दिन, सबसे भाग्यशाली दिन, सबसे मजेदार दिन वो दिन होता है जिस दिन सभी आपको आपके जन्मदिन की बधाई देते है न की वो दिन जिसकी तारीख आपके जन्म दिनाँक से मेल खाती है । "
ज्यादा कुछ नहीं, बस भूलभुलैया वाले बगीचे का नक्शा है। कुछ मुरझाए हुए फूल है जिनकी गंध अभी बाकि है । अधसड़े फल है जिनको किनारे से बचा के खाया जा सकता है और भँवरे-तितलियों की गैर मौजूदगी के कारण माली झींगुरों की सभ्यता को सहेजने के लिए .........
शनिवार, 27 जून 2015
क्षणिकाएँ
(1)
आस पास लोग है ।
और उन्ही में से कुछ की ,
आवाज़ लगातार आती रहती है ।
नए आते है ।
उठती आवाज़ों में ,
अपनी भी आवाज़ घोलते है ।
कुछ जाते है ।
खालीपन छोड़ जाते है ।
सिर्फ उनके लिए जिन्होंने ,
उनको आते और जाते देखा था ।
(2)
रंग बदलते रहते है ।
सभी हलचल ध्यान नहीं खिंच पाते ।
आँखे खुली हुई है ।
क्या कुछ नया है ?
पुराने में क्या नया है ?
आज किसने क्या पहना है ,
कौन क्या देखता है ?
देखो, वो आ गई ।
कपड़ो का रंग मैच कर रहा है ।
आँखे आँखों में पता नहीं क्या देखती है ?
(3)
बिलकुल भी समय नहीं है ।
सब कुछ बीतता जा रहा ।
व्यस्तता का अपना आनंद है ।
शांत हो जाने के कितने नुकसान है ।
साँसे रुक जाये,
नहीं ?
तो जिंदगी क्यों रुक जाये ।
एक दिन की सन्डे की छुट्टी के मजे
का आधार 6 दिन की मेहनत में है ।
आर्थिक आरक्षण : एक सोच ऐसी भी
मंगलवार, 2 जून 2015
क्षणिकाएँ
तुम जल सम शीतल होकर,
यूँ ही बहते जाना ।
जमकर जो ठोस हो जाना ,
शीघ्र पिघल भी जाना ।
ऐसे न बन जाना ,
और ऐसे बन जाना ।
देखना सब कुछ कितना आसान है पाना ।
जैसे हो वैसे ही ,
आखिरी तक बचे रह जाना ।
जो उचित ही होगा ,
मिलेगा ही ,
मैं स्वयं ही लाकर खुद को दूंगा ।
अर्जित कर लूंगा ।
स्वभाववश जीने में ,
हँसना कम रोना अधिक होता है ।
संवेदना को सहना ,
हमेशा उतना ही सरल नहीं होता है ।
इच्छा आसानी से मन में उठती है ,
उसे पूरा करने की मगर डगर कठिन होती है ।