रविवार, 19 जून 2016

जलवायु परिवर्तन : मेरे और आपके के लिए

मैं आज भी सुबह उठता हूँ । उसके बाद दन्त मंजन, स्नान के बाद दिन की शुरुआत करता हूँ । धीरे-धीरे ये सब कुछ आदत में शामिल हो गया हैं । यदि दिनचर्या में थोड़ा भी अंतर आता है तो अजीब-सी बेचैनी मन को घेर लेती है । लेकिन ये मेरे या आपके व्यक्तिगत जीवन तक सीमित है, जिसे ठीक किया जा सकता है और हम कर भी लेते हैं पर जब बात हमारे वश के बाहर होने लगे तो उसे ही आज कल लोग जलवायु परिवर्तन कहते हैं। 

हम इतनी विशाल पृथ्वी के बहुत-ही छोटे अंश है, लगभग नाममात्र के। यदि हम पृथ्वी को अपने छोटे-छोटे कृत्यों से प्रभावित नहीं कर सकते तो प्रभावित हुये बिना बच भी नहीं सकते हैं उसी प्रकार यदि पृथ्वी के प्राकृतिक कार्यप्रणाली में बदलाव आता है तो हम भी उस बदलाव के शिकार होते हैं । प्रायः हम पृथ्वी के प्रभाव में रहते हैं । पृथ्वी हमारे प्रभाव से कुछ ज्यादा समय तक बची रह सकती है, परंतु हम उससे अलग होकर जीवन की कल्पना नहीं कर सकते । फ़िलहाल ये दो तरफा नहीं बल्कि एक तरफा रिश्ता है । 

मेरे और आपके कितने पास समुद्र है ? क्योंकि समय के साथ ये दूरी घट रही हैं । भारतीय प्रायद्वीप के बीच में रहने वाले कब समुद्री लहरों का दीदार कर पाएंगे ये कहा नहीं जा सकता है। लेकिन ऐसा कुछ होगा इसकी गारंटी तो पक्का है। समुद्र के मैदान से ज्यादा गरम हो जाने के कारण बारिश कम होती है अगर यही हाल रहा तो हमारी जीवन का वो पहलू जिसमें बारिश का रोल होता था बिलकुल फीका ही हो जाएगा। मुझे एक सामान्य जीवन की झलक सभी में दिखती है । बारिश को कोसता हर कोई है, पर प्रेम जितना बारिश में है उतना न तो सर्दी से है और न गर्मी से । मगर लोग कहते हैं अब पहले जैसे बारिश नहीं होती और अब होगी भी नहीं क्योंकि बारिश को बुलाने वाले मेढक, गौराया, कौए और पेड़ नहीं रहे । जहाँ बारिश होती भी है वहाँ पीली बौछारों की खबरें आई है या इतनी बारिश हुयी की लोग चिड़ कर उन इलाकों से पलायन कर रहे है । ये सब मेरे , आप और समुद्र के बीच की बात है । इसे हमें ही सुलझाना होगा । 

सागर की मछलियाँ कूद-कूद कर बाहर आ रही है। कोई तो कारण होगा कि मछलियों को जमीन अब ज्यादा साफ और रहने लायक लग रही है। बहुत ज्यादा लंबी जिंदगी जीने वाले कछुओं ने मछलियों को तड़पते देखा है इसलिए जीवन के प्रति अब वे  काफी उदास हो गए हैं और प्रजनन के मौसम में तटों पर आने से बचते हैं या घबराकर बहुत ज़्यादा अंडे दे देते हैं । डॉल्फ़िन और आक्टोपस इंसान के साथ ताल मेल बैठाने में लगे हुये है । इनके अतिरिक्त सागर के सदाबहार जंगल गल रहे हैं । उन पर एसिड अटैक हुआ है । सागर का नमकीन पानी लगातार खट्टा होता जा रहा है । ये खट्टास हमारे और सागर के संबंधों में किसी दूसरे या तीसरे ने नहीं घोली है । 

बर्फ़ीले पहाड़ पिघल रहे हैं । पत्थरों के ढेर ढह रहे हैं । मैदानों में सूखे कि मार से हाल बेहाल हो रखा हैं । नदियाँ रास्ता भटक गई है । पिता पर्वत और पुत्री नदी के संबंधों का यह नया दौर है । मनचली और राह से भटकी नदियाँ जल्दी सूखने भी लगी हैं । नदियाँ उधार के बरसाती पानी से मौसमी उफान तक सीमित हो चली हैं । ये इनके सदाप्रवाही से मौसमी होने और अंततः लुप्त होने कि कहानी है। 

