सोमवार, 31 मार्च 2014

क्षणिकाएँ

दीवारे नहीं रोकती ,
यू ही किसी को कही आने - जाने से |
जब तक कही कोई खुद ही न  जाना चाहे |
वरना दिवारो को पर्दा बनाकर ,
अपनी नाकामी छिपाने में क्या मजा है ?
क्या मजा है ?
जिंदगी को इतना बेरंग करने में ,
कि हर जवाब में नापसंदगी कि बू हो |
क्यों गिराना मन को इतना ,
कि दुसरो का न सही ,
खुद कि  संवेदना का अनुमान गलत हो जाए |
और इतना क्यों कोसना अपने भाग्य को ,
कि आत्मा स्वयं को न क्षमा कर पाए |
ऐसा अक्सर नहीं होता ,
जब सब शुभ हो, फिर भी समय
मन के घाव न भर पाए |

रविवार, 9 मार्च 2014

मेरी डायरी से !!!

१. सत् का कोई पर्याय नहीं है इसलिए ढूढ़ने का प्रयास     नहीं करना चाहिए । दो ही तो मार्ग है या तो रावण       बनो, या विभीषण ।

२. ईश्वर जब अशक्तों कि सुन लेते है तो भक्तों कि तो         जरूर ही सुनेंगे ।

३. मन > शरीर > वस्तु ।

४. अंक एक बार की मेहनत है जबकि ज्ञान सैकड़ो बार     के प्रयास के बाद मिलता है । अंततः ज्ञान ही काम       आता है । 

५. अकेले सूत्र का कोई महत्व नहीं होता लेकिन जैसे        ही उससे संबंधित कोई समस्या सामने आ जाती है        उसके बाद एकाएक सूत्र का महत्व बढ़ जाता है । 


६. ऐसा कार्य अवश्य करना चाहिए जिसमें लाभ हो ।
    ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए जिसमें हानि हो ।
    ऐसा कार्य कभी नहीं करना चाहिए जिसका हानि या     लाभ न ज्ञात हो । क्योंकि ऐसा कार्य करने से प्रायः       बहुत हानि होती है ।