बुधवार, 23 अप्रैल 2025

कारण और परिणाम


हरी घास पर पसरा सन्नाटा,
बहती नदी का पारदर्शी गान।
शांति और आनंद का आभास —
पर तभी जब लौटने को
एक घर हो।

हम घूमते हैं,
छुट्टियाँ मनाते हैं,
क्योंकि नौकरी है,
जिससे हम भागते हैं,
पर वही तो कारण है —
छुट्टी तो बस परिणाम।

हमें पर्वत अच्छे लगते हैं,
बर्फ की चादर पर चलना — रोमांच।
पर रहते कहाँ हैं हम?
मैदानी जीवन की सरलता में।
पर्वत दिखते हैं सुन्दर,
पर जीना वहाँ कठोर है।
मैदान जीने के लिए हैं,
पर्वत—सपनों के लिए।

हम जन्मे नहीं बस
खाली बैठने के लिए,
कुछ तो कारण है,
कुछ तो उद्देश्य।

क्या वो उद्देश्य
किसी क्षेत्र में उत्कृष्टता है?
नाम कमाना? धन अर्जित करना?
या फिर मानवता का हित?
प्रकृति का रक्षण?
पृथ्वी की पुकार सुनना?

अपने लिए जीना — एक विकल्प।
दूसरों के लिए जीना — दूसरा।
दोनों में असर है,
अगर असरदार हुए,
तो ये दुनिया याद रखेगी।

पर लोग सोचते हैं उल्टा,
कहते हैं — "प्रसिद्ध बनो",
मैं कहता हूँ —
"श्रेष्ठ बनो, प्रसिद्धि स्वयं आएगी।"
प्रसिद्धि कारण नहीं,
वो तो एक परिणाम है।

बुधवार, 9 अप्रैल 2025


तरु-शाखा पर बैठ विहगिनी बुनती थी निज स्वप्न-निकेतन,
कण-कण में बसती आशा, श्रम से सजा वह मृदु आलयन।
पर्ण-पुष्प से गूँथ बनाई, जीवन की वह मधुर छवि,
मानव-सा वह चातक भी, निज कुटुम्ब हेतु अनुरक्त सदा रवि।

नभ में विहारिणी, फिर भी बंधी अपने आलय से,
स्वच्छंद थी वह, पर थी सुधि निज नीड़ के प्रालय से।
सोचा — "यह कुटी ही मेरी शांति-शरण बन जायेगी,
जहाँ सहेज रख सकूँ कांति, जहाँ प्रीति मुस्कायेगी।"

परन्तु हाय! विधि का विधान कैसा,
निज श्रम पर व्याधि का आघात कैसा।
दुष्ट ने किया विध्वंस घोंसले का,
अंडों पर पड़ा अनर्थ का झोंका।

विहगिनी थी विकल, अश्रु-प्रवाह में लीन,
सारा सृजन हो गया, पलक झपकते ही क्षीण।
गूँज उठी पीड़ा उसकी इस निरभ्र अम्बर में,
जैसे चेतावनी हो सबको इस अस्थिर संसार में।

नर की कन्या भी कुछ वैसी ही गति पाती,
जब रीति-रिवाज, कुल-धर्म को तज जाती।
जो दिखता है सरल, वह सदा सहज नहीं होता,
जो दिखता है नूतन, उसमें स्थायित्व नहीं होता।

स्वातंत्र्य उत्तम है, पर संयम उसका मूल है,
परंपरा से जुड़ा जीवन ही निष्कलुष फूल है।
जहाँ धर्म, मर्यादा और नीति का हो संग,
वहीं सुरक्षित रहता है नारी का मंगल-अभंग।

अतएव हे सुबुद्ध मानव! यह सीख सदा धारण करना,
सुधि रखो – घोंसला वही सजाना, जो न सिर्फ सुंदर, अपितु हो अडिग, अचल, स्थिर —
धर्म-संरक्षित, प्रेम-संवलित, कुल-परंपरा में गुँथा।