गाँव मासूम नहीं रहे । गाँव में ठगने वाली गलियाँ नहीं हुआ करती थी । पहले कोई गाँव में भटका नहीं था । सभी अपने-अपने होते थे लेकिन आज रोजी रोटी के लिए सभी गाँव छोड़ के चले गए और झोपड़ियाँ , खुफिया वीरान इमारतों मे तब्दील हो गई हैं । सड़क के किनारें के आम के बगीचों के गुमनाम मालिक पता नहीं कहाँ से आ गए है ? जिसे न तो हम और पेड़ पहचानते है । इसलिए गाँव अब पिछड़े तो हैं पर मासूम नहीं है।

शहरों का विस्तार हुआ है । ये कुपोषित मोटे वयस्क के समान अपना वजन स्वयं उठा पाने में असमर्थ हो गए है और डैबिटीज़ , कैंसर, एड्स जैसे घातक रोगों से ग्रस्त हो गए है। शहरों में नहाना जरूरी होता है, यहाँ लोग जल्दी गंदे हो जाते हैं । शहरों में नहाने के लिए पानी गाँव कि नदियों, तालाब से जाता है। गाँवों से शहरों में कच्चा माल, मज़दूर, नयापन, भोलापन, संस्कार और मैं या आप जाते हैं। हम शहरों को अपने खून पसीने से सींचते हैं । सिकुड़कर सोते है जबकि गाँव में हमारें खेत के खेत पड़े हैं । जब हम शहरों में रम जाते हैं तो बिजली के कारखाने हमारी खेती कि ज़मीनों पर खड़े हो जाते हैं ।

    

शनिवार, 18 जून 2016

गिव एंड टेक : टू सिम्पल टु लर्न

लेन-देन तो लगा ही रहता है । जन्म के समय पैदा करने वाले को दर्द देते हैं । फिर दुनिया में आकर भी लेने-देने में लगे रहते हैं । मनुष्य होने के नाते हम आमतौर पर दर्द, दुख, कष्ट, धोखा, रोग आदि देने से किसी को भी बचते हैं और सुख, धन, स्वास्थ्य, ज्ञान, शांति, प्रेम देने की इच्छा रखते हैं । हम शुरू में सभी को वही देते हैं जो उनसे अपने लिए चाहते हैं या जो उनके लिए अच्छा होता है । लेकिन फिर हम जैसे-जैसे बड़े होते जाते हैं । लेन-देन से पहले सोचने लगते हैं । हम संबंधों का स्तरीकरण कर उनके लिए व्यवहार सुनिश्चित कर लेते हैं । निश्चय ही ऐसा करने से जीवन आसान हो जाता है परंतु हम पूर्वाग्रहों से ग्रसित हो जाते हैं ।  

पूर्वाग्रहों से ग्रसित जीवन सीमित, संकुचित सोच वाला और बेहद आसान होता है । ऐसे जीवन में निर्णय का सर्वाधिक अधिकार हम अपने पास संजोकर रखते हैं । ये किसी कंपनी के अधिकतम शेयर अपने पास रखने जैसा हैं जबकि ऐसा करना किसी खास फ़ायदे और कायदे का काम होता नहीं है । 

परंतु फिर भी दुनिया भर के लोग लेने कि अपेक्षा देने के लिए ज्यादा इच्छुक दिखते हैं । वो ऐसा इसलिए भी कर सकते हैं क्योंकि वो ऐसा मानते हैं कि देने से लेन-देन शुरू होता हैं । आज हम दे रहे हैं कल हमें भी कोई देगा । देना भले ज्यादा लेने जितना सुखप्रद न हो पर उसमें कुछ बेहतर मिलने कि आशा होती हैं  इसलिए हर देने वाला व्यक्ति आशावादी तो होता है । लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जो सिर्फ देने के लिए देते हैं उनको बदले में कुछ बेहतर या बदतर कि अपेक्षा नहीं होती है ।  

