ज्यादा कुछ नहीं, बस भूलभुलैया वाले बगीचे का नक्शा है। कुछ मुरझाए हुए फूल है जिनकी गंध अभी बाकि है । अधसड़े फल है जिनको किनारे से बचा के खाया जा सकता है और भँवरे-तितलियों की गैर मौजूदगी के कारण माली झींगुरों की सभ्यता को सहेजने के लिए .........
बुधवार, 23 अप्रैल 2025
कारण और परिणाम
बुधवार, 9 अप्रैल 2025
तरु-शाखा पर बैठ विहगिनी बुनती थी निज स्वप्न-निकेतन,
कण-कण में बसती आशा, श्रम से सजा वह मृदु आलयन।
पर्ण-पुष्प से गूँथ बनाई, जीवन की वह मधुर छवि,
मानव-सा वह चातक भी, निज कुटुम्ब हेतु अनुरक्त सदा रवि।
नभ में विहारिणी, फिर भी बंधी अपने आलय से,
स्वच्छंद थी वह, पर थी सुधि निज नीड़ के प्रालय से।
सोचा — "यह कुटी ही मेरी शांति-शरण बन जायेगी,
जहाँ सहेज रख सकूँ कांति, जहाँ प्रीति मुस्कायेगी।"
परन्तु हाय! विधि का विधान कैसा,
निज श्रम पर व्याधि का आघात कैसा।
दुष्ट ने किया विध्वंस घोंसले का,
अंडों पर पड़ा अनर्थ का झोंका।
विहगिनी थी विकल, अश्रु-प्रवाह में लीन,
सारा सृजन हो गया, पलक झपकते ही क्षीण।
गूँज उठी पीड़ा उसकी इस निरभ्र अम्बर में,
जैसे चेतावनी हो सबको इस अस्थिर संसार में।
नर की कन्या भी कुछ वैसी ही गति पाती,
जब रीति-रिवाज, कुल-धर्म को तज जाती।
जो दिखता है सरल, वह सदा सहज नहीं होता,
जो दिखता है नूतन, उसमें स्थायित्व नहीं होता।
स्वातंत्र्य उत्तम है, पर संयम उसका मूल है,
परंपरा से जुड़ा जीवन ही निष्कलुष फूल है।
जहाँ धर्म, मर्यादा और नीति का हो संग,
वहीं सुरक्षित रहता है नारी का मंगल-अभंग।
अतएव हे सुबुद्ध मानव! यह सीख सदा धारण करना,
सुधि रखो – घोंसला वही सजाना, जो न सिर्फ सुंदर, अपितु हो अडिग, अचल, स्थिर —
धर्म-संरक्षित, प्रेम-संवलित, कुल-परंपरा में गुँथा।