मैं आज भी सुबह उठता हूँ । उसके बाद दन्त मंजन, स्नान के बाद दिन की शुरुआत करता हूँ । धीरे-धीरे ये सब कुछ आदत में शामिल हो गया हैं । यदि दिनचर्या में थोड़ा भी अंतर आता है तो अजीब-सी बेचैनी मन को घेर लेती है । लेकिन ये मेरे या आपके व्यक्तिगत जीवन तक सीमित है, जिसे ठीक किया जा सकता है और हम कर भी लेते हैं पर जब बात हमारे वश के बाहर होने लगे तो उसे ही आज कल लोग जलवायु परिवर्तन कहते हैं।
हम इतनी विशाल पृथ्वी के बहुत-ही छोटे अंश है, लगभग नाममात्र के। यदि हम पृथ्वी को अपने छोटे-छोटे कृत्यों से प्रभावित नहीं कर सकते तो प्रभावित हुये बिना बच भी नहीं सकते हैं उसी प्रकार यदि पृथ्वी के प्राकृतिक कार्यप्रणाली में बदलाव आता है तो हम भी उस बदलाव के शिकार होते हैं । प्रायः हम पृथ्वी के प्रभाव में रहते हैं । पृथ्वी हमारे प्रभाव से कुछ ज्यादा समय तक बची रह सकती है, परंतु हम उससे अलग होकर जीवन की कल्पना नहीं कर सकते । फ़िलहाल ये दो तरफा नहीं बल्कि एक तरफा रिश्ता है ।
मेरे और आपके कितने पास समुद्र है ? क्योंकि समय के साथ ये दूरी घट रही हैं । भारतीय प्रायद्वीप के बीच में रहने वाले कब समुद्री लहरों का दीदार कर पाएंगे ये कहा नहीं जा सकता है। लेकिन ऐसा कुछ होगा इसकी गारंटी तो पक्का है। समुद्र के मैदान से ज्यादा गरम हो जाने के कारण बारिश कम होती है अगर यही हाल रहा तो हमारी जीवन का वो पहलू जिसमें बारिश का रोल होता था बिलकुल फीका ही हो जाएगा। मुझे एक सामान्य जीवन की झलक सभी में दिखती है । बारिश को कोसता हर कोई है, पर प्रेम जितना बारिश में है उतना न तो सर्दी से है और न गर्मी से । मगर लोग कहते हैं अब पहले जैसे बारिश नहीं होती और अब होगी भी नहीं क्योंकि बारिश को बुलाने वाले मेढक, गौराया, कौए और पेड़ नहीं रहे । जहाँ बारिश होती भी है वहाँ पीली बौछारों की खबरें आई है या इतनी बारिश हुयी की लोग चिड़ कर उन इलाकों से पलायन कर रहे है । ये सब मेरे , आप और समुद्र के बीच की बात है । इसे हमें ही सुलझाना होगा ।
सागर की मछलियाँ कूद-कूद कर बाहर आ रही है। कोई तो कारण होगा कि मछलियों को जमीन अब ज्यादा साफ और रहने लायक लग रही है। बहुत ज्यादा लंबी जिंदगी जीने वाले कछुओं ने मछलियों को तड़पते देखा है इसलिए जीवन के प्रति अब वे काफी उदास हो गए हैं और प्रजनन के मौसम में तटों पर आने से बचते हैं या घबराकर बहुत ज़्यादा अंडे दे देते हैं । डॉल्फ़िन और आक्टोपस इंसान के साथ ताल मेल बैठाने में लगे हुये है । इनके अतिरिक्त सागर के सदाबहार जंगल गल रहे हैं । उन पर एसिड अटैक हुआ है । सागर का नमकीन पानी लगातार खट्टा होता जा रहा है । ये खट्टास हमारे और सागर के संबंधों में किसी दूसरे या तीसरे ने नहीं घोली है ।
बर्फ़ीले पहाड़ पिघल रहे हैं । पत्थरों के ढेर ढह रहे हैं । मैदानों में सूखे कि मार से हाल बेहाल हो रखा हैं । नदियाँ रास्ता भटक गई है । पिता पर्वत और पुत्री नदी के संबंधों का यह नया दौर है । मनचली और राह से भटकी नदियाँ जल्दी सूखने भी लगी हैं । नदियाँ उधार के बरसाती पानी से मौसमी उफान तक सीमित हो चली हैं । ये इनके सदाप्रवाही से मौसमी होने और अंततः लुप्त होने कि कहानी है।
गाँव मासूम नहीं रहे । गाँव में ठगने वाली गलियाँ नहीं हुआ करती थी । पहले कोई गाँव में भटका नहीं था । सभी अपने-अपने होते थे लेकिन आज रोजी रोटी के लिए सभी गाँव छोड़ के चले गए और झोपड़ियाँ , खुफिया वीरान इमारतों मे तब्दील हो गई हैं । सड़क के किनारें के आम के बगीचों के गुमनाम मालिक पता नहीं कहाँ से आ गए है ? जिसे न तो हम और पेड़ पहचानते है । इसलिए गाँव अब पिछड़े तो हैं पर मासूम नहीं है।
शहरों का विस्तार हुआ है । ये कुपोषित मोटे वयस्क के समान अपना वजन स्वयं उठा पाने में असमर्थ हो गए है और डैबिटीज़ , कैंसर, एड्स जैसे घातक रोगों से ग्रस्त हो गए है। शहरों में नहाना जरूरी होता है, यहाँ लोग जल्दी गंदे हो जाते हैं । शहरों में नहाने के लिए पानी गाँव कि नदियों, तालाब से जाता है। गाँवों से शहरों में कच्चा माल, मज़दूर, नयापन, भोलापन, संस्कार और मैं या आप जाते हैं। हम शहरों को अपने खून पसीने से सींचते हैं । सिकुड़कर सोते है जबकि गाँव में हमारें खेत के खेत पड़े हैं । जब हम शहरों में रम जाते हैं तो बिजली के कारखाने हमारी खेती कि ज़मीनों पर खड़े हो जाते हैं ।