पहले 'हरे कृष्ण' दो बार पुनः 'कृष्ण' दो बार तदन्तर 'हरे' की दो बार आवृति करे । 'हरे राम' दो बार पुनः 'राम' दो बार तदन्तर 'हरे ' की दो बार आवृति करे । इस प्रकार महामंत्र पूर्ण हुआ ऐसा श्री सनत्कुमार संहिता में कहा गया है ।
हे हरे ! मेरे चित्त को हरकर भवबंधन से मुक्त कर दीजिये ।
हे कृष्ण ! मेरे चंचल चित्त को अपनी ओर आकर्षित कर लीजिये ।
हे हरे ! अपने स्वाभाविक माधुर्य से मेरे चित्त को हर लीजिये ।
हे कृष्ण ! भक्तितत्ववेत्ता अपने भक्त द्वारा अपने भजन का ज्ञान देकर मेरे चित्त को शुद्ध कर दीजिये ।
हे कृष्ण ! अपने नाम-रूप-गुण-लीला आदि में मेरी निष्ठा उत्पन्न कर दीजिये ।
हे कृष्ण ! अपने नाम-रूप-गुण-लीला आदि में मेरी रूचि उत्पन्न कर दीजिये ।
हे हरे ! मुझे अपनी सेवा के योग्य बना दीजिये।
हे हरे ! मुझे अपनी सेवा के योग्य बनाकर अपनी सेवा का आदेश दीजिये ।
हे हरे ! अपने प्रियतम सहित की गई अपनी अभीष्ट लीलाओं का मुझे श्रवण कराइये ।
हे राम ! हे राधिकारमण अपनी प्रियतमा राधिका जी सहित की गई अपनी अभीष्ट लीलाओं का श्रवण कराइये ।
हे हरे ! हे श्रीमति राधिके आप अपने प्रियतम श्री कृष्ण के साथ अपनी अभीष्ट लीलाओं का दर्शन कराइये ।
हे राम ! हे राधिकारमण आप अपनी प्रियतमा सहित अपनी अभीष्ट लीलाओं का दर्शन कराइये ।
हे राम ! आप मुझे कृपया अपने नाम-रूप-गुण-लीला एवं स्मरण आदि में नियुक्त कर लीजिये ।
हे राम ! उस लीला में मुझे अपनी सेवा योग्य बना दीजिये ।
हे हरे ! मुझे अंगीकार कर मेरे साथ रमण कीजिये अर्थात मुझे आनंदित कीजिये ।
हे हरे ! मेरे साथ रमण कीजिये । मेरे साथ विहार कीजिये ।