गुरुवार, 19 जनवरी 2017

ठक - ठक

निर्धन के घर में,
दरवाजा दिखता नहीं,
या दरवाजा होता नहीं ,
या दरवाजा वो लगाता नही ।

दरवाजा फिजूल का खर्च,
भी लग सकता है उसे,
हो सकता है ,
हमेशा दरवाजा खुला रखने,
की पाबन्दी हो ,
साहेब का हुक्म हो ,
सो बेगार करने वाला ,
साहेब की मर्जी से आता है।
जाता है ।
दरवाजा लगाना उसे
संस्कार के खिलाफ लगा ,
इसलिए उसने दरवाजा लगाया ही नहीं ।

सूदखोर के चमचे आकर ,
खट-खटाते ,
बेचैनी होती ,
चिल्लाते, गालियां बकते ,
गुस्सा हो जाते ।
धमकियाँ देते ।
धमकियाँ दरवाजा तोड़ देंने की ,
डर के मारे ,
हिम्मत न कर पाता ,
दरवाजे की आड़ में ,
धमकियाँ न सुन पाता।
तो ,
तो क्या ?
दरवाजा टूट जाता ,
इसलिए दरवाजा लगाया ही नहीं ।

गईया को पानी पीना हो,
खाना खाना हो ।
कभी रात बिरात,
पेट के दर्द के मारे,
उफ़्फ़ जान न निकल जाये।
कि इससे पहले,
समय पर पहुचना हो,
हर बार चिल्ला नहीं सकते,
कभी हड़बड़ी में ,
तो ,
तो क्या ?
इसलिए दरवाजा लगाया ही नहीं।

गर्मी की लू में,
सर्दी की सर्द रातो में,
साहेब का घर दरवाजों से पैक,
बिना लीकेज वाला,
डब्बा हो जाता है।
ऐसे में किसी की,
चीख चीत्कार को सुनने का जिम्मा,
दरवाजे वाले नहीं ले पाएंगे ।

ये तो साहेब की मेहरबानी है,
उनने कभी हमें,
घर में दरवाजा लगाने के लिए नहीं टोका,
तो , 
तो क्या ?
इसीलिये दरवाजा लगाया ही नहीं ।

हमारे घर भला कौन-सा,
खजाना धरा रहता हैं।
आता नहीं कि,
लेनदारों का ताँता लग रहता हैं।
लठ्ठबाजों की ठक-ठक से,
जान ऊब जाती है ।
नाम भर को,
दीवारों के बिच का हिस्सा
पिछले साल, जो गिर गया था ।
उसी में से हमारी लक्ष्मी आती है और जाती है ।