हम प्रायः लेन-देन में दूसरों के लिए मानवीय भावनाओं या सुखदायक काया कि कामना करते हैं और अपने लिए रखते भी हैं। ऐसा अक्सर बुद्धिजनों के मुख से सुनने को मिल जाता हैं कि मनुष्य कि वास्तविक संपत्ति तो उसका स्वस्थ शरीर हैं और स्वस्थ शरीर में चंगे मन का वास होता है । लेकिन हम इनके इतर धन-दान को ज्यादा लालायित रहते हैं । ऐसा शायद धन के सर्वसुलभ साधनों के पर्याय के रूप में स्वीकार हो सकने की खूबी के कारण है । धन हमारे पास समान्यतः इतना होता है कि हम दे सके इसलिए लोग खुलकर देते भी है । 

लेकिन धन आधारित समाज में धन-दान सिर्फ पुण्य का मामला नहीं रह जाता है । ऐसा लोग अन्य विविध कारणों से भी करते हैं जैसे टैक्स से बचने के लिए , समाज में नाम के लिए , काला धन छुपाने के लिए और समग्रता में देखे तो दिखावे के लिए भी धन-दान करते हैं । 

शास्त्रों में लिखा है क्षमा देने वाले को बड़े हृदय का माना गया है । ऐसा व्यक्ति महामना होता है । ऐसे ही दान और दानी के अन्य गुणगान किए गए है। इसलिए दान एक प्राचीन कालीन कार्य है। फिर भी लोग दान कर कैसे पाते हैं ? अर्थात क्या वे दान इसलिए करते हैं कि उनकी संपत्ति दिन दूनी रात चौगनी बढ़े या वे इसलिए धन-दान करते हैं ताकि अपने पाप कम कर सके। क्योंकि धन का दान सबसे बेहूदा किस्म का दान है । जिसका कोई आधार नहीं होता है । एक दिन दुनिया में लोगों के देने के लिए पैसा बचेगा क्योंकि वे तब न तो अपने किए के लिए माफी मांग सकेंगे और न ही स्थितियों को बदल सकेंगे । गिनती के छपे हुये नोट एक हाथ से दूसरे हाथ होकर जब जरूरतमन्द तक पहुँचते है तब तक उनकी कीमत में बट्टा लग चुका होता है । 

दान, अमीर गरीब को देता है । ये एक उपभोगी के द्वारा एक कम खर्चीले और संयमी को दिया जाने वाला रॉयल्टी है । चूँकि मैंने तुम्हारे हिस्से के भी संसाधनों का मजा लिया है इसलिए तुम कुछ पैसे लेलों और चुप रहो । 

धन-दान गरीबी के कुचक्र का कारण है । ये ऐसा ऋण है जिससे जीते जी उऋण नहीं हुआ जा सकता । ये दमित के शोषण का मुलायम तरीका है । मजबूर, मालिक के रहम तले दबा रहता है । मालिक अक्सर कहता है जब पैसे होंगे तब दे देना, इतनी जल्दी भी क्या है ? ये शोषक - शोषित के संबंधों को पोषित और दीर्घजीवी बनाने का प्रयास है। 

संसाधनों के अकाल के काल में जमीन को छेद के सोना मंदिरों में दान दिया गया है। साफ पानी , साफ जमीन , साफ हवा , हरे-भरे जंगल उजाड़ के जो पैसा मिला उससे आनंद उठाने के बाद कुछ हिस्सा दान किया तो क्या किया ? अगर आज भी असमानता है तो ये क्यों है ? 

वास्तव में जो दे रहा हैं उसकी बैलेन्स शीट खुद नेगेटिव में है । शुरुआत में समाज जब कबीलाई था, संपत्ति का अधिकार नहीं था । सभी के हिस्से बराबर थे । तो आज मैं पूछता हूँ तुम्हारे पास मुझसे ज्याद कैसे ? इसकी प्रश्न की कोई सशक्त व्याख्या होती नहीं है । क्योंकि सभी के अपने-अपने कारण है ।  

कोई मुझे या किसी को क्यों दान देता है या याचक कि तरह हमें किसी से मांगना क्यों चाहिए ? आमतौर पर हक़ मागने वाली आवाज़ को दबा दिये जाने का चलन है और जब तक ऐसा है तो जिनके पास ज्यादा है वो चोर है, क्योंकि दान अधिकार है भीख नहीं ।